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‘एक देश एक चुनाव’ लागू करवाने से भारत में संवैधानिक संकट उत्पन्न की आशंका?

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‘एक देश एक चुनाव’ लागू करवाने से भारत में संवैधानिक संकट उत्पन्न की आशंका?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट9822550220

नई दिल्ली । लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के पीछे कई तरह के तर्क दिए जाते रहे हैं. एक साथ चुनाव करवाने से देश मे संवैधानिक संकट यानी माहौल विगड सकता है? हालकि दावा किया जाता है कि एक साथ चुनाव होने से देश के विकास कार्यों में तेज़ी आएगी. चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होते ही सरकार कोई नई योजना लागू नहीं कर सकती है. आचार संहिता के दौरान नए प्रोजेक्ट की शुरुआत, नई नौकरी या नई नीतियों की घोषणा भी नहीं की जा सकती है और इससे विकास के काम पर असर पड़ता है.
आशंका व्यक्त की जा रही है कि भाजपा पर घात लगाए बैठै विपक्षी INDIA गठबंधन के नेता देश का माहौल बिगाड सकते है? एक साथ चुनाव के विरोध में विपक्षी दलों के नेतागण धरना आंदोलन और वाद-विवाद तथा झगडा फसाद पर उतारु हो सकते है। परिणामतं: देश में भारी तनाव और हिंसात्मक और ग्रह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
यह भी तर्क दिया जाता है कि एक चुनाव होने से चुनावों पर होने वाले ख़र्च भी कम होगा. इससे सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ट्यूटी से भी छुटकारा मिलेगा. भारत में साल 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव एक साथ ही होते थे. साल 1947 में आज़ादी के बाद भारत में नए संविधान के तहत देश में पहला आम चुनाव साल 1952 में हुआ था.
उस समय राज्य विधानसभाओं के लिए भी चुनाव साथ ही कराए गए थे, क्योंकि आज़ादी के बाद विधानसभा के लिए भी पहली बार चुनाव हो रहे थे. उसके बाद साल 1957, 1962 और 1967 में भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ ही हुए
यह क्रम पहली बार उस वक़्त टूटा था जब केरल में साल 1957 के चुनाव में ईएमएस नंबूदरीबाद की वामपंथी सरकार बनी. इस सरकार को उस वक़्त की केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लगाकर हटा दिया था. केरल में दोबारा साल 1960 में विधानसभा चुनाव कराए गए थे.
मोदी सरकार के लिए ‘एक देश एक चुनाव’ लागू कराना वाक़ई इतना आसान है?
साल 2018 में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त रहे ओपी रावत के मुताबिक़ साल 1967 के बाद कुछ राज्यों की विधानसभा जल्दी भंग हो गई और वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, इसके अलावा साल 1972 में होनेवाले लोकसभा चुनाव भा समय से पहले कराए गए थे.
साल 1967 के चुनावों में कांग्रेस को कई राज्यों में विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था. बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा (उस वक़्त उड़ीसा) जैसे कई राज्यों में विरोधी दलों या गठबंधन की सरकार बनी थी. इनमें से कई सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं और विधानसभा समय से पहले भंग हो गई थी.
इस तरह से साल 1967 के बाद बड़े पैमाने पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने का सिललिला टूट गया. भारत की मौजूदा केंद्र सरकार इसे दोबारा एक साथ कराना चाहती है.
इसमें समस्या यह है कि अब भारत में कांग्रेस जैसी कोई एक पार्टी नहीं है, जिसकी केंद्र के साथ ही ज़्यादातर राज्यों में अपनी सरकार हो. ऐसे में केंद्र और राज्य से बीच सामंजस्य आसान नहीं होगा.
ओपी रावत साल 2015 में चुनाव आयोग में ही नियुक्त थे. उनके मुताबिक़ उसी दौरान केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग से पूछा था कि क्या लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना व्यावहारिक है और इसके लिए क्या क़दम उठाए जाने ज़रूरी हैं? “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की पैरवी क्यों करते हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का क्या कहना है?
ओपी रावत का कहना है, “चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को बताया था कि दोनों चुनाव साथ कराना संभव है. इसके लिए सरकार को चार काम करना होगा. इसके लिए सबसे पहले संविधान के 5 अनुच्छेदों में संशोधन ज़रूरी होगा. इसमें विधानसभाओं के कार्यकाल और राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रावधानों को बदलना होगा.”
इसके अलावा निर्वाचन आयोग ने बताया था कि जन प्रतिनिधित्व क़ानून और सदन में अविश्वास प्रस्ताव को लाने के नियमों को बदलना होगा. इसके लिए ‘अविश्वास प्रस्ताव’ की जगह ‘रचनात्मक विश्वास प्रस्ताव’ की व्यवस्था करनी होगी.
यानी अविश्वास प्रस्ताव के साथ यह भी बताना होगा कि किसी सरकार को हटाकर कौन सी नई सरकार बनाई जाए, जिसमें सदन को विश्वास हो, ताकि पुरानी सराकर गिरने के बाद भी नई सरकार के साथ विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल पांच साल तक चल सके
निर्वाचन आयोग ने इस तरह के चुनाव के लिए कुल 35 लाख़ ईवीएम की ज़रूरत बताई थी और इसके लिए नए ईवीएम की ख़रीदारी की ज़रूरी है.
भारत में इस्तेमाल होने वाले एक ईवीएम की क़ीमत क़रीब 17 हज़ार और एक वीवीपीएटी की भी क़ीमत क़रीब इतनी ही है. ऐसे में ‘एक देश एक चुनाव के लिए’ क़रीब 15 लाख़ नए ईवीएम और वीवीपीएटी की ज़रूरत होगी.
ओपी रावत के मुताबिक़ अगर चुनाव आयोग को आज के हिसाब से क़रीब बारह लाख़ अतिरिक्त ईवीएम और वीवीपीएटी की ज़रूरत होगी तो इसे बनवाने में एक साल से ज़्यादा का समय लग सकता है.
भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने बीबीसी को बताया है कि अगर लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाएं तो इसके लिए मौजूदा संख्या से तीन गुना ज़्यादा ईवीएम की ज़रूरत पड़ेगी.

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