केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने पूजा अर्चना की और विश्व शांति की कामना की
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक की रिपोर्ट,9822550220
त्रिवेन्द्रमपुरम। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत केरल के दौरे पर पंंहुुचे जहां पर उन्होंने केरल के प्रसिद्ध श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में पूजा अर्चना की.और पद्मनाभ स्वामी भगवान श्री विष्णु जी के दर्शन किए
दुनिया का यह सबसे धनी मंदिर माना जाता है। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास 8वीं सदी से मिलता है। यह विष्णु के 108 पवित्र मंदिरों में एक है जिसे भारत का दिव्य देसम भी कहते हैं। दिव्य देसम भगवान विष्णु का सबसे पवित्र निवास स्थान है जिसका उल्लेख तमिल संतों द्वारा लिखे गए पांडुलिपियों में मिलता है
आरएसएस प्रमुख सुबह छह बजकर 40 मिनट पर मंदिर पहुंचे जहां भगवान विष्णु की प्रतिमा ‘अनंत शयनम’ यानी लेटी हुई मुद्रा में विराजमान है.
सूत्रों के मुताबिक, मोहन भागवत सात अक्टूबर से केरल में हैं. वह राज्य में आरएसएस के अखिल भारतीय नेताओं की बैठक के लिए पहुंचे हैं. यह मंदिर इस क्षेत्र में भगवान विष्णु को समर्पित प्रमुख मंदिरों में से एक है.
सदियों पुराना यह मंदिर कुछ समय पहले हैरान कर देने वाली संपत्ति की खोज के कारण चर्चाओं में आया था. तब इसके तहखाने से कीमती वस्तुएं, सोने के आभूषण, कीमती पत्थरों से बनी प्रतिमाएं, जेवरात, ठोस सोने सिक्कों के ढेर, चांदी एवं सोने के बर्तन और लैंप मिले थे.
सात अक्टूबर को केरल पहुंचे भागवत ने कोझिकोड में केसरी वीकली द्वारा आयोजित अमृतशतम् व्याख्यान श्रृंखला और आठ अक्टूबर को कोल्लम में राज्य संघचालकों की बैठक समेत विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठनात्मक विज्ञान विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए भागवत ने कहा कि संघ हिंदुओं को संगठित करता है क्योंकि हम सभी हिंदू हैं.
मोहन भागवत ने कहा हमारी अपनी भाषाएं हैं, हमारी अपनी पूजा पद्धति हैं, हमारी अपनी जातियां और उपजातियां हैं, इतने सारे धर्म हैं, इतने सारे जीवन जीने के तरीके हैं… सब कुछ अलग है, फिर भी अनादि काल से हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.
संस्कृति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, जैसे-जैसे समय बीतता है, विविधता बढ़ती है. एक भाषा कई भाषाएं बन जाती हैं. यह प्राकृतिक क्रम में होता है. फिर भी, हम एक साथ हैं. क्यों? क्योंकि यह हमारा संस्कार है; यह हमारी संस्कृति है.
आरएसएस प्रमुख ने कहा, ‘इस भूमि पर, हम हर किसी का भरण-पोषण करते हैं, हर विविधता को स्वीकार करते हैं, और हर विविधता का सम्मान करते हैं. हम इसे अपनी मां के रूप में मानते हैं, और हम इसे अपनी मां के रूप में पूजते हैं. यह सभी जातियों, सभी भाषाओं, सभी धर्मों में आम है. हमारा डीएनए समान है. हम एक हैं. यह हमारी मातृभूमि है. हमारे धार्मिक संप्रदाय अलग-अलग हैं.
उन्होंने कहा, हिंदू समाज को संगठित होना चाहिए क्योंकि संगठित समाज ही समृद्ध देश का निर्माण करता है. इससे पहले मोहन भागवत ने पद्मनाभ स्वामी मंदिर मे पूजा अर्चना की ओर विश्व शांति के लिए संत महात्माओं से आशीर्वाद लिया ।
*श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुवनंतपुरम एक परिचय*
भारत के केरल राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम के पूर्वी किले के भीतर स्थित श्री पद्मनाथ स्वामी मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर है। यह मंदिर केरल और द्रविड़ वास्तुशिल्प शैली का अनुपम उदाहरण है। इसे दुनिया का सबसे धनी मंदिर माना जाता है।
श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास 8वीं सदी से मिलता है। यह विष्णु के 108 पवित्र मंदिरों में एक है जिसे भारत का दिव्य देसम भी कहते हैं। दिव्य देसम भगवान विष्णु का सबसे पवित्र निवास स्थान है जिसका उल्लेख तमिल संतों द्वारा लिखे गए पांडुलिपियों में मिलता है। इस मंदिर के प्रमुख देवता भगवान विष्णु हैं जो भुजंग सर्प अनंत पर लेटे हुए हैं।
मार्तंड वर्मा जो त्रावणकोर के प्रसिद्ध राजा थे, ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य कराया जो आज के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के रूप में हमें दिखता है। मार्तंड वर्मा ने ही इस मंदिर में मुरजपम और भद्र दीपम त्यौहारों की शुरुआत की थी। मुरजपम जिसका अर्थ प्रार्थना का मंत्रोच्चार करना होता है, इस मंदिर में छ: वर्षों में एक बार अब भी किया जाता है।
