श्रीमद्भागवत गीता मे निस्वार्थ समाज सेवा कर्म को बहुत महत्व
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट
वृंदावन । श्रीमद्भगवद्गीता में निस्वार्थ भाव से समाज सेवा और निष्काम भाव से निःस्वार्थ कर्म को बहुत महत्व दिया गया है। गीता में, भगवान कृष्ण अर्जुन को कर्म योग का उपदेश देते हैं, जिसमें कर्मों के फल की इच्छा किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन करना शामिल है।
निस्वार्थ समाज सेवा का वर्णन: कर्म योग: गीता में कर्म योग का सिद्धांत है, जो बताता है कि मनुष्य को अपने कर्मों के फल की इच्छा किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
निष्काम कर्म: इसका मतलब है कि कर्मों के प्रति आसक्ति (फल की इच्छा) न रखना।
सेवा परम धर्म: गीता में सेवा को परम धर्म माना गया है।
अहंकार का त्याग: निस्वार्थ सेवा अहंकार को कम करती है और मन को शुद्ध करती है।
मानसिक शांति: निस्वार्थ सेवा से आध्यात्मिक संतुष्टि और मानसिक शांति मिलती है।
ईश्वर की सेवा: गीता में मानव जाति की सेवा को भगवान की सेवा के रूप में करने का संदेश है।
उदाहरण: अर्जुन को युद्ध लड़ने का कर्तव्य सौंपा गया था। भगवान कृष्ण ने उसे फल की इच्छा किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए कहा।
महात्मा गांधी ने गीता के इस संदेश का पालन किया और मानव जाति की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
निष्कर्ष: गीता में निस्वार्थ समाज सेवा का संदेश है कि हमें अपने कर्मों के फल की इच्छा किए बिना, दूसरों की सेवा करनी चाहिए।
वृंदावन। श्रीमद्भगवद्गीता में निस्वार्थ भाव से समाज सेवा कर्म को बहुत महत्व दिया गया है। गीता में, भगवान कृष्ण अर्जुन को कर्म योग का उपदेश देते हैं, जिसमें कर्मों के फल की इच्छा किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन करना शामिल है।
निस्वार्थ समाज सेवा का वर्णन:कर्म योग: गीता में कर्म योग का सिद्धांत है, जो बताता है कि मनुष्य को अपने कर्मों के फल की इच्छा किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
निष्काम कर्म: इसका मतलब है कि कर्मों के प्रति आसक्ति (फल की इच्छा) न रखना।
सेवा परम धर्म: गीता में सेवा को परम धर्म माना गया है।
अहंकार का त्याग:निस्वार्थ सेवा अहंकार को कम करती है और मन को शुद्ध करती है।
मानसिक शांति: निस्वार्थ सेवा से आध्यात्मिक संतुष्टि और मानसिक शांति मिलती है।
ईश्वर की सेवा: गीता में मानव जाति की सेवा को भगवान की सेवा के रूप में करने का संदेश है।
उदाहरण: अर्जुन को युद्ध लड़ने का कर्तव्य सौंपा गया था। भगवान कृष्ण ने उसे फल की इच्छा किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए कहा।
महात्मा गांधी ने गीता के इस संदेश का पालन किया और मानव जाति की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
निष्कर्ष: गीता में निस्वार्थ समाज सेवा का संदेश है कि हमें अपने कर्मों के फल की इच्छा किए बिना, दूसरों की सेवा करनी चाहिए।
भागवत गीता की शिक्षाओं के आधार पर, आप एक आदर्श समाज और राज्य की कल्पना कैसे करेंगे?
भागवत नहीं भगवद्गीता है। दूसरी बात भगवद्गीता समाज या राज्य के लिए नहीं अपितु आत्मिक उत्थान यानी आध्यात्मिक यात्रा की एक दार्शनिक किताब है। जिससे आप अपने जीवन में और समाज में कई तरीकों से उतार सकते हैं। गीता एक आत्मिक गान हैं, जो श्री कृष्ण जैसे महापुरुष के कंठ से ही उतर सकता था। हालांकि गीता में जो भी बाते हैं, वो उपनिषद और वेदांत का सार हैं, पर अगर आपको गीता से समाज और राज्य की आदर्श रुपी तस्वीर खींचनी है, तो जवाब तो साफ है, आदर्श समाज वही हैं, जिसमें बंधन न हो, जो सभी को व्यक्तिगत और आत्मिक विकास का अवसर दे। जिसमें ज्ञान और अध्यात्म और प्रेम की प्रधानता हो। आदर्श राज्य जिसमें अधिकारी और नेता वर्ग अपना काम बिना स्वार्थ ईमानदारी से करे, जनता ईमानदार हो।
आपके लिए भागवत गीता के क्या मायने हैं?
