भाग:73) गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रेम पूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं तत्वज्ञान रुप योग देता हूं
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट
दसवें अध्याय के अर्थ-चिन्तन का यह परिणाम हुआ है कि यह सब भूतों में स्थित शङ्ख-चक्रधारी भगवान् विष्णुका सदा ही दर्शन करता रहता है। इसकी स्नेहपूर्ण दृष्टि जब कभी किसी देहधारी के शरीर पर पड़ जाती है, तब वह चाहे शराबी और ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो, मुक्त हो जाता है
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १०-१०॥ उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥
श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवाद में “विभूतियोग” नामक दसवाँ अध्याय भगवान् शिव कहते हैं-— पार्वती! अब तुम दशम अध्याय के माहात्म्य की परम पावन कथा सुनो, जो स्वर्गरूपी दुर्ग में जाने के लिये सुन्दर सोपान और प्रभाव की चरम सीमा है। काशीपुरी में धीरबुद्धि नाम से विख्यात एक ब्राह्मण था, जो मुझमें प्रिय नन्दी के समान भक्ति रखता था।
वह पावन कीर्ति के अर्जन में तत्पर रहनेवाला, शान्तचित्त और हिंसा, कठोरता एवं दुःसाहस से दूर रहने वाला था। जितेन्द्रिय होने के कारण वह निवृत्ति मार्ग में ही स्थित रहता था। उसने वेदरूपी समुद्र का पार पा लिया था।
वह सम्पूर्ण शास्त्रों के तात्पर्य का ज्ञाता था। उसका चित्त सदा मेरे ध्यान में संलग्न रहता था। वह मन को अन्तरात्मा में लगाकर सदा आत्मतत्त्व का साक्षात्कार किया करता था; अतः जब वह चलने लगता, तब मैं प्रेमवश उसके पीछे दौड़-दौड़कर उसे हाथ का सहारा देता रहता था।
यह देख मेरे पार्षद भृङ्गिरिटिने पूछा-—भगवन् ! इस प्रकार भला, किसने आपका दर्शन किया होगा। इस महात्मा ने कौन-सा तप, होम अथवा जप किया है कि स्वयं आप ही पद-पदपर इसे हाथ का सहारा देते चलते हैं?
सृंङ्गिरिटि का यह प्रश्न सुनकर मैंने इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया। एक समय की बात है, कैलास पर्वत के पार्श्वभाग में पुन्नाग वन के भीतर चन्द्रमा की अमृतमयी किरणों से धुली हुई भूमि में एक वेदी का आश्रय लेकर मैं बैठा हुआ था।
मेरे बैठने के क्षणभर बाद ही सहसा बड़े जोर की आँधी उठी, वहाँ के वृक्षों की शाखाएँ नीचे-ऊपर होकर आपस में टकराने लगीं, कितनी ही टहनियाँ टूट-टूटकर बिखर गयीं। पर्वत की अविचल छाया भी हिलने लगी।
इसके बाद वहाँ महान् भयंकर शब्द हुआ, जिससे पर्वत की कन्दराएँ प्रतिध्वनित हो उठीं। तदनन्तर आकाश से कोई विशाल पक्षी उतरा, जिसकी कान्ति काले मेघ के समान थी। वह कज्जल की राशि, अन्धकार के समूह अथवा पंख कटे हुए काले पर्वत–सा जान पड़ता था।
पैरों से पृथ्वी का सहारा लेकर उस पक्षी ने मुझे प्रणाम किया और एक सुन्दर नवीन कमल मेरे चरणों में रखकर स्पष्ट वाणी में स्तुति करनी आरम्भ की।
पक्षी बोला-देव ! आपकी जय हो। आप चिदानन्दमयी सुधा के सागर तथा जगत के पालक हैं। सदा सद्भावना से युक्त एवं अनासक्ति की लहरों से उल्लसित हैं। आपके वैभव का कहीं अन्त नहीं है। आपकी जय हो। अद्वैतवासना से परिपूर्ण बुद्धि के द्वारा आप त्रिविध मलों से रहित हैं।
