Breaking News

ईश्वरीय मर्यादाओं के खिलाफ कार्यों मे संलग्न रहते है “वर्णसंकर”

Advertisements

ईश्वरीय मर्यादाओं के खिलाफ कार्यों मे संलग्न रहते है “वर्णसंकर”

Advertisements

टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:

Advertisements

9822550220

 

यह कहावत आम तौर पर पुरानतन भारतीय वैदिक सनातन धर्म पौराणिक, ऐतिहासिक या वैचारिक संदर्भों में वर्णसंकर महिला-पुरुषों में सत्य/धर्म (ईमानदारी) और अधर्म (झूठ/धोखा) के बीच टकराव को बताती है। भागीरथ गंगासागर के किनारे धुनी रमाए जूनापीठ अखाड़े के नांगा सन्यासी मंहत महेश गिरी ने बताया कि जो लोग नैसर्गिक कुदरती दैवीय नियमों के खिलाफ काम करते हैं, उन्हें वर्णसंकर कहा जाता है। उनमें से ज़्यादातर दूसरे आदमियों की नाजायज़ औलादें होती हैं। उनके व्यवहार का पता उनके चरित्र, स्वभाव चाल-चलन और कार्यप्रणालियों के तौर तरीकों से चलता है। ऐसे पिता और बेटे सच्चे और कुदरती नियमों के रास्ते पर चलने वाले सच्चे लोग होते हैं। वर्णसंकर किस्म लोग सत्तासुख और धनपिपासा के मद्देनजर अक्सर झूठ, धोखा, छल, कपट, बेईमानी से नफ़रत करने और सच्चे आदमियों के खिलाफ नफरत फैलाने में माहिर होते हैं। नेगेटिव और नकारात्मक सोच वाले लोग वर्णसंकर कहलाते हैं। शास्त्रों के अनुसार नपुंसक पुरुषों की संतान को भी वर्णसंकर कहा जाता है। जो सघन परिवार की महिलाएं बच्चे पैदा करने की लालसा से दूसरे पुरुषों से अनैतिक संतान पैदा करने में माहिर होती हैं। कुटला कर्कशा और वैश्या किस्म की महिलाओं को भी वर्णसंकर कहा जाता है। उन्हें डबल ब्रीड भी कहा जाता है। ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में, इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो भगवान की ‘मर्यादाओं’ का पालन नहीं करता है या जिसके कामों में अनैतिकता और हाइब्रिड (मिले-जुले) विचार शामिल होते हैं जो दोगली समाज के लिए नुकसानदायक होते हैं।

यह वाक्यांश उस व्यक्ति की निंदा करता है जो सच्चाई को दबाने के लिए नकारात्मक तरीकों का इस्तेमाल करके अत्यधिक धन संग्रह की लालसा रखता है।

नांगा संत महेश गिरी महाराज ने आगे बताया है कि अन्य गोत्र वाली महिला-पुरुषों विशेषकर विदेशी पुरुषों और विदेशी महिलाओं के साथ अनैतिक यौन संबंध और दूसरे से अनैतिक यौन संबंध रखने वाले पुरुषों और महिलाओं की संतानों को भी वर्णसंकरित कहा जाता है।वर्णसंकर के संबंध मे श्रीमद्भागवत गीता के प्रथम अध्याय मे सविस्तार विवरण प्रस्तुत है.

वेदों और शास्त्र सम्मत परंपराओं (विशेषकर गीता) में वर्णसंकर को सामाजिक -पारिवारिक मूल्यों में गिरावट और अनैतिक संबंधों से उत्पन्न ‘मिश्रित जाति’ या ‘वर्णों के संकरण’ के रूप में देखा गया है, जो कुलधर्म को नष्ट करता है। यह सामाजिक व्यवस्था में अराजकता का कारण माना जाता है, जिससे धार्मिक, पारिवारिक परंपराएं और नैतिकता नष्ट हो जाती है।

वर्णसंकर का वेदों/शास्त्रों में महत्व और दृष्टिकोण:

सामाजिक विघटन का प्रतीक: भगवद्गीता (1:41) के अनुसार, जब वर्णों में मिश्रण होता है, तो कुल-स्त्रियां दूषित होती हैं, जिससे वर्णसंकर पैदा होते हैं।

नैतिकता में गिरावट: ऐसे व्यक्ति (वर्णसंकर) जो अपनी परंपराओं (कुलधर्म) को भूल जाते हैं, उनका जीवन उच्च मूल्यों से रहित होता है, जो अंततः समाज के पतन का कारण बनता है।

कुल धर्म का विनाश: वर्णसंकर के कारण पूर्वजों की श्राद्ध परंपराएं बंद हो जाती हैं, जिससे पितरों का पतन होता है।

जातियों की उत्पत्ति: पौराणिक काल में, मुख्य रूप से अनुलोम (उच्च पुरुष-निम्न स्त्री) और प्रतिलोम (निम्न पुरुष-उच्च स्त्री) विवाहों के माध्यम से वर्णसंकर जातियों (जैसे उग्र, चाण्डाल) की अधिकता मानी गई है।

विवाह के प्रति चेतावनी: यह अवधारणा मुख्य रूप से समान मानसिकता, पारिवारिक पृष्ठभूमि और समान मूल्यों (कुलधर्म) के साथ विवाह करने के महत्व को रेखांकित करती है, ताकि वैवाहिक और पारिवारिक संघर्ष न हो।

संक्षेप में, पारंपरिक दृष्टिकोण में वर्णसंकर को एक “अभिशाप” माना गया है, जिसका अर्थ समाज के नैतिक संतुलन में कमी और परंपराओं का नाश करना है

 

सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-

 

उपरोक्त खबर धर्मशास्त्र सम्मत पर आधारित सामान्य ज्ञान पर आधारित है और यह एक वैचारिक अभिव्यक्ति है जो किसी भी विशेष विचारधारा के साहित्य से प्रेरित हो सकती है। अधिक जानकारी के लिए कोई भी आध्यात्मिक विज्ञान के किसी एक्सपर्ट से सलाह ले सकता है

Advertisements

About विश्व भारत

Check Also

सत्ता के भूखे चरित्रहीन राजा से नैसर्गिक न्याय की अपेक्षा रखना उचित नहीं?

सत्ता के भूखे चरित्रहीन राजा से नैसर्गिक न्याय की अपेक्षा रखना उचित नहीं? टेकचंद्र सनोडिया …

चारित्र्यहीन राजाकडून नैसर्गिक न्यायाची अपेक्षा योग्य नाही का?

चारित्र्यहीन राजाकडून नैसर्गिक न्यायाची अपेक्षा योग्य नाही का? टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: ९८२२५५०२२०   राज्याच्या कारभारात …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *