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रुद्राक्ष धारण करते ही व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। भगवताचार्य टेकेस्वरानन्द महाराज के उदगार

रुद्राक्ष धारण करते ही व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। भगवताचार्य टेकेस्वरानन्द महाराज के उदगार

टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

कोराडी । स्थानीय विट्ठल रुक्मणी देवस्थान के सामने बाबा राजाराम परनामी निवास प्रांगण में शुरु शिव महापुराण कथा वाचक भगवताचार्य टेकेस्वरानन्द महाराज ने रुद्राक्ष की उत्पत्ति और उसके महत्व बताया कि शिव महापुराण के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई थी. इसे धारण करते ही व्यक्ति सकारात्मकता ऊर्जा से भर जाता है. साथ ही इसे धारण करने वाले व्यक्ति को अनेक तरह की समस्या और भय से मुक्ति मिलती है. ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति रुद्राक्ष धारण करता है

उन्होने बताया कि रुद्राक्ष के महत्व की खूब चर्चा की गई है. हर तरह का रुद्राक्ष किसी न किसी रूप में लाभकारी बताया गया है. हर रुद्राक्ष के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक कुछ धारियां खिंची होती हैं. इन्हें मुख कहा जाता है. हमारे धार्मिक ग्रंथों में रुद्राक्ष के महत्व की खूब चर्चा की गई है. हर तरह के रुद्राक्ष को किसी न किसी रूप में बेहद लाभकारी बताया गया है. हर रुद्राक्ष के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक कुछ धारियां खिंची होती हैं. इन्हें मुख कहा जाता है.
आगे चर्चा की गई है कि किस तरह का रुद्राक्ष धारण करने से क्या लाभ होता है.जिसमें एकमुखी रुद्राक्ष दुर्लभ माना जाता है. इसे साक्षात् श‍िव का स्वरूप बताया गया है. माना जाता है कि इसे धारण करने से व्यक्‍त‍ि को यश की प्राप्त‍ि होती है. उसी प्रकार मुखी रुद्राक्ष को देवी और देवता, दोनों का स्वरूप बताया गया है. इसे धारण करने से कई तरह के पाप दूर होते हैं. तीन मुखी रुद्राक्ष को अनल (अग्न‍ि) के समान बताया गया है. चार मुखी रुद्राक्ष को ब्रह्मा का रूप बताया गया है. बताया गया है कि इसे धारण करने से ब्रह्म हत्या का पाप नष्ट हो जाता है. पंचमुखी रुद्राक्ष को स्वयं रुद्र कालाग्नि‍ के समान बताया गया है. इसे धारण करने से शांत व संतोष की प्राप्त‍ि होती है. छह मुख वाले रुद्राक्ष को कार्तिकेय का रूप कहा गया है. इसे दाहिने हाथ में पहनना चाहिए, सात मुखी रुद्राक्ष को अनंग बताया गया है. इसे धारण करने से सोने की चोरी आदि के पाप दूर हो जाते हैं. अष्टमुखी रुद्राक्ष को गणेशजी का स्वरूप कहा गया है. इसे धारण करने से पाप और अन्य तरह के क्लेश दूर होते हैं. नौ मुखी रुद्राक्ष को भैरव कहा गया है. इसे बाईं भुजा में पहनना चाहिए. इसे धारण करने वाले को भोग और मोक्ष की प्राप्त होती है, दशमुखी रुद्राक्ष को जनार्दन या विष्णु का स्वरूप बताया गया है. इसे धारण करने से मनुष्य के सभी ग्रह शांत रहते हैं और उसे किसी तरह का भय नहीं सताता है. ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को साक्षात् रुद्र कहा गया है. जो इसे श‍िखा में धारण करता है, उसे कई हजार यज्ञ कराने का फल मिलता है. बारह मुखी रुद्राक्ष कान में धारण करना शुभ बताया गया है. इसे धारण करने से धन-धान्य और सुख की प्राप्ति‍ होती है. तेरह मुखी रुद्राक्ष के बारे में कहा गया है कि अगर यह मिल जाए, तो सारी कामनाएं पूरी कराने वाला होता है. चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य श‍िव के समान पवित्र हो जाता है. इसे सिर पर धारण करना चाहिए.
भगवताचार्य टेकेस्वरानन्द ममहाराज ने बताया है कि रुद्राक्ष से जप आदि कार्यों में भी रुद्राक्ष का प्रयोग होता है. जप करने में 108 दानों की माला उपयोगी मानी गई है. कार्यक्रम में बडी संख्या में महिला-पुरुष श्रोतागण उपस्थित थे।

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