जानिए सर्व रोग व्याधि निवारण के लिए पराम्बा ज्ञान की देवी का मंत्र
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
9822550220
श्रीमद्देवीभागवत पुराण एवं दुर्गा सप्तशती (चौथे अध्याय) का एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है। इसका अर्थ है कि हे माँ, प्रसन्न होने पर आप सभी रोगों का नाश कर देती हैं, और कुपित (क्रोधित) होने पर सभी कामनाओं (इच्छाओं) को नष्ट कर देती हैं। आपकी शरण में जाने वालों पर कोई विपत्ति नहीं आती, और वे दूसरों को शरण देने में समर्थ हो जाते हैं।
पूरा मंत्र:
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा,
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां,
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांन्ति
अर्थ:
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा: हे देवी! आप प्रसन्न होने पर सभी रोगों (रोगान-अशेषान) को नष्ट कर देती हैं।
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्: (लेकिन) कुपित/क्रोधित होने पर आप मनोवांछित सभी इच्छाओं का नाश कर देती हैं।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां: जो लोग आपकी शरण में हैं, उन पर विपत्ति (न विपन्नराणां) नहीं आती।
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति: आपकी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले (आश्रयतां) बन जाते हैं।
महत्व और उपयोग:
यह मंत्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों से मुक्ति के लिए माता दुर्गा की पूजा में पढ़ा जाता है।
यह रोगों के नाश और आरोग्य प्राप्ति का एक प्रमुख मंत्र माना जाता है।
इसे विशेषकर दुर्गा पूजा या नवरात्र के दौरान और मानसिक शांति के लिए पढ़ा जाता है।
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