आन्नद कंद श्रीकृष्ण चंद्र ने गीता मे कहा है कि दुराचारी मनुष्य यदि अनन्य भाव से परमात्मा को भजता है , तो उसके अच्छे संकल्प के कारण वह साधु मानने – योग्य होता है । वह शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है और सदा की शान्ति प्राप्त करता है ।
प्रभु परमात्मा के भक्त को भवसागर की नाशवन्त गतियों से मुक्ति मिल जाती है । जब पाप योनि में जन्म लेनेवाली स्त्रियाँ और निकृष्ट सोच वाला मनुष्य जो भी परमात्मा की शरण लेते हैं , वे परम गति पाते हैं , तब पुण्ययोनि में जन्म लेकर जो भगवान के भक्त होते हैं , उनके लिए कहना ही क्या ? इसलिए हे लोगो ! इस अनित्य और सुखरहित लोक में जन्म लेकर भगवान का भजन करो । उनमें मन लगाओ , उनके भक्त बनो , उनके लिए यज्ञ करो और उन्हें प्रणाम करो । इस तरह उनमें परायण रहकर आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़कर उनको पाओगे । परमात्मा के स्थूल – व्यक्त सगुण नररूप , सगुण देवरूप , अणु – से – अणु सूक्ष्म सगुण रूप , ॐ ( निर्गुण शब्द – ब्रह्म ) रूप और स्वरूप हैं । आत्मा का मिलाप या योग परमात्म – स्वरूप से होगा । मन सूक्ष्म – सगुण तक युक्ति से लग सकता है । मनविहीन चेतन – आत्मा जब निर्गुण शब्द – ब्रह्म ॐ में लगेगी , तब उससे आकृष्ट हो उसके लय स्थान ( परमात्म – स्वरूप ) तक पहुँचेगी । आत्मा – परमात्मा के एकीभाव
स्थूल – सगुण रूप के अतिरिक्त उनके सूक्ष्म – सगुण भाव को भी जानना और उनकी भी उपासना करनी चाहिए । इसलिए गीता में अणु से भी अणु रूप परमात्मा का वर्णन है । निर्गुन स्वरूप का भी ज्ञान प्राप्त हो , उनकी उपासना की जाय , इसलिए गीता में ॐ तथा अव्यक्त स्वरूप का भी वर्णन है । जैसे भाँति – भाँति के पहिरावे के बदलने से पहननेवाला नहीं बदलता , वह अपने तईं जो का सो ही रहता है , उसी तरह स्थूल – सूक्ष्म तथा सगुण – निर्गुण भावों में परमात्मा ही रहते हैं ।
केवल स्थूल सगुण रूप की ही उपासना से और उनकी कृपा से सूक्ष्म सगुण , निर्गुण शब्द – ब्रह्म ( ॐ ) तथा अव्यक्त स्वरूप परमात्मा के , आप – से – आप मिलने का विश्वास रखना तथा सूक्ष्म सगुण और निर्गुण की उपासना को अनावश्यक प्रतीत करना ठीक नहीं ।
यदि वे उपासनाएँ अनावश्यक होतीं , तो गीता में कही ही नहीं जातीं । अध्याय ८ के श्लोक ९ से १३ में इनकी उपासना और उसका फल साफ – साफ कहा गया है ।
श्रीमद्भागवत में भी स्थूल सगुण उपासना के अनन्तर शून्य – ध्यान ( सूक्ष्म सगुण – उपासना ) का क्रमानुसार कथन किया गया है । ( स्कन्ध ११ , अध्याय १४ , श्लोक ३२ , ३४ , ४२ , ४३ और ४४ ) । अव्यक्त निर्गुण के विषय में सूरदासजी के ये शब्द हैं–