एक दिन चेन्नई में समुद्र के किनारे धोती व शाल पहने हुए एक सज्जन भगवद गीता पढ़ रहे थे, तभी वहां एक लड़का आया और बोला, आज साइंस का जमाना है, फिर भी आप लोग ऐसी किताबे पढ़ते हो, देखिए जमाना चांद पर पहुंच गया है और आप लोग वही गीता और रामायण पर ही अटके हुए हो? उन सज्जन ने उस लड़के से पूछा, आप गीता के विषय में क्या जानते हो? वह लड़का जोश में आकर बोला अरे छोड़ो! मैं विक्रम साराभाई रीसर्च संस्थान का छात्र हूँ, आई एम ए साइंटिस यह गीता बेकार है हमारे लिये।
वह सज्जन हसने लगे, तभी दो बड़ी बड़ी गाड़िया वहां आयीं। एक गाड़ी से कुछ ब्लैक कमांडो निकले और एक गाड़ी से एक सैनिक, ने पीछे का दरवाजा खोला तो वो सज्जन पुरुष चुपचाप
श्रीमद भगवत गीता को विद्यालयों में क्यों नहीं पढ़ाया जाता है?
इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन से जुड़े उपदेश दिए हैं। इसमें परमात्मा की शक्ति को बताया गया है। गीता को स्कूल व कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं करने से लोग इस ज्ञान से वंचित हो रहे हैं। याचिका में इस ग्रंथ को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल करने के उपरांत कॉलेज में शोध का विषय बनाने की मांग की गई है।
साथ ही बताया गया है कि अमेरिका के एक विश्वविद्यालय ने गीता को पाठ्यक्रम में शामिल कर अनिवार्य विषय किया है। जब विदेश में भीमद् भगवद् गीता को अनिवार्य किया है तो भारत में भी होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए मामले को बहस के लिए 15 जनवरी को रखने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से श्रीमद् भगवद् गीता की प्रति, उसके उद्देश्य सहित अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है।
गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग को लेकर संभवतः पहली बार देश के किसी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एसके मेनन, किरण अग्रवाल व चंद्रप्रभा पैरवी कर रहे हैं।
आप व्यक्तिगत रूप से अष्टवक्र गीता की समीक्षा कैसे करेंगे?
अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत के उच्चतम ग्रन्थों में से एक है। इसमें अद्वैत ज्ञान का निरूपण भी है, मुक्ति के चरणबद्ध उपाय भी है और एक ब्रह्मज्ञानी की बात भी है।
विदेह के राजा जनक एक प्रतापी एवं काबिल शासक हैं, जो सभी प्रकार से सम्पन्न और प्रसन्न हैं फिर भी उन्हें एक आंतरिक अपूर्णता सताती है। इसलिए समाधान हेतु वे ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं जिनकी उम्र मात्र ग्यारह वर्ष है।
राजा जनक अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उनसे प्रश्न करते हैं – वैराग्य कैसे हो? मुक्ति कैसे मिले?
जनक उवाच –
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो।। (१.१)
(जनक जी बोले – हे प्रभो
गीता की शिक्षा का सार किस पर केंद्रित है ?
भगवद गीता की शिक्षा का सार मुख्य रूप से चार प्रमुख सिद्धांतों पर केंद्रित है:
कर्मयोग (कर्म का सिद्धांत): गीता सिखाती है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन निस्वार्थ भाव से करना चाहिए, बिना फल की चिंता किए। इसे “निष्काम कर्म” कहा जाता है। यह कर्मयोग का मार्ग है, जहाँ कर्म को ईश्वर को अर्पित करते हुए निष्पादन करना चाहिए।
ज्ञानयोग (ज्ञान का सिद्धांत): गीता के अनुसार, आत्मा और परमात्मा के ज्ञान का बोध ही सच्चा ज्ञान है। आत्मा अविनाशी और शाश्वत है, और यह शरीर के नष्ट होने पर भी अजर-अमर रहती है। इस आत्मज्ञान को प्राप्त करना व्यक्ति के जीवन का प्रमुख उद्देश्य है।
भक्तियोग (भक्ति का सिद्धांत): गीता में भक्ति का महत्व बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी भक्ति करता है, वह उन्हें प्राप्त करता है। भक्ति से व्यक्ति भगवान के निकट पहुँचता है और आत्मिक शांति प्राप्त करता है।
धर्म और अधर्म (धार्मिक और नैतिक मूल्यों का सिद्धांत): गीता में धर्म (सत्य और न्याय) और अधर्म (असत्य और अन्याय) के बीच का अंतर समझाया गया है। व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
इन सिद्धांतों के माध्यम से भगवद गीता व्यक्ति को आत्मिक ज्ञान, नैतिकता, और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संतुलन और सामंजस्य बनाए रखने की शिक्षा देती है।
आप व्यक्तिगत रूप से अष्टवक्र गीता की समीक्षा कैसे करेंगे?
