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(भाग :225) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने बालि को मृत्युदंड देकर मित्र सुग्रीव को भय मुक्त करके आत्मविश्वास जगाया।

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भाग :225) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने बालि को मृत्युदंड देकर मित्र सुग्रीव को भय मुक्त करके आत्मविश्वास जगाया

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने वानर राज सुग्रीव को बालि के भय से कैसे मुक्ति दिलाई : आरंभ में सुग्रीव अपने भाई बालि से इतना भयभीत था कि उसे श्रीराम की शक्ति पर भरोसा नहीं हुआ। इसीलिए वो सशंकित भाव से श्रीराम से अपनी बात कहता है। श्रीराम ने दुंदुभि के कंकाल को दस योजन दूर फेंक कर सुग्रीव का डर दूर करने की कोशिश की तत्पश्चात सात साल के वृक्षों को तीर से भेद देते हैं, इसके बाद सुग्रीव को भरोसा होता है कि बालि को दंड मिल सकेगा। श्रीराम और सुग्रीव से संबंधित

बाली ने दुंदुभी को मार गिराया। बाली के भय से सुग्रीव ने ऋष्यमूक पर्वत पर शरण ली है

रावण या बाली को दंड “वध” क्यों था, हत्या क्यों ना थी, ये बात गौर करने की है

 

श्रीराम ने बालि का वध कर सुग्रीव के भय को दूर तो कर दिया लेकिन कितना सही था बालि को मिला यह मृत्युदंड का संदेश। युद्ध शुरू होने के लिए शायद आपने दुंदुभी बजाये जाने की बात कभी सुनी-पढ़ी होगी। ऐसा माना जाता है कि ये दुंदुभी एक राक्षस था जिसमें हजार हाथियों का बल था। अपनी ताकत के घमंड में चूर इस राक्षस ने समुद्र को लड़ने के लिए ललकारा। लेकिन समुद्र ने लड़ने के बदले कहा कि तुम हिमवान के पास जाओ, वो ताकत में तुम्हारे टक्कर का है। तो दुंदुभी हिमवान के पास पहुंचा और उसे ललकारते हुए उसकी चट्टानों, उसके शिखर को तोड़ने लगा। हिमवान पर कई ऋषि तप करते थे, हिमवान लड़ता तो कईयों को परेशानी होती। हिमवान देवताओं की मदद करता था इसलिए उसने इंद्र के पुत्र बाली से मदद मांगी।

 

बाली आये, दुंदुभी से युद्ध हुआ। बाली इतने शक्तिशाली थे कि ना केवल उन्होंने दुंदुभी को मार गिराया, बल्कि उसका शव उठाकर एक योजन दूर फेंक दिया ! उड़ता हुआ शव मातंग ऋषि के आश्रम के ऊपर से गुजरा तो खून की बूँदें उनके आश्रम में भी गिरी। इस से भड़के ऋषि ने बाली को ऋष्यमूक पर्वत के इलाके में प्रवेश ना कर पाने का शाप दे दिया। इसी शाप के कारण सुग्रीव जब बाली से कहीं और नहीं छिप पाया तो उसने ऋष्यमूक पर्वत पर आकर अपना डेरा जमा लिया था। जब कम्बंध (दनु) को शापमुक्त करने के बाद भगवान राम को सुग्रीव का पता चला तो वो सुग्रीव से मिलने इसी पर्वत पर आये।

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अगर आप वाल्मीकि रामायण देखते हैं तो राम के सुग्रीव से मिलने के इस प्रसंग को दोबारा गौर से पढ़िए। इसमें दो तीन चीज़ों पर आपका ध्यान जाएगा। एक तो ये कि कम्बंध (दनु) राम को हथियार छोड़ कर सुग्रीव से मिलने जाने कहता है। सुग्रीव के गुप्तचर पहले ही इलाके में राम लक्ष्मण को देख लेते हैं और फिर सुग्रीव हनुमान को जांच के लिए भेजते भी हैं। यानि खबर रखने के लिए गुप्तचर, उस दौर में भी राजा अपने इलाके में रखते थे, कोई ऐसे ही मुंह उठाये प्रवेश नहीं कर जाता था। चूँकि राम को हथियार छोड़ कर जाने की सलाह पहले ही मिल गई थी इसलिए जब आप सुग्रीव से उनकी बातचीत देखेंगे तो वो कहते हैं कि अगर मेरे धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ी होती तो मैं अभी ही बाली का वध करता !

