भागवत पुराण की रचना? व्यास जी की समाधि में हुआ भगवत् साक्षात्कार
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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सृष्टी रचेता भगवान श्री ब्रम्हाजी के मानस पुत्र देवर्षि नारद से दिव्य उपदेश प्राप्त करने के बाद महर्षि वेदव्यास के मन का संशय दूर हो गया। उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि संसार के दुखों का वास्तविक समाधान केवल भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी दिव्य लीलाओं के कीर्तन में ही है। देवर्षि नारद से दिव्य उपदेश प्राप्त करने के बाद महर्षि वेदव्यास के मन का संशय दूर हो गया। उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि संसार के दुखों का वास्तविक समाधान केवल भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी दिव्य लीलाओं के कीर्तन में ही है। नारद जी के जाने के बाद वेदव्यास जी ने उसी शिक्षा को हृदय में धारण किया और भगवान का स्मरण करते हुए गहन समाधि में बैठ गए। उसी समाधि में उन्हें भगवान का अद्भुत दर्शन हुआ और वहीं से श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना का दिव्य संकल्प प्रकट हुआ।
देवर्षि नारद के प्रस्थान के बाद महर्षि वेदव्यास ने सरस्वती नदी के तट पर स्थित अपने आश्रम में बैठकर भगवान का ध्यान किया। उन्होंने अपने मन को एकाग्र करके समाधि लगाई। जब उनका चित्त पूर्ण रूप से निर्मल और स्थिर हो गया, तब उन्होंने दिव्य दृष्टि से भगवान का साक्षात्कार किया। समाधि में उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी योगमाया के साथ स्थित हैं और उनके अधीन यह समस्त संसार चल रहा है। उन्होंने यह भी देखा कि जीव अपनी अज्ञानता के कारण माया के प्रभाव में पड़कर जन्म-मृत्यु के चक्र में भटक रहा है। भगवान से विमुख होने के कारण ही जीव दुःखों से ग्रस्त होता है।
उसी समय वेदव्यास ने यह भी समझ लिया कि भगवान की भक्ति ही वह उपाय है जिससे जीव इस माया से मुक्त हो सकता है। जब मनुष्य भगवान की कथा सुनता है, उनका नाम स्मरण करता है और उनकी लीलाओं का चिंतन करता है, तब उसके हृदय से अज्ञान दूर हो जाता है। समाधि से उठने के बाद वेदव्यास जी ने यह निश्चय किया कि वे एक ऐसा ग्रंथ रचेंगे जो केवल भगवान की भक्ति का प्रचार करे और संसार के दुखों से पीड़ित जीवों को मुक्ति का मार्ग दिखाए। इसी संकल्प से उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की।
यह ग्रंथ केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का अमृत है। इसमें बताया गया है कि भगवान की कथा सुनने और सुनाने से मनुष्य का हृदय शुद्ध होता है और उसके भीतर भक्ति जागृत होती है। भागवत का मुख्य संदेश यही है कि मनुष्य को भगवान के चरणों में प्रेमपूर्वक समर्पित होना चाहिए। जब मनुष्य भगवान की शरण में जाता है, तब उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं और उसका जीवन परम आनंद से भर जाता है। महर्षि वेदव्यास ने इस महान ग्रंथ को अपने पुत्र परम ज्ञानी शुकदेव जी को सुनाया। आगे चलकर शुकदेव जी ने इसे राजा परीक्षित को सुनाया, जब उनके जीवन के केवल सात दिन शेष थे।
श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से मनुष्य के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। यह ग्रंथ भक्ति, ज्ञान और वैराग्य- तीनों का संगम है। इसी कारण इसे पुराणों का सार कहा गया है। इस प्रकार नारद जी के उपदेश से प्रेरित होकर वेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत की रचना की और संसार को भक्ति का अमृत प्रदान किया। यही भागवत कथा आज भी मनुष्य को भगवान से जोड़ने का सबसे सरल और प्रभावशाली मार्ग है.दरअसल मे संसारिक माया मोह की दुर्भावना के आवेश में आकर एक दूसरे के प्रति ईर्श्या जलन झूठ छल कपट बेईमान विश्वासघात और भ्रष्टाचार के मामले मे मनुष्य उलझा रहता है.उसे अपनी आत्मोत्थान के लिए समय नहीं है.
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