प्राकृतिक नियमों की छेडछाड से अनिष्ठ ग्रहव्याधि का खतरा
भारतीय आयुर्विज्ञान,शरीर रचना शास्त्र,मानसिक विज्ञान और ज्योतिष विज्ञान, गरुण पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, प्राकृतिक नियमों की छेडछाड की वजह से युवा पुरुषों और तरुण महिलाओं के भावी जीवन विकास में खतरा है. विविध व्याधिदोष ग्रस्त युवकों के संग अनैतिक यौन संबंध से तरुण महिलाओं की योनि ढीली और कमजोर हो जाती हैं.परिणामत: भाग्य भविष्य में गिरावट आती ही है। अनिष्ठ सूतक ग्रहों के दुष्प्रभाव से पति पत्नी मे छोडछुट्टी और
तलाक होने का खतरा है। कुल्हा में यौन व्यभिचार से गर्भाशय कैंसर, रक्त कैंसर और स्तन कैंसर सहित विभिन्न संक्रामक रोगों का खतरा हैं. अनैतिक यौन संबंध से गर्भाशय में जीवित शुक्राणुओं कुचलकर मर जाते हैं. इससे जीवनीय विकास कामों में व्यवधान, मानसिक तनाव, परीक्षा,नौकरी और साक्षात्कार में असफलता, भविष्य में मनचाहा जीवनसाथी नही मिलने और संतान प्राप्ति में कठिनाई, और पारिवारिक शांति भंग होने का खतरा है। जन्म केंद्र बिन्दू यौन संचारित व्याधिदोषों से ग्रस्त युवाओं के साथ अनैतिक अंतरंग, आलिंगन और चुंबन निषिद्ध है। क्षय रोग सहित विभिन्न संक्रमणों से पीड़ित युवक-युवतियों के ओंठ मुंह थूक लार गाल गले मे पशीने मे 3% जठरांत्र संबंधी संक्रमण, रक्त कैंसर 2%, साथ ही गर्भाशय कैंसर 3% और स्तन कैंसर 2%, है,3%%एड्स,3% सुगर और 3% वात-पित्त कफ और शन्निपात संक्रमण 4% पाया जाता है.परिणामत:उनके विवाहित पतियों मे नपुंसकता का खतरा और व्याधिदोष ग्रस्त तरुण महिलाओं में बांझपन का खतरा है।
इन संक्रमित युवकों के साथ आलिंगन, चुंबन और अवैध यौन संबंध बनाने से असाध्य यौन संचारित रोग (सैक्स फीवर) होने का खतरा हो है। इससे चेहरे की सुंदरता में कमी, वैवाहिक संबंधों में तनाव, मनचाहा जीवन साथी ना मिल पाना और निकट भविष्य में गर्भधारण में समस्याएँ हो सकती हैं। इसके अलावा बुद्धी भ्रष्ट होने से चिंता ग्लानी, बुरी नज़र, अशिष्टता, जादू-टोना, दुर्भाग्य, टोने-टोटके, पागलपन,किसी का किया कराया जैसे अंधविश्वास का शिकार होना पडता है.और असाध्य यौन संचारित रोगों के जोखिम को बढ़ाते हैं। क्योंकि अनैतिक संभोग के कारण गर्भाशय में जीवित शुक्राणुओं की मृत्यु के बाद की अशुद्धि की अवधि में अनिष्ठ सूतक पातक व्याधि दोष” कहा जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार मनोविज्ञान ने इस अवधि को अनुष्ठानों, धार्मिक गतिविधियों और कभी-कभी सामान्य सामाजिक मेलजोल के लिए भी अअशुभ अशुभ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति की दैनिक और आध्यात्मिक प्रगति में अस्थायी रूप से बाधा डाल सकती है। किसी भी पाप पाखण्ड पूर्ण या अनैतिक यौन सेक्स संबंध कार्यों के परिणामों को “सूतक पातक व्याधि दोष” कहा जाता है। इससे जीवन में दुर्भाग्य, मानसिक अशांति और आध्यात्मिक पतन होता है।
ज्योतिष की भाषा में, विभिन्न ग्रहों की स्थिति और दशा (जैसे शनि की साढ़ेसाती या राहु-केतु का प्रभाव), मंगल और बृहस्पति की अप्रसन्नता और कालसर्प दोष से प्रकोप से जीवन में अनेक चुनौतियाँ, विभिन्न असाध्य स्वास्थ्य समस्याएँ और संघर्ष लाती हैं, जो उज्ज्वल भविष्य के मार्ग में बाधक बनती हैं। शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ (व्याधि) व्यक्ति की ऊर्जा, कार्यक्षमता और जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता को सीधे तौर पर क्षीण करती हैं।
आधुनिक तर्कसंगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, इन अवधारणाओं को अक्सर प्रतीकात्मक माना जाता है। जीवन में प्रगति में मुख्य बाधाएँ वास्तविक शारीरिक बीमारियाँ (रोग), मानसिक तनाव, सामाजिक चुनौतियाँ, व्यक्तिगत गलतियाँ (पाप के आधुनिक रूप) और बाहरी परिस्थितियाँ हो सकती हैं।
यह कथन, एक मेडीकल साइंस और निश्चित दार्शनिक या धार्मिक ढाँचे के अंतर्गत, इन कारकों को जीवन के समग्र विकास में प्रमुख बाधा मानता है। अतः रोग के निदान और सफल उपचार के लिए उचित देवभूमि या परम पवित्र स्थान पर, शुभ दिन, शुभ समय और शुभ नक्षत्र में, एकांत वास में अनुभवी एवं कुशल ज्ञान विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा उचित शुद्धिकरण और पवित्रीकरण कराना उचित माना गया है। इससे आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होगा और प्राकृतिक नियमों के पालन से जीवन का भविष्य सुरक्षित रहेगा। चूँकि यह एक गोपनीय विषय है, अतः इज्जत का सम्मान और लोक-मर्यादा की दृष्टि से प्राकृतिक नियमों का पालन आवश्यक है। आत्म-सम्मान और लोक-मर्यादा की दृष्टि से इस विषय में गोपनीयता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
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