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PM मोदी के सामने खड़ीं 3 चुनौतियां, कैसे करेंगे पार?

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PM मोदी के सामने खड़ीं 3 चुनौतियां, कैसे करेंगे पार?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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नई दिल्ली । तीसरी बार प्रधानमंत्री बनते ही PM नरेंद्र मोदी ने इतिहास रच दिया है। तीसरी बार पीएम पद की शपथ लेकर जवाहर लाल नेहरू की बराबरी कर ली। पर, उनके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अव्वल तो उन्हें पहली बार गठबंधन सरकार चलाने का अभ्यास करना होगा। दूसरा, पूर्व में शुरू किए भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने अभियान को जारी रखने की चुनौती होगी। सबसे बड़ी चुनौती इस साल होने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति दुरुस्त करने की भी जरुरत है।

पहली चुनौती- समय सूचकता अनुशासनात्मक और शिष्टाचार पूर्वक गठबंधन की सरकार चलाना होगा!

दूसरी चुनौती- शुरू हुए कैंपेन निरंतर जारी रखना और राजनीति में व्याप्त अपराधिकण और भ्रष्टाचार को समाप्त करना होगा?

तीसरी चुनौती- असेंबली चुनावों को पूर्ण बहुमतों से जीतना होगा!

चौथी चुनौती- NDA मंत्रीमंडल को नैसर्गिक न्याय संगत निर्णय के काबिल बनाना होगा?

नरेंद्र मोदी ने 293 सांसदों के सहयोग से तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली। फर्क यही रहा कि बीजेपी को पूर्ण बहुमत इस बार नहीं मिला। बहुमत के लिए भाजपा को सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा है। भाजपा को सिर्फ 242 सीटें ही मिली हैं। हालांकि सहयोगी दलों की मदद से भाजपा ने एनडीए के बैनर तले 293 सीटों का बंदोबस्त कर लिया। यह बहुमत के आंकड़े से 21 अधिक है। इससे पहले नरेंद्र मोदी चार बार गुजरात में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। प्रधानमंत्री के रूप में इस बार उन्होंने तीसरी बार शपथ ली। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी भूतपूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू की बराबरी पर आ गए हैं। नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ तो ली, लेकिन इस बार नया अनुभव होगा। पहले वे बहुमत की सरकारें चलाने के अभ्यस्त रहे हैं। इस बार उन्हें गठबंधन की सरकार चलानी पड़ेगी। मोदी के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं है।

नरेंद्र मोदी की छवि अभी तक चुनाव जिताने वाले पीएम की रही है। हालांकि इस बारे में उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद नवनिर्वाचित एनडीए सांसदों को संबोधित करते हुए कहा था- ‘इस भ्रम में न रहें कि अगली बार भी आप मेरे चेहरे पर ही चुनाव जीत जाएंगे।’ खुद भाजपा के लोगों ने यह बात समझी होती तो शायद आज सहयोगियों का मुंह नहीं ताकना पड़ता। इस बार के चुनाव परिणाम देख कर ऐसा ही लगता है कि मोदी अब चुनाव जिताने में कारगर नहीं रहे। वर्ष 2014 में 282 से शुरू होकर 2019 में 303 सीटों तक पहुंची भाजपा को इस बार सिर्फ 242 सीटें आई हैं। टीडीपी अगर भाजपा का नया सहयोगी नहीं बना होता तो बाकी साथी दलों का परफार्मेंस भी पिछले मुकाबले बेहतर नहीं माना जा सकता। पिछली बार 53 सांसद सहयोगी दलों के थे। मोदी के चेहरे पर 2014 के बाद से अब तक हुए विधानसभा चुनाव भी लड़े जाते रहे हैं। पर, अब विधानसभा चुनावों में भी मोदी का चेहरा कितना कारगर होगा, इस पर संदेह है।

महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा विधानसभाओं के चुनाव इसी साल होने हैं। महाराष्ट्र में अजीत पवार के गुट वाले एनसीपी और उद्धव ठाकरे से अलग हुई शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे के साथ भाजपा भी सरकार में हैं। भाजपा के लोग भी शिंदे की गठबंधन सरकार में मंत्री बने हुए हैं। लोकसभा के चुनाव में यह स्पष्ट हो गया है कि नया गठबंधन उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना से बेहतर नहीं है। इसलिए भाजपा के सामने विधानसभा चुनाव बड़ी चुनौती है। भाजपा महाराष्ट्र में गठबंधन में कुछ और दलों को जोड़े और कुछ ऐसा कर दिखाए, जिससे जनता के बीच यह संदेश जा सके कि भाजपा के साथ रहना ही श्रेयस्कर है। मंत्रिपरिषद में हिस्सेदारी को लेकर एनसीपी के अजीत पवार का रूठना महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार के लिए शुभ नहीं है।

 

हरियाणा और पंजाब में भी बड़ी चुनौती सामने खडी है,

प्रधानमंत्री की दूसरी चुनौती है हरियाणा और झारखंड विधानसभा का चुनाव जीतना। इसी साल यहां भी विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव में इन दोनों राज्यों में भाजपा और उसके नए सहयोगी दलों के नेतृत्व में पिछली बार के मुकाबले सीटों का जो नुकसान हुआ है, यकीनन भाजपा नेतृत्व के लिए वह चिंता की बात है। ऐसी स्थिति में भाजपा को यह तय करना होगा कि किसे अब नया साथी बनाया जाए या संगठन में किस तरह का फेर-बदल करना चाहिए।

