राजनीति की छत्रछाया में वर्णसंकर और वामपंथियों की करतूत चिंतनीय
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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नई दिल्ली। इस देश का दुर्भाग्य यह है कि भारतीय राजनीति गलियारों की छत्रछाया में बढती वामपंथी विचारधारा और मिश्रित (hybrid) पिता की नाजायज औलादों में वृद्धी एक गहन चिंता का विषय बना हुआ है.वामपंथी उदारवादी दृष्टिकोण वाले लोगों का प्रभाव एक जटिल समस्या का विषय बनता जा रहा है. जो बदलती सामाजिक संरचनाओं वैश्वीकरण और युवा पीढ़ी के रुझानों से जुड़ा है।
वामपंथी और वर्णसंकरित किस्म के लोगों की खासियत यह है के वे अपने निज स्वार्थ के खातिर सच्चाई जाने बिना दुर्भावनाओं के आवेश में किसी भी निर्दोष समाज सेवी विद्धानों का भविष्य बर्बाद कर बैठते हैं. मनगढंत बनावटी और बेबुनियाद झूठी शिकायत कर पुलिस विभाग और मीडिया को असलियत से गुमराह करते हैं
हैं.इस देश का पुलिस विभाग भी सच्चाई जाने बिना झूठा मामला दर्ज कर लिया जाता हैं.अंतत: न्यायालय मे मामले का अध्ययन और अवलोकन के पश्चात प्रकरण खारिज हो जाता हैं.
वामपंथियों- वर्णसंकरित नेताओं की एक और खासियत यह है कि वे पुलिस विभाग सहित अन्य विभाग के अधिकारियों को अपने इशारों नचाते और अनियमितता और विकास कार्यों में संलग्न कंपनिय् से लाखों करोडों रुपए अवैध कमीशन उगाही को अंजाम देते है.और इनकी करतूतों की वजह से वेदाग निष्कलंक और निष्पाप लोगों को मानसिक और आर्थिक नुकसान सहना पड रहा है.चुंकी ईमानदार और सत्यवादी लोगों की वजह से वर्णसंकरित नेताओं के अवैध कारोबारी भ्रष्ट राजनेताओं को बडा धक्का लगता है.ये वर्णसंकरित नेता और अवैध धंधा कारोबारी मतदाता जनता-जनार्दन और ग्राहकों को अपना गुलाम बनाए रखना चाहते हैं.इसलिए वै किसी को भी अपने से उपर उठते देखना पसंद नहीं करतै हैं.वामपंथियों के आचरण के संबंध मे बतादें कि वे वर्णसंकरित दिखावा तो निर्व्यशनी शाकाहारी ईमानदार दानसूर और सच्चे समाज सेवक का करते हैं.परंतु इनके आचरण और कार्यप्रणालिंयों सनातन धर्म सांस्कृतिक के लिए नुकसान दायक हैं. वर्णसंकरित नेता अत्याधिक नशापान और पराई स्त्रियों संग व्यभिचार के शौकीन होते हैं. वर्णसंकरित नेताओं ने अनेकानेक अधेड किस्म खूबसूरत महिलाओं और गुलाम कार्यकरताओं को आर्थिक लाभ का अवसर प्रदान किया है.
