भाग:128) अष्टावक्र गीता में ज्ञान, वैराग्य, मुक्ति और समाधिस्थ योगी की दशा का सविस्तार वर्णन है।
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री : सह-संपादक की रिपोर्ट
गीता में भगवान कृष्ण का एक उपदेश बताता है कि मनुष्य को सदैव अभ्यास करते रहना चाहिए. अभ्यास करने से मनुष्य का जीवन आसान हो जाता है. ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का मन अशांत है तो उसे नियंत्रित करने का अभ्यास ही सबसे अच्छा मार्ग है.
अष्टावक्र गीता’ अद्वैतवादी उत्कृष्ट कृतियों में से एक है। बिना मामले को छेड़े यह अद्वैत सत्य, संपूर्ण सत्य और अद्वैत के अलावा कुछ नहीं, जो कि सत्य है, सामने आता है। यह पुस्तक राजा जनक को दी गई अष्टावक्र की शिक्षा का प्रतीक है, जिसने उन्हें अपने घोड़े की रकाब पर एक पैर रखने और दूसरे पैर को दूसरी रकाब पर रखने के लिए खुद को उठाने के बीच आत्म-ज्ञान प्रदान किया।
हालाँकि, जैसा कि निम्नलिखित उद्धरण से देखा जा सकता है, भगवान रमण ने कहा कि आत्म-ज्ञान में बिल्कुल भी समय शामिल नहीं है।
“…. जब मैंने हॉल में प्रवेश किया तो उपरोक्त राजा और अन्य आगंतुकों के लाभ के लिए अष्टावक्र गीता को कैसे पढ़ाया जाने लगा इसकी कहानी अंग्रेजी में सुनाई जा रही थी। कहानी पढ़ने के बाद, भगवान ने कहा, ‘क्योंकि ब्रह्म ज्ञान कोई बाहरी चीज़ नहीं है, जो कहीं दूर है जहाँ आप जाकर इसे प्राप्त कर सकते हैं, आप यह नहीं कह सकते कि इसे प्राप्त करने में इतना लंबा या इतना कम समय लगेगा। यह हमेशा आपके साथ है. . . . बस अपने आप को पूरी तरह से गुरु के प्रति समर्पित करना, ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अपनी धारणा को समर्पित करना आवश्यक है…।”
भगवान के साथ दिन-ब-दिन में देवराज मुदलियार,
निस्संदेह, राजा जनक ने यही किया था। उन्होंने ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अपनी धारणा को ऋषि अष्टावक्र को समर्पित कर दिया। क्या भगवान ने यह नहीं कहा है कि आत्म-साक्षात्कार के लिए समर्पण और आत्म-निरीक्षण ही दो मार्ग हैं?
भगवान ने इस महान पुस्तक के अन्य सन्दर्भ भी दिये हैं। श्री रामकृष्ण ने नरेंद्र को ‘अष्टावक्र गीता’ पढ़ने के लिए राजी किया, जिसका युवा भक्त पर अद्भुत प्रभाव पड़ा, जो बाद में प्रखर अद्वैतवादी प्रचारक स्वामी विवेकानंद के रूप में विकसित हुआ।
महापंडित एवं विद्वान अष्टावक्र की बुद्धिमत्ता से आप सभी लोग परिचित होंगे। जनक की सभा मे उन्होने बंदी से शास्त्रार्थ करके अपनी विद्वता का परिचय दिया था। और बंदी को उनके अहंकार के बारे मे ज्ञात करवाया था। उन्ही के द्वारा रचित महागीता का यहाँ बारहवां अध्याय प्रस्तुत है।
आपकी सरलता और आसानी के लिए हमने यहाँ पर अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Geeta) के श्लोक संस्कृत के साथ साथ हिन्दी और अङ्ग्रेज़ी भावार्थ के साथ प्रकाशित किए हैं। जिससे आपको अध्ययन करने मे आसानी हो।
Twelveth Chapter of Ashtavakra Geeta in Hindi
अष्टावक्र गीता बारहवां अध्याय- Twelveth Chapter of Ashtavakra Geeta in Hindi
जनक उवाच –
कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।
अथ चिन्तासहस्तस्माद् एवमेवाहमास्थितः॥१२- १॥
श्री जनक कहते हैं – पहले मैं शारीरिक कर्मों से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ, फिर वाणी से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ। अब चिंता से निरपेक्ष (उदासीन) होकर अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥१॥
Sri Janak says – First I developed indifference towards actions performed by body then I became indifferent to actions performed by speech.
Now, I have become indifferent to all sorts of anxieties and stay as I am.॥1॥
प्रीत्यभावेन शब्दादेर- दृश्यत्वेन चात्मनः।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः॥१२- २॥
शब्द आदि विषयों में आसक्ति रहित होकर और आत्मा के दृष्टि का विषय न होने के कारण मैं निश्चल और एकाग्र ह्रदय से अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥२॥
Unattached to sound and other senses and knowing that Self is not an object of sight,
I remain free of disturbances and focused as I am.॥2॥
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।
एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः॥१२- ३॥
अध्यास (असत्य ज्ञान) आदि असामान्य स्थितियों और समाधि को एक नियम के समान देखते हुए मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥३॥
Seeing the transitions between abnormal states of incorrect perception and the meditative states as a (natural) rule, I stay as I am.॥3॥
हेयोपादेयविरहाद् एवं हर्षविषादयोः।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्न् एवमेवाहमास्थितः॥१२- ४॥
हे ब्रह्म को जानने वाले! त्याज्य (छोड़ने योग्य) और संग्रहणीय से दूर होकर और सुख-दुःख के अभाव में मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥४॥
O seer of God, away from the feelings to store or to leave and without any pleasure or pain, I stay as I am.॥4॥
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं।
विकल्पं मम वीक्ष्यै- तैरेवमेवाहमास्थितः॥१२- ५॥
आश्रम – अनाश्रम, ध्यान और मन द्वारा स्वीकृत और निषिद्ध नियमों को देख कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥५॥
Looking at the various stages of life and their absence, rules accepted and prohibited by mind and such options, I stay as I am.॥5॥
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद् यथैवोपरमस्तथा।
बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः॥१२- ६॥
कर्मों के अनुष्ठान रूपी अज्ञान से निवृत्त होकर और तत्त्व को सम्यक रूप से जान कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥६॥
Being aware of the ignorance in performing rituals and knowing the Truth properly, I stay as I am.॥6॥
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः॥१२- ७॥
अचिन्त्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए भी विचार पर ही चिंतन किया जाता है।
अतः उस विचार का भी परित्याग करके मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥७॥
While thinking about the Unthinkable, we ponder over our thoughts only.
So abandoning that thought, I stay as I am.॥7॥
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥१२- ८॥
जो इस प्रकार से आचरण करता है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है; जिसका इस प्रकार का स्वभाव है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है॥८॥
He who follows thus gets liberated.
One whose nature is like this gets liberated.॥8॥
कहा जाता है कि अष्टावक्र द्वारा रचित महागीता का एक श्लोक हज़ार माणिकों की तुलना मे भी बहुत अमूल्य है क्यूंकी अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Geeta) के श्लोकों मे गागर मे सागर भरने जैसा बताया गया है। लोक हित के लिए गीता बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है जिसे पढ़ना भी आवश्यक है।
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