सनातन हिन्दू धर्म के कट्टर आलोचक है माओवादी वामपंथी
टेकचंद्र शास्त्री:
9130558008
नई दिल्ली।यह एक व्यक्तिपरक और विवादास्पद दृष्टिकोण है। यह दावा कि सनातन “हिन्दू धर्म की अभद्र आलोचना और दुष्प्रचार करना माओवदी वामपंथियों के लिए एक फैशन सा बन गया है” एक व्यापक सामान्यीकरण है और इसे मानव जन समाज बिरोधी, राजनीतिक और आसामाजिक तत्व दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है।
हाँ, सनातन हिन्दू धर्म को व्यापक रूप से दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म माना जाता है जो आज भी प्रचलित है। इसकी उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता से मानी जाती है, जहाँ से इसके विभिन्न चिह्न और परंपराएं विकसित हुई हैं। हिंदू धर्म को “सनातन धर्म” भी कहते हैं, जिसका अर्थ है “शाश्वत धर्म” जो सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा है।
प्राचीनता का प्रमाण हिंदू धर्म की जड़ें प्राचीन वेदों और सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित है.इतिहासकारों के अनुसार माओवादी वामपंथ की उत्पत्ति सन 1789 मे हूई है.और प्राकृतिक परमात्मा द्धारा इस सृष्टी का निर्माण हुए करीबन 19 अरब 55 करोड 88 लाख 5000 वर्ष बताया जा रहा है.जिसे वैदिक काल कहा जाता है. और हिन्दू धर्म का इतिहास लगभग 2300\) से \(1500\) ईसा पूर्व) से जुड़ा हुआ बताया जा रहा हैं, जिनमें योग मुद्राओं और देवी की मूर्तियों जैसे प्रमाण मिलते हैं।कोई संस्थापक नहीं: हिंदू धर्म का कोई एक संस्थापक या निश्चित शुरुआत नहीं है। यह विभिन्न ऋषियों और परंपराओं से विकसित हुआ है।वैदिक काल: वेदों की रचना के साथ इसे पहला लिखित आधार मिला, जो हिंदू धर्म के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण था। यह एक जीवित परंपरा है जो समय के साथ खुद को बदलती और ढालती रही है, जिसमें भक्ति आंदोलन और आदि शंकराचार्य जैसे संतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दरअसल मे वामपंथी
पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं और पदानुक्रमों की अभद्र आलोचना और निंदा करते है। इस दृष्टिकोण से, ब्राह्मणों और हिन्दू धर्म के कुछ पहलुओं की आलोचना जाति व्यवस्था और इससे जुड़े ऐतिहासिक अन्याय को संबोधित करने के प्रयास के रूप में देखी जा सकती है। आलोचकों का तर्क है कि इस आलोचना का उद्देश्य समानता को बढ़ावा देना है, न कि केवल “निंदा” करना है।
एक अन्य दृष्टिकोण इस दावे का समर्थन करता है, जिसमें कहा गया है कि कुछ वामपंथी और उदारवादी हलकों में हिन्दू धर्म और विशेष रूप से ब्राह्मण समुदाय की आलोचना एक आम बात हो गई है, जिसे कुछ लोग अनुचित और पक्षपातपूर्ण मानते हैं। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना है कि यह आलोचना कभी-कभी रचनात्मक बहस से हटकर एक फैशन या प्रवृत्ति का रूप ले लेती है, जो समुदायों के बीच विभाजन पैदा करती है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी वामपंथी या उदारवादी एक ही तरह से सोचते या कार्य नहीं करते हैं। इन मुद्दों पर उनके भीतर भी विचारों की विविधता है।
संक्षेप में, यह मामला इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति राजनीतिक आलोचना और धार्मिक/सामाजिक पहचान के बीच के जटिल संबंधों को कैसे देखता है।
सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-
उपरोक्त समाचार सामान्य ज्ञान पर अधारित विविध स्त्रोत्रों और प्राचीनतम ग्रन्थों और लेखक, इतिहासकारों के प्रवचनों से संकलित किया गया है. अधिक जानकारी के लिए प्राचीनतम सद्ग्रन्थों और विशेषज्ञों से प्राप्त कर सकते हैं.
विश्वभारत News Website