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(भाग-67) गीता संपूर्ण मानव जगत में दैविक, अधिभौतिक और आत्म कल्याण की संजीवनी है

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भाग :67) गीता संपूर्ण मानव जगत में दैविक, अधिभौतिक और आत्म कल्याण की संजीवनी है

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

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श्रीमद्भगवद्गीता का महत्व सम्पूर्ण मानव लोक के लिए प्रासंगिक है। श्रीमद भगवतगीता ही एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें सृष्टि के सम्पर्ण आध्यात्मिक पक्षों का समावेश किया गया है। वेदों और उपनिषदों से लेकर शंकराचार्य तक के सभी मतों व मान्यताओं का सार इसमें समाहित है। इसमें संग्रहित सात सौ श्लोक सप्त महाद्वीप के समान गंभीर है।10

श्री गीता उपनिषदों का सार है। महाभारत युद्ध के समय रणभूमि में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया था वह गीता में बताया गया है। गीता में ऐसी बहुत सी बातें हैं जो मनुष्य को जीवन की कई कठिनाइयों को आसान बनाती है। इतना ही नहीं गीता पढ़ने पर मनुष्य को बहुत सी नई जानकारियां भी मिलती है। साथ ही हर अध्याय के नियमित पाठ का अपना लाभ और महत्व है। भगवान शिव ने देवी पार्वती को गीता के पहले अध्याय के पाठ का महत्व जो बताया है वही यहां आपके लिए प्रस्तुत है। लेकिन गीता के पहले अध्याय के महत्व को जानने से पहले जान लीजिए श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय की खास बातें। गीता के पहले अध्याय का नाम अर्जुन विषाद योग है। इस अध्याय में कुरुक्षेत्र के मैदान में उपस्थित बंधुओं और संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन के मन में उठे विषाद और मनःस्थिति का वर्णन किया गया है, जिसे संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं।
एक समय पार्वती जी ने पूछा है महादेव जी किस ज्ञान के बल पर संसार के सब लोग आपको शिव कहकर पूजते हैं। मृगछाला ओढ़े और अपने सभी अंगों में शमशान की विभूति लगाएं, गले में सर्प और नर मुंडों की माला पहने हुए हो। इनमें तो कोई भी पवित्र नहीं, फिर आप किस ज्ञान से पवित्र माने जाते हैं? तब महादेव ने उत्तर दिया कि हे प्रिये सुनो मैं गीता ज्ञान को अपने हृदय में धारण करने से पवित्र माना जाता हूं। इस ज्ञान से मुझे बाहर के कर्म नहीं व्यापते। तब पार्वती जी ने कहा कि हे भगवान जिस गीता ज्ञान की आप ऐसी स्तुति करते हैं, उसके श्रवण करने से कोई कृतार्थ भी हुआ है? महादेव ने उत्तर देते हुए कहा कि इस ज्ञान को सुनकर बहुत से जीव कृतार्थ हुए हैं और आगे भी होंगे। मैं तुम्हें एक पुरातन कथा कहता हूं। तुम सुनो।
एक समय पाताल लोक में शेषनाग की शय्या पर श्री नारायण जी नैन मूंदकर आनंद में मग्न थे। उस वक्त भगवान के चरण दबाते हुए लक्ष्मी जी ने पूछा हे प्रभू! निद्रा और आलस्य तो उन पुरुषों को व्यापता है जो जीव तामसी होते हैं, फिर आप तो तीनों गुणों से अतीत हो। आप तो वासुदेव हो, आप जो नेत्र मूंद रहे हों, इससे मुझके बड़ा आश्चर्य है। नारायण जी ने उत्तर देते हुए कहा हे लक्ष्मी! मुझको निद्रा आलस्य नहीं व्यापता, एक शब्द रूप जो भगवद्गीता है उसमें जो ज्ञान है उसके आकार रुप है, यह गीता शब्द रूप अवतार है, इस गीता में यह अंग है पांच अध्याय मेरे मुख है, दस अध्याय मेरी भुजा हैं, सोलहवां अध्याय मेरा हृदय और मन और मेरा उदर है, सत्रहवां अध्याय मेरी जंघा है, अठारहवां अध्याय मेरे चरण हैं। गीता श्लोक ही मेरी नाड़ियां हैं और जो गीता के अक्षर है वो मेरा रोम हैं। ऐसा मेरा शब्द रुपी जो गीता ज्ञान है उसी के अर्थ मैं हृदय में विचार करता हूं और बहुत आनंद प्राप्त होते हूं। लक्ष्मी जी बोलीं हे श्री नारायण जी ! जब श्री गीता जी का इतना ज्ञान है तो उसको सुनकर कोई जीव कृतार्थ भी हुआ है। सो मुझसे कहो। तब श्री नारायण ने कहा हे लक्ष्मी! गीता ज्ञान को सुनकर बहुत से जीव कृतार्थ हुए हैं, सो तुम श्रवण करो।