इतना ही नहीं एसे लोग राजनीतिक की दुकानदारी के माध्यम से अनाप-शनाप करोडों रुपए संग्रहित करते हैं और मनमाने तरीके से चरमसुख अय्याशी मे उडाते हैं.इतना ही नहीं वे पाश्चात्य देशों की यात्रा करते फिरते हैं.एसी तथाकथित राजनीति से भारतीय वैदिक सनातन संसकृति हिन्दू धर्म पर खतरा मंडराता जा रहा हैं. दरअसल मे वर्तमान परिवेश में वामपंथ और वर्णसंकरित समाज का प्रभाव बढता ही जा रहा है. वामपंथी विचारधारा आमतौर पर आर्थिक समानता सामाजिक न्याय और सरकार के हस्तक्षेप का समर्थन करती है। भारत में यह स्वतंत्रता संग्राम से लेकर अब तक एक वैचारिक धारा के रूप में मौजूद रही हैजो हाशिए पर रहने वाले वर्गों के मुद्दों को उठाती है।
युवाओं में आकर्षण: शोध बताते हैं कि 17 से 20 साल के युवाओं में अक्सर ‘एंटी-सिस्टम’ या यथास्थिति को बदलने वाली प्रवृत्ति होती हैजो उन्हें वामपंथी या उदारवादी विचारधारा की ओर आकर्षित कर सकती है।
वैश्वीकरण का असर: वैश्वीकरण के साथराजनीतिक बहस आर्थिक मुद्दों से सांस्कृतिक युद्धों में बदल गई हैजिससे पारंपरिक दक्षिणपंथी विचारधारा के सामने नई चुनौतियां आई हैं।
मिश्रित (Hybrid) विचारधारा: आजकल ‘हाइब्रिड’ या मिश्रित विचारधारा वाले लोग (जो न तो पूरी तरह वामपंथी हैं और न ही दक्षिणपंथी) राजनीति में बढ़ रहे हैं। ये लोग अक्सर रूढ़िवादी सामाजिक ढांचे के बजाय प्रगतिशील और उदारवादी दृष्टिकोण अपनाते हैं।
क्षेत्रीय और जातिगत प्रभाव: भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद और जाति आधारित राजनीति भी एक प्रमुख कारक हैजो सामाजिक न्याय के नाम पर प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती है।
इन विचारधाराओं का उदय आधुनिकताडिजिटल मीडिया और बदलते सामाजिक समीकरणों का परिणाम है
सनातन धर्म विरोधी होते हैं वामपंथी समुदाय के लोग
धर्मनिरपेक्षता सामाजिक समानता और परंपराओं के स्थान पर तर्कवाद को प्राथमिकता देती है जिसके कारण अक्सर उनका टकराव सनातन धर्म की पारंपरिक मान्यताओं से होता है। कुछ वामपंथी परिवार की विचारधाराएं धर्म को सामाजिक असमानता या रूढ़िवादिता का कारण मानकर उसका विरोध करती हैं जिसे सनातनी धर्म-विरोधी मानते हैं।
मूल विचारधारा: वामपंथ समानता और रूढ़िवादी परंपराओं (जैसे जाति आधारित पदानुक्रम) के विरोध पर जोर देता है।
टकराव के कारण: सनातन धर्म में परंपराओं कर्मकांडों और वर्ण-आधारित सामाजिक संरचनाओं को महत्व दिया जाता है जिसे वामपंथ अक्सर शोषणकारी मानकर सवाल उठाता है।
सेक्युलरिज्म की परिभाषा: वामपंथी विचारधारा मानते हैं कि शासन और कानून में धर्म की दखलअंदाजी नहीं होनी चाहिएजो धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) का विरोध करते हैं।
परिणाम: इस वैचारिक मतभेद के कारण दक्षिणपंथी या सनातनी समर्थक वामपंथियों को सनातन विरोधी (हिंदू विरोधी) के रूप में देखते हैं।
हालाँकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी वामपंथी या सनातनी पूरी तरह से एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं और वैचारिक मतभेद संदर्भ के अनुसार भिन्न हो सकते हैं.
सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-
उपरोक्त समाचार सामान्य ज्ञान पर अधारित एक निष्पक्ष सर्वेक्षण के अनुसार प्रस्तुत किया जा रहा हैं.समाचार उचित लगता है तो सधन्यवाद जरुर दीजिए और अच्छा ना लगे तो आपके कुशल मार्गदर्शन अनिवार्य है. उचित परामर्श की अपेक्षा के साथ धन्यवाद.
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