अष्टावक्र गीता को किताब के रूप में देखना उचित नहीं होगा और इसलिए इसकी साहित्यिक समीक्षा करना भी अनुचित होगा ।
एक जीवित गुरु जब एक मुमुक्ष शिष्य के हृदय में झांक कर देख लेता है कि अब शिष्य तैयार है तब ऐसे वचन स्वतः प्रकट होते हैं।
अब बिना ध्यान किए , बिना अंतर्दृष्टि को उपलब्ध हुए , सिर्फ बाह्य अनुभव से इस ग्रंथ के बारे में कोई भी साहित्यिक विवेचना नहीं की जा सकती यह , ग्रंथ इन सब के पार है।
मुझ से यदि पूछा जाए कि जीवन में सब से मूल्यवान क्या है, तो मेरा तो यही उत्तर होगा कि सब से मूल्यवान है ध्यान में बीते हुए क्षण , ईश्वर के स्मरण मात्र से जो स्फूर्ति , जो उत्साह और जो आनंद प्राप्त होता है वह अतुल्य है, संसार में उपलब्ध कोई वस्तु, धन , पद , प्रतिष्ठा उस अवस्था तक नहीं पहुंचा सकती ।
और पहुंचना कहां है? मोक्ष कोई पद भी नहीं है, वह बहुत गहरे भीतर हमारा स्वभाव है , यह प्राप्त करने की बात भी नहीं है, जो स्वतः मिला ही हुआ है वह प्राप्त कैसे होगा , बस आँखें खोलने वाली बात है।
और बिना इन आंखों को खुले अष्टावक्र गीता की सिर्फ साहित्यिक समीक्षा करना मतलब वही बात हो गई कि कई प्रकाशवर्ष की यात्रा क्षणों में संपन्न करने वाली अंतरिक्ष यान खड़ी है , और हम उसे मोटरसाइकिल समझ कर कच्चे रोड में दौड़ा रहे हैं या उसमें सिर्फ मोबिल, पेट्रोल डाल कर खुश हो रहे हैं , और यान वहीं की वहीं खड़ी है !
जो शब्द अष्टावक्र गीता में हैं वे क्षण भर में भीतर के विशिष्ट अवस्था को जन्म देते हैं, उस अवस्था को अनुभव किए बिना अष्टावक्र गीता संपूर्ण नहीं होती ।
इस ग्रंथ की तुलना एक ऐसे यंत्र से की जा सकती है ,जो क्षण भर में सभी भ्रमों से मुक्त कर परम समाधि अवस्था तक पहुंचा देती है, और इस अर्थ में मानवता के इतिहास में सब से शक्तिशाली मंत्र कहे जा सकते हैं !
हमारी भावी पीढ़ी धार्मिक और संस्कारी बने इसके लिए क्या यह उचित नहीं होगा कि उन्हें स्कूल के सिलेबस में गीता के स्थान पर भागवत पुराण का दशम स्कंध पढ़ाया जाए ताकि वह भी भगवान् श्रीकृष्ण के आदर्शों पर चल कर एक सफल और आदर्श जीवन जी सके ?
आपके विचार तो अती उतम है जब मदरसो मे कुरान तक पढाइ जा सकती है तो हमारे स्कुलो मे भगवान श्री कृषण और राम की अनेको लिलाए कयो नही पढाइ जा सकती है अवशय पढाइ जा सकती है आपके इस विचार मै तो पुरा सहमत हुं और आपके विचारो से असली सनातनी भी अवशय सहमत होगे
केवल जो नकली सनातनी है और अन्य धरमो के लोग है वो ही आपकी इस बात से सहमत नही होगे
अगर हमारे स्कुलो मे हमारे सनातन धरम की शिक्षा दि गइ होती तो आज के समय मे ना तो इतने हिन्दु नास्तिक होते और ना ही हमारे धरम पर कोइ उगली उठाता और ना ही हमारे धरम का यो कोइ मजाक बना रहा होता
लेकिन बीती ताही बिसारी देह आगे की सुदी ले ,पिछे जो हुआ उसे भुलने मे ही लाभ होता है अगर अब भी यह शिक्षा लागु हो जाए तो संसार की कोइ ताकत नही है सनातन के आगे ज्यादा समय ठहर सके
भाई साहब जी मै आपकी सोच का पुरा समान करता हुं
आपके लिए भागवत गीता के क्या मायने हैं?
