श्रीमद्भागवत गीता भारत के सभी प्राचीन योग और ज्ञान का निचोड़ और समन्वयक ग्रन्थ है। गीता का उद्देश्य ही परमात्मा के ज्ञान, आत्मा के ज्ञान और सृष्टि विधान के ज्ञान को स्पष्ट करना है। गीता वास्तव में चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा और उत्तम शास्त्र है। इसके माध्यम से भगवान ने कहा है कि चरित्र कमल पुष्प समान संसार में रहकर और श्रेष्ठ कर्मों से बनेगा कि घर-बार छोड़ने और कर्म संन्यास क्रियाएं करने से। ये बातें उषा बहन ने कहीं।
वह हरमू मैदान में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहीं थी। रांची केंद्र की संचालिका बह्माकुमारी निर्मला बहन ने कहा कि इस सदी में तनाव और बढ़ेगा, इसलिए इसका सामना करने और उसे कम करने की विधियों को अपनाना होगा। कर्म और योग का संतुलन, साधना साधनों में संतुलन, भावना विवेक में संतुलन निश्चित सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। तनाव मुक्ति के कुछ टिप्स देते हुए उन्होंने कहा जीवन की हरेक घटना में किसी किसी रूप से लाभ होता है। सदा लाभ के बारे में ही सोचें, तो भविष्य में भी लाभ होगा। अपनी तुलना कभी दूसरों से करें। आपका निंदक आपका मनोचिकित्सक है। एक समस्या को एक ही समय सुलझाएं। दृष्टिकोण बदली करें, दुख-सुख में बदल जाएगा, जो बात नहीं बदल सकती उसके बारे में सोचें। उषा बहन ने मेडिटेशन से सभी को आत्मानुभूति कराई। मंगलवार को गीता के अद््भुत रहस्यों को सुलझाया जाएगा।
द्वंद में है मानव जीवन
आजमानव जीवन में महाभारत जैसे हालात हो चुके हैं। इस परिस्थिति में हम सभी अर्जुन हंै और मन रूपी कुरुक्षेत्र में चल रहे द्वंद में फंसे हुए हैं। मानव मन के अंदर ही रामायण और महाभारत चल रहा है।
समाधान: गीतामें इस द्वंद के समाधान के लिए कई विद्याओं का उल्लेख है। जैसे काम से ही क्रोध की उत्पति होती है। इससे बुद्धि का नाश होता है। वास्तव में परमात्मा ने विकारों से ही युद्ध कराया था कि हिंसक युद्ध से। मनोबल प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने योग सिखाया, क्योंकि योग से ही पिछले विकर्मों का विनाश होता है। शुद्ध संस्कार बनते हैं और कर्मों में कुशलता आती है।
गीता में तीन प्रकार तप बताए गए हैं
तप का अर्थ है-पीड़ा सहना, घोर कड़ी साधना करना और मन का संयम रखना आदि। महर्षि दयानंद के अनुसार ‘जिस प्रकार सोने को अग्नि में डालकर इसके मैल को दूर किया जाता है, उसी प्रकार सद्गुणों और उत्तम आचरणों से अपने हृदय, मन और आत्मा के मैल को दूर किया जाना तप है।
शारीरिक, जो शरीर से किया जाए। वाचिक, जो वाणी से किया जाए और मानसिक, जो मन से किया जाए। देवताओं, गुरुओं और विद्वानों की पूजा और इन लोगों की यथायोग्य सेवा-सुश्रषा करना, ब्रह्मचर्य और अहिंसा शारीरिक तप हैं। ब्रह्मचर्य का अर्थ है- शरीर के बीजभूत तत्व की रक्षा करना और ब्रह्म में विचरना या अपने को सदा परमात्मा की गोद में महसूस करना। किसी को मन, वाणी और शरीर से हानि न पहुंचाना अहिंसा है। हिंसा और अहिंसा केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि वाचिक और मानसिक भी होती हैं।
वाणी के तप से अभिप्राय है ऐसी वाणी बोलना जिससे किसी को हानि न पहुंचे। सत्य, प्रिय और हितकारक वाणी का प्रयोग करना चाहिए। वाणी के तप के साथ ही स्वाध्याय की बात भी कही गयी है। वेद, उपनिषद आदि सद्ग्रंथों का नित्य पाठ करना और अपने द्वारा किए जा रहे नित्य कर्मो पर भी विचार करना स्वाध्याय है। मन को प्रसन्न रखना, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और चित्त की शुद्ध भावना ये सब मन के तप हैं।
गुणवत्ता के आधार पर तप तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक तप यानी जो परम श्रद्धा से किया जाता है, जिसमें फल के भोग की आकांक्षा नहीं होती है और सबके हित के लिए किया जाता है। अपना सत्कार चारों ओर बढ़ाने की इच्छा से किया जाने वाला तप राजस तप कहलाता है। तामस तप का अर्थ है पंचाग्नियों के बीच शरीर को कष्ट देना। शरीर के किसी अंग को वर्षो निष्क्रिय करके रखना आदि कर्म जिनसे करने वालों और देखने वालों दोनों को कष्ट हो और किसी का भी कोई हित न हो उन्हें तामस तप कहा जाता है।
मनु कहते हैं कि तप से मन का मैल दूर होता है और पाप का नाश होता है। शास्त्र कहते हैं कि अपने व्यक्तित्व को ऊपर उठाना है, तो तपस्वी बनें।
विश्वभारत News Website