इस बात पे सुग्रीव जो इतनी देर से राघव या अन्य नामों से राम को बुला रहा था वो राम को राजन कहकर संबोधित करता है। ये कटाक्ष भी हो सकता है क्योंकि बाली मारा जा सकता है, इसमें वो विश्वास ही नहीं कर पा रहा था। अपने शक की वजह दिखाने के लिए वो राम को ले जा कर दुंदुभी का कंकाल दिखाता है और बताता है कि इसे मारकर बाली ने एक योजन दूर फेंक दिया था। जब राम के लात मारने से वो कंकाल दस योजन दूर जा गिरता है तो सुग्रीव कहता है ये कंकाल तो पड़ा पड़ा सूख गया है इसलिए उतना वजनी नहीं रह गया। अब वो एक शाल का वृक्ष दिखा कर कहता है कि बाली इसके आर-पार तीर मार सकता है। यहाँ राम धनुष उठाते हैं और उनका तीर सात शाल के वृक्षों को छेदकर वापस उनके पास आ जाता है।

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इसके बाद कहीं जा कर सुग्रीव को विश्वास होता है कि बाली मारा जा सकता है। इस पूरे समय जहाँ सुग्रीव बाली के ऊपर विजय पाने की बात कर रहा होता है वहीँ राम उसे मारने की बात कर रहे होते हैं। सुग्रीव यहाँ जय और उसके समानार्थक शब्द इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन राम यहाँ जय-पराजय नहीं, वध की बात कर रहे होते हैं। उस काल के नियमों के मुताबिक किसी और की पत्नी का अपहरण करने वाले का वध उचित दंड था। लेकिन भारत के बहुसंख्यक समाज की ही तरह, सुग्रीव उचित दंड के बारे में सोचने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। पहली बार जब बाली और सुग्रीव लड़े तो पहचान ना पाने के कारण राम ने तीर नहीं चलाया, लेकिन दूसरी बार लड़ते समय उन्होंने बाली को मार गिराया।

यहाँ फिर गिरे हुए बाली और राम की बातचीत ध्यान देने लायक है। पूरे सर्ग में राम अपने लिए “मैं” का संबोधन, संस्कृत के एक वचन “अहम्” का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यहाँ बाली को मारने के दंड के समय वो “अहम्” नहीं कहते, खुद और लक्ष्मन दोनों के लिए “अवाम” भी नहीं कह रहे हैं, यानि द्विवचन नहीं है। वो “वयं” इस्तेमाल करते हैं। ये राज्य की ओर से दंड देने जैसा है, बहुवचन “हम” का संबोधन वो खुद के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। अब जब आपमें से कई लोग रामलीला देख कर, रावण वध देख कर उठे हैं तो शब्दों का हेरफेर दिखाने के लिए ये उचित समय है। रावण या बाली का “वध” क्यों था, हत्या क्यों ना थी उसे भी याद रखने की कोशिश कीजिये।