आप जितेन्द्रिय भक्तों के अधीन रहते हैं तथा ध्यान में आपके स्वरूप का साक्षात्कार होता है। आप अविद्यामय उपाधि से रहित, नित्यमुक्त, निराकार, निरामय, असीम, अहंकारशून्य, आवरणरहित और निर्गुण हैं। आपके चरणकमल शरणागत भक्तों की रक्षा करने में प्रवीण हैं।
अपने भयंकर ललाटरूपी महासर्प की विषज्वाला से आपने कामदेव को भस्म किया है। आपकी जय हो। आप प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से दूर होते हुए भी प्रामाण्यस्वरूप हैं। आपको बार-बार नमस्कार है।
चैतन्य के स्वामी तथा त्रिभुवनरूपधारी आपको प्रणाम है। मैं श्रेष्ठ योगियों द्वारा चुम्बित आपके उन चरण-कमलों की वन्दना करता हूँ, जो अपार भव-पापके समुद्र से पार उतारने में अद्भुत शक्तिशाली हैं।
महादेव ! साक्षात् बृहस्पति भी आपकी स्तुति करने की धृष्टता नहीं कर सकते। सहस्र मुखोंवाले नागराज शेष में भी इतनी चातुरी नहीं है कि वे आपके गुणोंका वर्णन कर सकें। फिर मेरे-जैसे छोटी बुद्धिवाले पक्षी की तो बिसात ही क्या है।
उस पक्षीके द्वारा किये हुए इस स्तोत्रको सुनकर मैंने उससे पूछा—’विहङ्गम! तुम कौन हो और कहाँ से आये हो ? तुम्हारी आकृति तो हंस-जैसी है, मगर रंग कौए का मिला है। तुम जिस प्रयोजन को लेकर यहाँ आये हो, उसे बताओ।’
पक्षी बोला-—देवेश ! मुझे ब्रह्माजी का हंस जानिये। धूर्जटे ! जिस कर्म से मेरे शरीर में इस समय कालिमा आ गयी है, उसे सुनिये। प्रभो ! यद्यपि आप सर्वज्ञ हैं [ अतः आपसे कोई भी बात छिपी नहीं है ] तथापि यदि आप पूछते हैं तो बतलाता हूँ।
सौराष्ट्र (सूरत) नगरके पास एक सुन्दर सरोवर है, जिसमें कमल लहलहाते रहते हैं। उसी में से बालचन्द्रमा के टुकड़े-जैसे श्वेत मृणालों के ग्रास लेकर मैं बड़ी तीव्र गति से आकाश में उड़ रहा था।
उड़ते-उड़ते सहसा वहाँ से पृथ्वी पर गिर पड़ा जब होश में आया और अपने गिरने का कोई कारण न देख सका तो मन-ही-मन सोचने लगा-‘अहो ! यह मुझ पर क्या आ पड़ा ? आज मेरा पतन कैसे हो गया ?’ पके हुए कपूर के समान मेरे श्वेत शरीर में यह कालिमा कैसे आ गयी?
इस प्रकार विस्मित होकर मैं अभी विचार ही कर रहा था कि उस पोखरे के कमलों में से मुझे ऐसी वाणी सुनायी दी-—’हंस ! उठो, मैं तुम्हारे गिरने और काले होने का कारण बताती हूँ।’
तब मैं उठकर सरोवर के बीचमें गया और वहाँ पाँच कमलों से युक्त एक सुन्दर कमलिनी को देखा। उसको प्रणाम करके मैंने प्रदक्षिणा की और अपने पतन का सारा कारण पूछा।
कमलिनी बोली—-कलहंस ! तुम आकाश मार्ग से मुझे लाँघकर गये हो, उसी पातक के परिणामवश तुम्हें पृथ्वी पर गिरना पड़ा है तथा उसी के कारण तुम्हारे शरीर में कालिमा दिखायी देती है।
तुम्हें गिरा देख मेरे हृदय में दया भर आयी और जब मैं इस मध्यम कमल के द्वारा बोलने लगी हूँ, उस समय मेरे मुख से निकली हुई सुगन्ध को सूंघकर साठ हजार भँवरे स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये हैं।
पक्षिराज ! जिस कारण मुझमें इतना वैभव-ऐसा प्रभाव आया है, उसे बतलाती हूँ; सुनो। इस जन्म से पहले तीसरे जन्म में मैं इस पृथ्वी पर एक ब्राह्मण की कन्याके रूप में उत्पन्न हुई थी। उस समय मेरा नाम सरोजवदना था। मैं गुरुजनोंकी सेवा करती हुई सदा एकमात्र पातिव्रत के पालन में तत्पर रहती थी।