धन्यवाद अनुरोध के लिए। २०१८ नवंबर में मैने अपना घर एरिया सब छोड़ दिया और व्हाइट फिल्ड से कुमार ले आउट अपने एक रिश्तेदार के घर के पास ही रेंट पर आ गई। सोचा इससे यादों से दूर भाग पाऊंगी। और एक दिन वहां के स्कॉन टेंपल के एक सत्संग मे गई, जहां गीता का पाठ चल रहा था।
मेरा मन उस सत्संग में नहीं लगा, और इस बात को कोई बहुत अच्छे से नोटिस कर रहा था। सत्संग समाप्त हुआ और प्रसाद वितरण होने लगा। मै अभी भी अपनी जगह पर बैठी एक टक से कृष्ण की मूर्ति निहार रही थी।
एक ५५ साल के बुजुर्ग अंकल आए और मेरे बगल में बैठ गए। और बिना कोई वार्तालाप किए मुझे एक अनमोल भागवत ज्ञान दिया। उसे ही मै बताती हू।
“एक लम्बी सी रेलगाड़ी है ये जीवन । लेकिन सभी यात्रियों की मंजिल अलग है। सबको अपने नियति का सफर तय करके अपने मंजिल (स्टेशन) पर उतर जाना है। कुछ की मंजिल जल्दी आती है, कुछ को लंबी यात्रा के बाद, लेकिन उतरना तो सबको है। कुछ यात्री ऐसे भी है जो यात्रा के दौरान अपने सहयात्रियों के प्रति मोह से बंध जाते है, उन्हें उतरने मे तकलीफ़ होती है, लेकिन सफर का अंत तो पूर्वनिश्चित है।
ठीक इसी प्रकार, हर एक आत्मा को यहां अकेले ही सफर करना है, जो उनके आस पास है ये सिर्फ मोह और माया के बंधन है।”
आत्मा ना तो जन्म लेती है, ना उसकी मृत्यु होती है। सिर्फ अपने कर्म अनुसार कपड़े बदलती है।और ये क्रम तब तक चलता है जब तक वो मोक्ष को प्राप्त ना हो जाए।
बदलाव संसार का नियम है, जो आज है वो कल ना था, और ना कल होगा। कल जो बीज था आज पौधा है और कल पेड़ बनेगा। लेकिन फिर सूखकर मिट्टी में मिल जाएगा। जब मिट्टी की चीज मिट्टी में ही मिलनी तय है तो शोक कैसा? अपने अंदर के परिवर्तन को स्वीकार करना ही दुखों की मुक्ति है।
ईश्वर ने संसार में ऐसा कुछ भी नहीं बनाया जो इंसान के लिए गलत है। अगर कृष्ण कुछ छीनते है तो उससे भी बेहतर कर के ही लौटाते है। आज का दुख ही भविष्य में खुशियों की कुंजी बनेगी। जो भी होता है उसमें तेरा ही भला निहित है, देर सवेर पता चल ही जाता है।
सिर्फ शरीर मरता है, आत्मा अमर है। जीर्ण शरीर का आवरण आत्मा बदलकर वापस जन्म लेती है।
ये तेरे अच्छे कर्म है कि तुझपर भागवत कृपा हुई, तेरे किस्मत मे पुत्र वियोग तो पहले ही से लिखा था, लेकिन ईश्वर ने नन्ही आयु में छीनकर तुझे ये आश्वासन दिया की तू उसे एक बार फिर से पा सकती है। वरना ऐसे भी लोग है जिनके पुत्र भरी जवानी मे मृत्यु को प्राप्त होते है,सोचो उस मां का दर्द जो वापस उसे नहीं पा सकती। हर कार्य और होनी के पीछे कोई ने कोई कारण अवश्य होता है।और अगर वो तेरे भाग्य मे है तो वापस आएगा।
मेरा बेटा (उन अंकल) जन्म से ही विकलांग है। आज जवान हो गया है, पत्नी नहीं है अब मेरी। रोजाना अपने बेटे को मंदिर लाता हूं, उसकी सेवा करता हूं, ये मेरे पिछले जन्म के अधूरे कर्म है जो इस जन्म मे चुका रहा हूं।
कृष्ण कहते है, ” तुम स्वयं अपने भाग्य निर्माता हो, तुम जैसी सोच रखोगे वैसा ही पाओगे। जो तुम सृष्टि से मांगोगे वही सृष्टि तुम्हें लौटाएगी”
विश्वभारत News Website