“जौं लौं सत्य स्वरूप न सूझत । तौं लौं मनु मणि कण्ठ बिसारे , फिरत सकल बन बूझत ॥ अपनो ही मुख मलिन मन्द मति , देखत दर्पण माँह । ता कालिमा मेटिबे कारण , पचत पखारत छाँह । तेल तूल पावक पुट भरि धरि , बनै न दिया प्रकासत । कहत बनाय दीप की बातें , कैसे हो तम नासत ।। सूरदास जब यह मति आई , वे दिन गये अलेखे । कह जाने दिनकर की महिमा , अन्ध नयन बिनु देखे ।।”
अपुनपौ आपुन ही में पायो । शब्दहि शब्द भयो उजियारो , सतगुरु भेद बतायो । ज्यों कुरंग नाभी कस्तूरी , ढूँढ़त फिरत भुलायो । फिर चेत्यो जब चेतन है करि , आपुन ही तन छायो ॥ राज कुँआर कण्ठे मणि भूषण , भ्रम भयो कह्यो गँवायो । दियो बताइ और सतज्रन तब , तनु को पाप नशायो ॥ सपने माँहि नारि को भ्रम भयो , बालक कहूँ हिरायो । जागि लख्यो ज्यों को त्यों ही है , ना कहुँ गयो न आयो ॥ सूरदास समुझे की यह गति , मन ही मन मुसुकायो । कहि न जाय या सुख की महिमा , ज्यों गूंगो गुड़ खायो ॥ ( भक्तवर सूरदास )
केवल स्थूल – सगुण को ही हठपूर्वक पकड़े नहीं रहना चाहिए । इसीलिए लोकमान्य बालगंगाधर तिलकजी ने ‘ गीता – रहस्य ‘ के भक्ति – मार्ग प्रकरण में लिखा है- ‘ साधन की दृष्टि से यद्यपि वासुदेव – भक्ति को गीता में प्रधानता दी गई है , तथापि अध्यात्म – दृष्टि से विचार करने पर वेदान्त – सूत्र की नाईं ( वे ० सू ० , ४/१/४ ) गीता में भी यही स्पष्ट रीति से कहा है कि ‘ प्रतीक ‘ एक प्रकार का साधन है – वह सत्य , सर्वव्यापी और नित्य परमेश्वर हो नहीं सकता । अधिक क्या कहें ? नामरूपात्मक और व्यक्त अर्थात् सगुण वस्तुओं में से किसी को भी लीजिए , वह माया ही हैं ; जो सत्य परमेश्वर को देखना चाहे , उसे इस सगुण रूप के भी परे अपनी दृष्टि को ले जाना चाहिए । भगवान की जो अनेक विभूतियाँ हैं , उनमें अर्जुन को दिखलाए गए विश्वरूप से अधि क व्यापक भगवान ने नारद को दिखलाया , तब उन्होंने कहा है , ‘ तू मेरे जिस रूप को देख रहा है , यह सत्य नहीं है , यह माया है । मेरे सत्यस्वरूप को देखने के लिए इसके भी आगे तुझे जाना चाहिए । ‘ ( महाभारत , शान्तिपर्व , ३३ ९ / ४४ ) और गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट रीति से यही कहा है–
“अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ ( गीता ७/२४ )
यद्यपि मैं अव्यक्त हूँ , तथापि मूर्ख लोग मुझे व्यक्त ( गीता ७/२४ ) अर्थात् मनुष्य – देहधारी मानते हैं ( गीता ९ -११ ) ; परन्तु यह बात सच नहीं है , मेर अव्यक्त स्वरूप ही सत्य है । इसी तरह उपनिषदों में भी यद्यपि उपासना के लिए मन , वाचा , सूर्य , आकाश इत्यादि अनेक व्यक्त और अव्यक्त ब्रह्म – प्रतीकों का वर्णन किया गया है , तथापि अन्त में यह कहा है कि जो वाचा , नेत्र या कान को गोचर हो , वह ब्रह्म नहीं है । जैसे–
यन्मनसा न मनुते येनाऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ( केनोपनिषद् , खण्ड १ , मंत्र ५ )