एक दिनकी बात है, मैं एक मैना को पढ़ा रही थी। इससे पति सेवा में कुछ विलम्ब हो गया। इससे पतिदेवता कुपित हो गये और उन्होंने शाप दिया’—पापिनी ! तू मैना हो जा।’ मरनेके बाद यद्यपि मैं मैना ही हुई, तथापि पातिव्रत्य के प्रसाद से मुनियों के ही घर में मुझे आश्रय मिला।
किसी मुनि कन्या ने मेरा पालन-पोषण किया। मैं जिनके घर में थी, वे ब्राह्मण प्रतिदिन प्रातःकाल विभूतियोग नामसे प्रसिद्ध गीता के दसवें अध्याय का पाठ करते थे और मैं उस पापहारी अध्याय को सुना करती थी।
विहङ्गम ! काल आने पर मैं मैना का शरीर छोड़कर दशम अध्याय के माहात्म्य से स्वर्गलोक में अप्सरा हुई। मेरा नाम पद्मावती हुआ और मैं पद्मा की प्यारी सखी हो गयी।
एक दिन मैं विमान से आकाश में विचर रही थी। उस
समय सुन्दर कमलों से सुशोभित इस रमणीय सरोवर पर मेरी दृष्टि पड़ी और इसमें उतरकर ज्यों ही मैंने जलक्रीड़ा आरम्भ की, त्यों ही दुर्वासा मुनि आ धमके। उन्होंने वस्त्रहीन अवस्थामें मुझे देख लिया।
उनके भय से मैंने स्वयं ही एक कमलिनी का रूप धारण कर लिया। मेरे दोनों पैर दो कमल हुए। दोनों हाथ भी दो कमल हो गये और शेष अङ्गोंके साथ मेरा मुख भी एक कमल हुआ। इस प्रकार मैं पाँच कमलोंसे युक्त हुई। मुनिवर दुर्वासा ने मुझे देखा। उनके नेत्र क्रोधाग्नि से जल रहे थे।
वे बोले-—’पापिनी ! तू इसी रूप में सौ वर्षों तक पड़ी रह।’ यह शाप देकर वे क्षणभर में अन्तर्धान हो गये। कमलिनी होने पर भी विभूतियोगाध्याय के माहात्म्य से मेरी वाणी लुप्त नहीं हुई है। मुझे लाँघने मात्र के अपराधसे तुम पृथ्वीपर गिरे हो।
पक्षिराज ! यहाँ खड़े हुए तुम्हारे सामने ही आज मेरे शाप की निवृत्ति हो रही है, क्योंकि आज सौ वर्ष पूरे हो गये। मेरे द्वारा गाये जाते हुए उस उत्तम अध्याय को तुम भी सुन लो। उसके श्रवण मात्रसे तुम भी आज ही मुक्त हो जाओगे।
यों कहकर पद्मिनी ने स्पष्ट एवं सुन्दर वाणी में दसवें अध्याय bhagwat geeta in hindi का पाठ किया और वह मुक्त हो गयी। उसे सुनने के बाद उसी के दिये हुए इस उत्तम कमल को लाकर मैंने आपको अर्पण किया है।
इतनी कथा सुनाकर उस पक्षी ने अपना शरीर त्याग दिया। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वही पक्षी अब दसवें अध्याय के प्रभाव से ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुआ है। जन्म से ही अभ्यास होने के कारण शैशवावस्था से ही इसके मुख से सदा गीता के दसवें अध्याय का उच्चारण हुआ करता है।
दसवें अध्याय bhagwat geeta katha के अर्थ-चिन्तन का यह परिणाम हुआ है कि यह सब भूतों में स्थित शङ्ख-चक्रधारी भगवान् विष्णुका सदा ही दर्शन करता रहता है। इसकी स्नेहपूर्ण दृष्टि जब कभी किसी देहधारी के शरीर पर पड़ जाती है, तब वह चाहे शराबी और ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो, मुक्त हो जाता है। तथा पूर्वजन्म में अभ्यास किये हुए दसवें अध्याय के माहात्म्य से इसको दुर्लभ तत्त्वज्ञान प्राप्त है तथा इसने जीवन्मुक्ति भी पा ली है।
अतः जब यह रास्ता चलने लगता है तो मैं इसे हाथका सहारा दिये रहता हूँ। भृङ्गिरिटे ! यह सब दसवें अध्यायकी ही महामहिमा है।
पार्वती ! इस प्रकार मैंने भृङ्गिरिटि के सामने जो पापनाशक कथा कही थी, वही यहाँ तुमसे भी कही है। नर हो या नारी अथवा कोई भी क्यों न हो, इस दसवें अध्याय के श्रवणमात्र से उसे सब आश्रमों के पालन का फल प्राप्त होता है
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