एक व्यक्ति था, जो चाण्डालों के कर्म करता था और तेल नमक का व्यापार करता था। उसने एक बकरी पाली। एक दिन वह बकरी चराने के लिए वन में गया और वृक्ष से पत्ते तोड़ने लगा। वहां, उसे एक सांप से डंस लिया। जिससे वह तुरंत मर गया। मरने के बाद उसने बहुत से नरक भोगे और फिर उसका जन्म बैल के रूप में हुआ। उस बैल को एक भिक्षुक ने मोल लिया। वह भिक्षुक उसपर चढ़कर सारे दिन मांगता फिरे, जो कुछ भिक्षा मांगकर लाता वह उसे अपने परिवार के साथ मिलकर खाता और वो बैल सारी रात द्वार पर खड़ा रहता। उसके खाने पीने का भी कोई ख्याल नहीं करता था। और सुबह होते ही बैल पर चढ़कर फिर मांगने निकल जाता। जब बहुत दिन हो गए तो वह बैल भूख से गिर गया लेकिन, उसके प्राण नहीं निकले। नगर के लोगों ने देखा और उस बैल को कोई तीर्थ का फल दे, तो कोई व्रत का फल दें, तब भी उस बैल के प्राण नहीं छूटे। एक दिन गणिका आई, उसने लोगों से पूछा यह कैसी भीड़ है, तो उन्होंने कहा कि इसके प्राण नहीं निकलते, अनेक पुण्यों का फल दे रहे हैं, तो भी इसकी मुक्ति नहीं होती। तब गणिका ने कहा कि मैंने जो कर्म किया है उसका फल मैंने इस बैल को दिया है। इतना कहते ही बैल की मुक्ति हो गई। तब बैल ने एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया। पिता ने उसका नाम सुशर्मा रखा। उसके पिता ने उसे पढ़ाया लिखाया। उसको अपने पिछले जन्म की सुध थी। उसने एक दिन मन में विचार किया, जिस गणिका ने मुझे बैल की योनि से छुड़ाया था उसका दर्शन करूं। विप्र चलते-चलते गणिका के घर गया और कहा आप मुझे पहचानती हैं?
गणिका ने कहा मैं नहीं जानती तुम कौन हो। तब उसने कहा कि मैं वहीं, बैल हूं, जिसको आपने अपने पुण्य दिए थे। तब मैं बैल की योनी से छूटा था। अब मैं विप्र के घर जन्म हूं। आप अपना पुण्य बताएं? गणिका ने कहा कि मैंने अपने जाने पुण्य नहीं किया, परंतु मेरे घर एक तोता है। वह रोज सवेरे कुछ पढ़ता है। मैं उसका वाक्य सुनती हूं, उस पुण्य का फल मैंने तुम्हें दे दिया।
तब विप्र ने तोते से पूछा की तू सवेरे क्या पढ़ता है। तोते ने कहा, मैं पिछले जन्म में विप्र का पुत्र था। मेरे पिता ने मुझे गीता के पहले अध्याय का पाठ सुनाया करते थे। एक दिन मैंने गुरु से कहा कि मुझको आपने क्या पढ़ाया है। तब गुरुजी ने मुझे शाप दिया कि तू तोता बन जा। इसके बाद से मैं तोता बन गया। एक दिन बहेलिया मुझे पकड़ ले आया और एक विप्र ने मुझे मोल ले लिया। वह विप्र भी अपने पुत्र को गीता का पाठ सिखाता था। तब मैंने भी यह पाठ सीख लिया। उसी दिन विप्र के घर में चोर घुस गए। उन्हें घन तो प्राप्त नहीं हुआ लेकिन, वह मेरा पिंजरा उठा ले आए। उनकी यह गणिका मित्र थी। वह मुझे उसके पास ले आए। सो में नित्य प्रात: गीताजी के पहले अध्याय का पाठ करत हूं। जिसे यह गणिका सुनती है। पर इस गणिका को समझ में नहीं आती। जो मैं पढ़ता हूं, वही, इस गणिका ने तेरे निमित्त दिया था। वह श्रीगीताजी के पहले अध्याय का फल था। तब विप्र ने कहा कि हे, तोते तू भी विप्र है मेरे आशीर्वाद से तेरा कल्याण हो। सो हे लक्ष्मी! विप्र के इतना कहते ही वह तोता भी मुक्ति को प्राप्त हो गया। तब गणिका ने बुरे कर्म छोड़, भले कर्म ग्रहण किए और नित्य स्नान करके श्री गीताजी के प्रथम अध्याय का पाठ करना शुरू कर दिया जिससे उसकी भी मुक्ति हो गई।

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