अर्थ – मन से जिसका मनन नहीं किया जा सकता , किन्तु मन ही जिसकी मनन – शक्ति में आ जाता है , उसे तू ब्रह्म समझ , जिसकी उपासना ( प्रतीक के तौर पर ) की जाती है , वह सत्य ब्रह्म नहीं है ।
‘ नेति नेति ‘ सूत्र का भी यही अर्थ है । मन और आकाश को लीजिए ; अथवा व्यक्त उपासना – मार्ग के अनुसार शालिग्राम , शिवलिंग इत्यादि को लीजिए ; या श्रीराम , कृष्ण आदि अवतारी पुरुषों की अथवा साधु पुरुषों की व्यक्त मूर्ति का चिन्तन कीजिए ; मंदिरों में शिलामय अथवा धातुमय देव की मूर्ति को देखिए ; अथवा बिना मूर्ति का मंदिर या मस्जिद लीजिए – ये सब छोटे बच्चे की लँगड़ी गाड़ी के समान मन को स्थिर करने के अर्थात् चित्त की वृत्ति को परमेश्वर की ओर झुकाने के साधन हैं । प्रत्येक मनुष्य अपनी – अपनी इच्छा और अधिकार के अनुसार उपासना के लिए किसी प्रतीक को स्वीकार कर लेता है । यह प्रतीक चाहे कितना प्यारा हो , परन्तु इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि सत्य परमेश्वर इस ‘ प्रतीक ‘ में नहीं हैं ‘ – न प्रतीके न हिसः ( वे ० सू ० ४/१/४ ) -उसके परे है । यह मनुष्यों की अत्यन्त शौचनीय मूर्खता का लक्षण है कि वे इस सत्य तत्त्व को तो नहीं पहचानते कि ईश्वर सर्वव्यापी , सर्वसाक्षी , सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान और उसके भी परे अर्थात् अचिन्त्य है । किन्तु वे ऐसे नाम – रूपात्मक व्यर्थ अभिमान के अधीन हो जाते हैं कि ईश्वर ने अमुक समय , अमुक देश में , अमुक माता के गर्भ से , अमुक वर्ण का , नाम का या आकृति का जो व्यक्त स्वरूप ध रण किया , वही केवल सत्य है और इस अभियान में फंसकर एक – दूसरे की जान लेने तक को उतारू हो जाते हैं ।
‘ साकार के उस पार निराकार अचिन्त्यस्वरूप है , यह तो सबको समझे ही निरस्तार है । भक्ति की पराकाष्ठा यह है कि भक्त भगवान में विलीन हो जाय और अन्त में केवल एक अद्वितीय अरूपी भगवान ही रह जाएँ । ‘ ( अनासक्तियोग , अध्याय १२ , श्लोक ५ के अर्थ की टिप्पणी से । )
‘ सगुण पहले , परन्तु उसके बाद निर्गुण की सीढ़ी आनी ही चाहिए , नहीं तो परिपूर्णता नहीं होगी । ‘ ( गीता – प्रवचन , पृष्ठ १७३ ) ।
इन उद्धरणों का आशय यह है कि परमात्मा के सगुण और निर्गुण ; दोनों रूपों का ज्ञान और उनकी उपासना चाहिए ।
राजविद्या का क्या अभिप्राय है , इसके पहले लिखा जा चुका है । अब ‘ राजगुह्य ‘ का अभिप्राय भी स्पष्ट रूप से जान लेना आवश्यक है । गुप्त या गुढ़ रहस्यों में जो सबसे विशेष गुप्त हो , उसको राजगुह्य कहना चाहिए । इस अध्याय के किस विशेष रहस्यमय कथन को यह आकर्षक नाम दिया गया है ? यदि कहें कि प्रत्यक्ष जानने में आने योग्य स्थूल – सगुण नर – रूप परमात्मा के रूप की अवज्ञा नहीं करके उसमें अत्यन्त श्रद्धा रखकर इस अध्याय में कही गयी रीति से भक्ति करने का