सबसे बड़ा फर्क जो सिर्फ टीवी देख कर रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य समझने की कोशिश में आता है वो हम एक बार फिर याद दिला देते हैं। जिस संस्कृत काव्य में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चरों पुरुषार्थों की बात ना हो, वो महाकाव्य कहला ही नहीं सकता। इसलिए ये ग्रन्थ सिर्फ धार्मिक ग्रन्थ हैं ऐसा कहकर आप सिर्फ किताब का एक चौथाई पढ़ रहे होते हैं। अपराध और दंड के प्रसंग सिर्फ कर्म पर नहीं, उसके पीछे की इच्छा और चेष्टाओं के आधार पर भी तय होते हैं। त्वरित निर्णय, वो भी केवल एक पक्ष देखकर मत दीजिये। बाकी सुग्रीव का उचित दंड से हिचकना भी याद रखियेगा

बालि ने श्रीराम पूछा आपने मुझे छिपकर क्यों मारा?:घर-परिवार में सभी का सम्मान करें, रिश्तों में गलत आचरण करेंगे तो परिवार बिखर सकता है

रामायण का बालि वध का प्रसंग है। सुग्रीव बालि से डरकर एक पर्वत पर छिपे हुए थे। हनुमान जी सुग्रीव की मित्रता श्रीराम से कराई। इसके बाद श्रीराम और सुग्रीव ने एक-दूसरे की मदद करने का वचन दिया था। श्रीराम ने योजना बनाई कि सुग्रीव बालि को युद्ध के लिए ललकारेंगे। जब सुग्रीव और बालि युद्ध करेंगे, तब वे खुद बाण मारकर बालि का वध करेंगे।

 

योजना के अनुसार सुग्रीव ने बालि को युद्ध के लिए बुलाया तो बालि तुरंत ही आ गया। दोनों भाइयों का युद्ध हुआ, लेकिन दोनों भाई दूर से एक जैसे दिख रहे थे, श्रीराम बालि को पहचान नहीं सके, इस कारण उन्होंने बाण नहीं मारा। श्रीराम ने सोचा कि अगर गलती से सुग्रीव को बाण लग गया तो वह बिना वजह मारा जाएगा।

 

श्रीराम ने बाण नहीं मारा तो बालि ने सुग्रीव की खूब पिटाई कर दी। किसी तरह सुग्रीव बालि से बचकर भाग निकला और श्रीराम के पास पहुंचा। सुग्रीव ने श्रीराम से कहा कि आपकी वजह से बालि ने पिटाई कर दी। तब श्रीराम ने कहा था कि मैं आप दोनों भाइयों में भेद नहीं कर पा रहा था। इस बार आप एक माला पहनकर जाओ तो पहचानने में दिक्कत नहीं होगी।

 

श्रीराम के कहने पर सुग्रीव एक माला पहनकर बालि से युद्ध करने पहुंच गए। दूसरी बार श्रीराम पर भरोसा करके सुग्रीव बाली से युद्ध कर रहा था। दोनों भाई लड़ रहे थे, उस समय श्रीराम ने बाण छोड़ा तो वह सीधे बालि को लगा। बाण लगने से बालि घायल हो गया।

घायल बाली के पास श्रीराम पहुंचे तो बालि ने श्रीराम पर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘आप तो धर्म के अवतार हैं, फिर भी मुझे छिपकर मारा, आपने ऐसा क्यों किया?

श्रीराम ने बालि को समझाया कि तुमने अपने छोटे भाई सुग्रीव का अपमान किया, उसकी पत्नी का अपहरण किया। अपने छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी, पुत्री ये चारों रिश्ते एक समान होते हैं। जो लोग इन चार रिश्तों में मर्यादा का ध्यान नहीं रखते हैं, वे सभी दंड के अधिकारी हैं। ऐसे लोगों को दंड देने में कोई अधर्म नहीं है। मैंने तुम्हें इसी गलत काम का दंड दिया है।

श्रीराम ने इस किस्से में संदेश दिया है कि हमें रिश्तों में आचरण का विशेष ध्यान रखना चाहिए। रिश्तों में गलत आचरण नहीं करना चाहिए। परिवार में सभी का सम्मान करना चाहिए। अगर घर-परिवार में इन बातों का ध्यान नहीं रखा जाता है तो रिश्ते टूट सकते हैं।

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