 

महाराष्ट्र में शिंदे के नेतृत्व में अजीत पवार के साथ भाजपा ने सरकार तो बनवा दी, पर पूर्व सीएम देवेंद्र फणनवीस को उपमुख्यमंत्री पद देकर पार्टी ने उनकी गरिमा भी घटाई। फडण्नवीस भी महाराष्ट्र में भाजपा की कमजोर स्थिति के फैक्टर माने जा रहे हैं। यह सच भी है कि देवेंद्र फडण्नवीस शुरू से ही उपमुख्यमंत्री बनने के लिए राजी नहीं थे। ऐसा इसलिए कि पहले वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। चुनाव परिणाम बेहतर न आने पर उनके इस्तीफे की पेशकश के पीछे यही कारण माना जाता है। हालांकि पार्टी ने उन्हें मना लिया है।

 

हरियाणा में मनोहर कट्टर के सीएम रहते खटपट इतनी बढ़ी कि भाजपा को नेतृत्व परिवर्तन करना पड़ा। इसके बावजूद इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा को महज पांच सीटें मिलीं। खट्टर अब केंद्र में मंत्री बन गए हैं। हरियाणा में बेहतरी के लिए भाजपा को नेतृत्व और संगठन पर तो ध्यान देना ही हगा, साथ ही नरेंद्र मोदी को कुछ ऐसा कर दिखाना होगा, जिससे वहां के लोगों में भाजपा के प्रति फिर आकर्षण पैदा हो।

झारखंड में लोकसभा के नतीजे भाजपा के लिए निराशाजनक नहीं तो अच्छे भी नहीं रहे। भाजपा ने 2014 में अकेले 12 सीटें जीती थीं। 2019 में सहयोगी आजसू पार्टी के साथ भी 12 सीटें जीतीं। इस बार सिर्फ नौ सीटों पर भाजपा और आजसू गठबंधन को जीत मिली है। सीटों के साथ वोट शेयर भी घटा है। भाजपा के लिए यह खतरे की घंटी है। भाजपा 2019 में राज्य की सरकार भी गंवा चुकी है। आदिवासी प्रदेश के रूप में विख्यात झारखंड में एसटी सीटों पर एनडीए की हार सबसे शर्मनाक है। हालांकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी आदिवासी समाज से ही आते हैं और झारखंड के वे पहले सीएम रह चुके हैं। चुनाव में उनका कोई करिश्मा नजर नहीं आया। यहां तक केंद्रीय मंत्री और झारखंड के सीएम रहे अर्जुन मुंडा को भी हार का सामना करना पड़ा। भाजपा को नेतृत्व परिवर्तन से लेकर आदिवासियों में विश्वास जगाने की नए सिरे से पहल करनी होगी। मोदी को भी झारखंड के लिए कुछ ऐसा करना होगा, जिससे लोग भाजपा की ओर मुखातिब हों।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की बहुुत बडी चुनौती बनी है।

नरेंद्र मोदी की तीसरी बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार और घुसपैठियों के खिलाफ शुरू किए गए अभियानों और कार्यक्रमों को जारी रखने की जरूरत है। इसकी गारंटी भी उन्होंने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान दी थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की सफलता की एक बड़ी वजह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म था, जहां भाजपा आईटी सेल के लोगों ने चुनाव प्रचार के नए तरीके अपनाए। दो बार की जीत के बाद भाजपा ने प्रचार के इस नए नुस्खे को नजरअंदाज तो नहीं किया, लेकिन फोकस घट गया। शायद इसकी वजह ‘मोदी है तो मुमकिन है’ या ‘आएगा तो मोदी ही’ जैसा अति आत्मविश्वास रहा। इस बार विपक्ष ने इसका भरपूर प्रयोग किया। परिणाम यह हुआ कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष ने जो नैरेटिव तैयार किए, वे जन-जन तक पहुंच गए।

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कोविड काल से ही हर घर मोबाइल पहुंच चुका है। अब पहले की स्थिति नहीं रही। कोरोना काल में बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सभी घरों में मोबाइल पहुंच गया है। सोशल मीडिया एन्फ्लुएंसर ने इसी का लाभ उठाया और वे इस नैरेटिव के प्रचार में सफल रहे कि भाजपा 400 सीटें क्यों मांग रही है। इसे इस रूप में समझाया गया कि भाजपा संविधान खत्म करना चाहती है या बदलना चाहती है। 400 सीटें मिलीं तो देश में आगे अब चुनाव नहीं होंगे। भाजपा सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी। और, इससे भी बड़ा यह कि बीजेपी मुस्लिम विरोधी है। हालांकि मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा उठा कर भाजपा ने काउंटर करने की कोशिश की, लेकिन यह फ्लॉप हो गई। यानी अब भाजपा को भी विपक्ष के खिलाफ नए ढंग की रणनीति बनानी होगी।

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