जो कथन है , वही राजगुह्य्य* तत्त्व है , तो यह कोई गुप्त और विशेष रहस्यमयी बात नहीं जान पड़ती । यह भक्ति तो भारत में सर्वत्र प्रकट है और अति व्यापक रूप से विदित है । हाँ , यदि उपर्युक्त प्रचलित स्थूल – सगुण भक्ति में सूक्ष्म – सगुण ‘ अणोरणीयाम्** ‘ ( विन्दु ) रूप की भक्ति और ॐ ∆ ( शब्दब्रह्म वा ब्रह्मनाद ) रूप निर्गुण निराकार – भक्ति मिला दें , तो इस प्रकार की ‘ सर्वांगपूर्ण परमात्म – भक्ति ∆ ‘ को अवश्य ‘ राजगुह्य ‘ कहेंगे ।
यह प्रकट रूप से विख्यात नहीं है और अति स्वल्प संख्यक लोग ही इसे जानते हैं । यदि कहा जाय कि परमात्मा के ये ( विन्दु और नाद ) रूप प्रत्यक्षावगम ( प्रत्यक्ष जानने में आनेयोग्य ) नहीं हैं , तो इनके द्वारा उपासना वा भक्ति – विधि को ‘ राजगुह्य ‘ कैसे माना जाय ? तो उत्तर में निवेदन है कि क्या जन्मान्ध को सूर्य वा कोई अन्य रूप देखने में आता है ? क्या जन्मान्ध का कुछ भी देखना असम्भव नहीं है ? परन्तु जो जन्मान्ध नहीं है , उनके लिए संसार के विविध रंग – रूप क्या प्रकट नहीं है ? क्या अणुवीक्षण यन्त्र से और युक्ति से वायु में भंसते हुए अनेक त्रसरेणु और कीटाणु नहीं देखे जाते हैं ? देखने और सुनने की युक्तियाँ भक्तों को भेदी ( युक्ति जाननेवाले ) गुरु – द्वारा ज्ञात होती हैं , जिनके द्वारा अभ्यास करके वे विन्दु और नाद को सुखसाध्य रीति से प्रकट पाते हैं ; परन्तु जिनको इसका गुरु नहीं , जिनको गुरु की आवश्यकता ही नहीं जानने में आवे और जो गुरु में श्रद्धा – भक्ति रखनी पाप , अयोग्यता , अपना अपमान और मूढ़ता जाने वा गुरु में श्रद्धाभक्ति रखनेवाले होते हुए भी जिनकी बुद्धि केवल स्थूल और बाह्य भक्ति – विधि की टेक में ही जकड़कर अड़ी हुई रहती है , ऐसे लोग ‘ राजगुह्य ‘ नाम की भक्ति को जैसा कुछ समझें , उनके लिए वही ठीक है ।
मैं अत्यन्त दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि ‘ राजगुह्य ‘ नाम की भक्ति ही असली राजयोग है । यदि गीता से कर्मयोग को निकाल दिया जाय तो गीता के सार रहस्य – रूप प्राण ही निकल ज ाते हैं । इस ‘ राजगुह्य ‘ नाम की भक्ति के साधक को कर्मयोग का साध न सुगमता से होता जाएगा । कर्मयोगी कर्तव्य कर्म में लगा रहता हुआ पहले स्थूल – सगुण मन में बनाए रखकर कर्म कर सकेगा । बाद में सूक्ष्म – सगुण के दर्शन हो जाने पर उसे ही मन से पकड़े हुए रहकर कर्म करेगा और अन्त में वह ॐ ( ब्रह्मनाद ) को प्राप्त करने पर अपने को उससे ही पकड़ा हुआ पावेगा । उसको सहज समाधि की स्थिति प्राप्त हो जाएगी । वह सारे कर्तव्यों को करता हुआ जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्ति ; तीनों अवस्थाओं में उस अनुपम परमात्मा से कभी नहीं बिछुड़ेगा ।
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