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सत्ता के भूखे चरित्रहीन राजा से नैसर्गिक न्याय की अपेक्षा रखना उचित नहीं?

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सत्ता के भूखे चरित्रहीन राजा से नैसर्गिक न्याय की अपेक्षा रखना उचित नहीं?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:

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9822550220

 

राज्य शासन में सक्रिय सत्ता के भूखे भेडिये चरित्रहीन राजे महाराजाओं से नैसर्गिक न्याय की अपेक्षा रखना उचित नहीं है.यह समाचार महात्मा बिदुर नीति शास्त्र और मनुस्मृति मानव धर्मशास्त्र मे दर्शाए गई विधि न्याय के उपदेश के मुताबिक एक सत्तालोलुप लोभी लालची अन्यायी, अत्याचारी और दुराचारी नेता कभी भी जनता-जनार्दन को नैसर्गिक न्याय नहीं दिला सकता है. यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक प्रश्न है.कि “जिस राजा/राजनेता का नैतिक चरित्र ठीक नहीं है, उससे नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) की अपेक्षा रखना उचित नहीं हैं?” – यह प्रश्न न्याय की निष्पक्षता और शासक की ईमानदारी के बीच के गहरे संबंध को उजागर करता है।

नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों (Natural Justice Principles) के अनुसार, इसका उत्तर कुछ बिंदुओं में समझा जा सकता है. मनुस्मृति के अनुसार नैसर्गिक न्याय प्रणाली ही निर्दोष और निरपराध लोगों को न्याय दिला सकती है.चुंकि नैतिकता ही न्याय की नींव मानी गई है. प्रशासनिक विधि में, नैसर्गिक न्याय केवल कानून की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ‘Fair Play in Action’ (कार्यवाही में निष्पक्षता) है। जब कोई शासक अनैतिक होता है, तो उसका झुकाव अपने हितों, पूर्वाग्रहों या पक्षपात की ओर होने की संभावना प्रबल होती है।

नैसर्गिक न्याय का आधार (Rule against Bias): नैसर्गिक न्याय का पहला नियम है – ‘Nemo Judex in Causa Sua’ (कोई भी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता)। यदि जो राजा /नेता का चरित्र अनैतिक है, तो वह निजी लाभ के लिए न्याय व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, जो ‘Rule against Bias’ का उल्लंघन है।न्याय निष्पक्ष होना चाहिए: रुडोल्फ वॉन जेरिंग के अनुसार, न्याय प्रशासन दो शर्तों पर निर्भर करता है – एक नैतिक चरित्र (Character) और दूसरा कानूनी योग्यता। एक अनैतिक व्यक्ति में वह नैतिक साहस नहीं होता जो निष्पक्ष निर्णय ले सके।

निष्पक्षता दिखनी चाहिए: प्रसिद्ध कानूनी सिद्धांत है यह है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए

एक अनैतिक नेता के मामलों में आम जनता का भरोसा नहीं होता, जिससे न्याय का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

निष्कर्ष:

सैद्धांतिक रूप से, अनैतिक राजा या नेता से नैसर्गिक न्याय की अपेक्षा करना निरर्थक है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति के पूर्वाग्रही होने की प्रबल संभावना होती है। हालांकि, लोकतंत्र में, यदि संस्थाएं (जैसे स्वतंत्र न्यायपालिका) मजबूत हैं, तो अनैतिक नेता के बावजूद ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के माध्यम से न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है, क्योंकि कानून का शासन (Rule of Law) व्यक्ति से ऊपर होता है।

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