वर्ष 1750 में, मार्तंड वर्मा ने त्रावणकोर राज्य भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर दिया । मार्तंड वर्मा ने यह घोषणा की कि राज परिवार भगवान की ओर से राज्य का शासन करेगा और वे स्वंय और उनके वंशज राज्य की सेवा पद्मनाभ के दास या सेवक के रूप में करेंगे। तब से, त्रावणकोर के प्रत्येक राजा के नाम से पहले पद्मनाभ दास पुकारा जाता है। पद्मनाभस्वामी को त्रावणकोर राज्य द्वारा दिए गए दान को त्रिपड़ीदानम कहा जाता है।
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम का नाम श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रमुख देवता के नाम पर है जिन्हें अनंत (जो सर्प अनंत पर लेटे हैं) भी कहा जाता है। शब्द ‘तिरुवनंतपुरम’ का शाब्दिक अर्थ है – श्री अनंत पद्मनाभस्वामी की भूमि।
माना जाता है कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर ऐसे स्थान पर स्थित है जो सात परशुराम क्षेत्रों में से एक है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में इस मंदिर का संदर्भ मिलता है। यह मंदिर पवित्र टंकी पद्म तीर्थम यानी ‘कमल जल’ के पास है ।
यह मंदिर अब एक ट्रस्ट चलाता है जिसका नेतृत्व त्रावणकोर के पूर्ववर्ती राज परिवार के पास है।
श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रमुख देवता की प्रतिमा अपने निर्माण के लिए जानी जाती है जिसमें 12008 शालिग्राम हैं जिन्हें नेपाल की नदी गंधकी के किनारों से लाया गया था। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का गर्भगृह एक चट्टान पर स्थित है और मुख्य प्रतिमा जो लगभग 18 फीट लंबी है, को अलग-अलग दरवाजों से देखा जा सकता है। पहले दरवाजे से सिर और सीना देखा जा सकता है जबकि दूसरे दरवाजे से हाथ और तीसरे दरवाजे से पैर देखे जा सकते हैं।
सौंदर्य और वास्तुशिल्प: इस मंदिर का वास्तुशिल्प पत्थर और कांसे पर की गई नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के अंदरूनी हिस्सों में सुंदर चित्र और भीति चित्र उकेरे गए हैं। इनमें से कुछ चित्र भगवान विष्णु की लेटी हुई मुद्रा, नरसिम्ह स्वामी (आधा सिंह, आधा नर जो भगवान विष्णु का रूप है), भगवान गणपति और गज लक्ष्मी की छवियाँ हैं। इस मंदिर का ध्वज स्तंभ लगभग 80 फीट ऊंचा है जिसे स्वर्ण लेपित तांबे की चादरों से ढंका गया है। इस मंदिर में कुछ रोचक ढांचे भी है जो बालि पीडा मंडपम और मुख मंडपम के रूप में हैं। यह बड़े हॉल हैं जिन्हें विभिन्न हिंदू देवताओं की सुंदर कलाकृतियों से सजाया गया है। एक और ढांचा जो आपका ध्यान आकर्षित करेगा, वह नवग्रह मंडपा है जिसकी छत पर नव ग्रह दिखाई देंगे।
गलियारा: पूर्वी हिस्से से लेकर गर्भगृह तक एक बड़ा गलियारा है जिसमें 365 और एक तिहाई कलाशिल्प वाले ग्रेनाइट पत्थर के खंबे हैं जिनमें सुंदर नक्काशी की गई है। पूरब की तरफ मुख्य प्रवेश द्वार के नीचे भूतल है जिसके नाटक शाला कहा जाता है जहाँ मलयालम महीने मीनम और तुलम के दौरान आयोजित वार्षिक दस दिवसीय त्यौहार में केरल के शास्त्रीय कला रूप – कथकली का प्रदर्शन किया जाता है।
श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में पूजा करने का समय
सुबह का समय – 03:30 बजे से 04:45 बजे तक (निर्माल्य दर्शन) 06:30 बजे से 07:00 बजे तक 8.30 बजे से 10:00 बजे तक 10:30 बजे से 11:10 बजे तक 11:45 बजे से 12:00 बजे तक शाम का समय – 05:00 बजे से 06:15 बजे तक 06:45 बजे से 07:20 बजे तक है
मंदिर में पोशाक पहनने का नियम इस प्रकार है
मंदिर में केवल हिंदु ही प्रवेश कर सकते हैं। पोशाक पहनने का सख्त नियम है जिसका पालन मंदिर में प्रवेश करते समय करना होता है। पुरुषों को मुंडु या धोती (जो कमर में पहना जाता है और नीचे ऐड़ी तक जाता है) और किसी भी तरह की कमीज़ या शर्ट की अनुमति नहीं है। महिलाओं को साड़ी, मुंड़ुम नेरियतुम (सेट- मुंडु), स्कर्ट और ब्लाउज़ या आधी साड़ी पहनना होता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर किराए पर धोती उपलब्ध रहते हैं। आजकल मंदिर के अधिकारी भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पैंट या चूड़ीदार के ऊपर धोती पहनने की अनुमति दे रहे हैं। अधिक जानकारी के लिए लॉग ऑन कर सकते हैं।
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