श्री मद् भगवत गीता मे आनंन्द कंद भगवान श्रीकृष्ण चंद्र कहते हैं कि निष्काम भाव और त्याग के द्धारा मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।इसके आंतरिक एवं बाहरी त्याग आवश्यक है, पर त्याग को समझना भी आवश्यक है। कोई घरवार, परिवार, रोजगार, धन- सम्पत्ति छोड़कर कहीं जंगल या पहाड़ में चले जाय, यह त्याग नहीं है। त्याग का तात्पर्य है, सांसारिक वस्तु, व्यक्ति या स्थान के प्रति मन में आसक्त या मोह न होना। यानी ईर्ष्या जलनखोरी चोरी चुगलखोरी चापलूसखोरी, झूठ छल कपट ईर्ष्या जलनखोरी चोरी चुगलखोरी चापलूसखोरी, झूठ, छल, कपट,कुसंग, विश्वासघात,नशापान ,व्यभिचार और अभक्ष्य भोजनादि का त्याग सर्वोत्तम माना गया है।
भगवान शिव ने कहा है – प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।। अत्यधिक प्रेम के बिना प्रभु नहीं मिलते हैं। यदि हम संसार से प्रेम करेंगे तो परमात्मा से अत्यधिक प्रेम कैसे होगा?
संसार में कोई स्त्री पुरुष आपस में प्रेम करते हैं तो एक दुसरे के लिये जान देने पर उतारू हो जाते हैं। यदि मिलन न हो रहा हो तो वे तड़पते हैं
बहुत ही अच्छा सवाल है अच्छा हुआ आपने आज ही पूछा नहीं तो शायद इसका उत्तर मैं सही से समझा नहीं पाता है
क्या भगवान की प्राप्ति के लिए सन्यास लेना सही है? जब आत्माओं का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना था तो ईश्वर ने सुंदर मायावी दुनिया क्यों बनाई? ईश्वर की इच्छा से इतने बुद्धिमान वैज्ञानिक क्यों पैदा होते हैं कि वे दुनिया को उलटा और अधिक सुंदर बनाने की कोशिश करते हैं?हम ईश्वर को पाने की राह पर क्यों हैं जबकि वह हर जगह है?ईश्वर बाहर नही अंदर निवास करता हैं
भगवान को प्राप्त करने के लिए और अधिक शक्तिशाली तरीका क्या है – त्याग या निःस्वार्थ सेवा? क्यों? सच में ईश्वर को पाने का तरीका वही बता सकता है जो ईश्वर को पा चुका है, वैसे ईश्वर पाने की नही वरन् महसूस करने, धारण करने की विषय वस्तु है। ईश्वर वह सत्य है जो अवर्णित हो, ईश्वर वह प्रेम है जो निस्वार्थी हो, ईश्वर वह मानवता है जो पूज्य हो, ईश्वर वह धर्म है जो धारक हो।
जिसे जीवन का लोभ और मृत्यु का भय है वह जीवात्मा है। जिसे न तो जीवन से लोभ और न ही मृत्यु से भय हो वह महात्मा है। जो जीवन मृत्यु लोभ भय से परे है वह देवात्मा है। और जो जीवात्मा महात्मा व देवात्मा आदि का धारक है वही परमात्मा अर्थात् ईश्वर है।
मनुष्य के मन में उठने वाले विचार ही एक दिन वाणी के द्वारा निःसृत होते हैं। हमारी वाणी हमारे कर्म में परिणत हो जाती है। मतलब यह कि जैसा बोलते हैं, वैसा करने भी लग जाते हैं। हमारे कर्मों से ही हमारी आदतों का निर्माण होता है। हमारी आदतें ही हमारे चरित्र का गठन करती हैं और हमारा चरित्र ही हमारे भविष्य का जन्मदाता है। इस प्रकार यदि मन के विचार उत्तम हों तो हमारी वाणी पवित्र होंगी। वाणी पवित्र हों तो हमारे कर्म पवित्र होंगे। हमारे कर्म पवित्र हों तो हमारी आदतें पवित्र होंगी और यदि हमारी आदतें पवित्र हों तो हमारा चरित्र अवश्य ही उत्तम होगा और उत्तम चरित्र से ही हमारे उज्जवल भविष्य का निर्माण होगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे मन के विचार से ही हमारे भविष्य का निर्धारण होता है। अगर विचार पवित्र है तो भविष्य उज्जवल होगा और यदि विचार अपवित्र तो भविष्य अंधकार में होगा। इसलिए कहा गया है- As you think so shall you become. आदमी जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। सार बात यह है कि हमारा विचार पवित्र होना चाहिये। व्यावहारिक रूप में है विचार की परिशुद्धि को ही सत्संग कहते हैं। हमारी संगति ऐसी हो कि जिससे हमारे विचार पवित्र हो सतोगुण ही हो – यही सत्संग का मूल उद्देश्य है।
यदि हम सत्संग के शाब्दिक अर्थ पर विचार करें तो सत + संग = सत्संग। सत्संग का अर्थ हुआ – ‘सत’ का संग। सत उसे कहते हैं जिसका कभी नाश नहीं होता है अर्थात् परमात्मा। संसार की कोई भी वस्तु सत्य नहीं है सब कुछ नाशवान है। एकमात्र परमात्मा ही सत्य है, अविनाशी है। इस प्रकार सत्संग का अर्थ हुआ परमात्मा का संग। परमात्मा का सत्संग सबसे उच्च कोटि का सत्संग है, किंतु इसे प्राप्त करना सरल नहीं है। इसलिए सर्वप्रथम हम साधु-संतों और महापुरुषों का संग करते हैं। उनके संग से हमें सत्य स्वरूप ईश्वर को पाने की योग्यता मिलती है और सद्युक्ति मिलती है। यह दूसरे दर्जे का सत्संग है। शुरू में इस सत्संग की बड़ी आवश्यकता है इसके बिना ईश्वर के रहस्य को हम जान ही नहीं सकते हैं।
इसीलिए भगवान श्रीराम ने शबरी को उपदेश देते हुए कहा था – प्रथम भगति संतन कर संगा। दूसरी रति मम कथा प्रसंगा।।
सत्संग से मूल रूप में तीन लाभ की प्राप्ति होती है। प्रथम आचरण की परिशुद्धि, दूसरा आध्यात्मिक ज्ञान का अभिवर्धन और तीसरा ईश्वर के प्रति प्रेम-भक्ति की अभिवृद्धि।
सत्संग करते हुए यह देखें कि अपने अंदर पहले से अधिक सुधार हुआ है या नहीं, आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि हो रही है कि नहीं, ईश्वर में प्रेम दृढ़ हो रहा है कि नहीं। यदि ऐसा हो रहा है तो आप ईश्वर के करीब जा रहे हैं और सत्संग का फल आपको मिल रहा है ।
(भाग-6)निष्काम भक्ति त्याग और सत्संग के द्धारा मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है?
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