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(भाग-76) श्रीमद्-गीता के 11 अध्याय के प्रभाव से राक्षस ने देह त्याग करके चतुर्भुजरूप धारण कर लिया

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

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गीता के ग्यारहवें अध्याय के प्रभाव से वह शापसे मुक्त हो गया। उसने राक्षस-देह का परित्याग करके चतुर्भुजरूप धारण कर लिया तथा उसने जिन सहस्रों पथिकों का भक्षण किया था, वे भी शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये चतुर्भुजरूप हो गये। तत्पश्चात् वे सभी विमानपर आरूढ़ हुए।
ग्यारहवां अध्याय का माहात्म्य में महादेवजी पार्वती से कहते हैं-—प्रिये ! गीता के वर्णन से सम्बन्ध रखने वाली कथा एवं विश्वरूप अध्याय के पावन माहात्म्य को श्रवण करो। विशाल नेत्रों वाली पार्वती ! इस अध्याय के माहात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। इसके सम्बन्धमें सहस्त्रों कथाएँ हैं। उनमें से एक यहाँ कही जाती है।

प्रणीता नदी के तटपर मेघङ्कर नाम से विख्यात एक बहुत बड़ा नगर है। उसके प्राकार (चहारदिवारी) और गोपुर (द्वार) बहुत ऊँचे हैं। वहाँ बड़ी-बड़ी विश्रामशालाएँ हैं, जिनमें सोने के खंभे शोभा दे रहे हैं।
उस नगर में श्रीमान्, सुखी, शान्त, सदाचारी तथा जितेन्द्रिय मनुष्यों का निवास है। वहाँ हाथ में शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले जगदीश्वर भगवान् विष्णु विराजमान हैं। वे परब्रह्म के साकार स्वरूप हैं, संसार के नेत्रों को जीवन प्रदान करनेवाले हैं।
उनका गौरवपूर्ण श्रीविग्रह भगवती लक्ष्मी के नेत्र-कमलों द्वारा पूजित होता है। भगवान की वह झाँकी वामन-अवतार की है। मेघके समान उनका श्यामवर्ण तथा कोमल आकृति है। वक्षःस्थलपर श्रीवत्स का चिह्न शोभा पाता है।
कमल और वनमाला से विभूषित हैं। अनेक प्रकार के आभूषणों से सुशोभित हो भगवान् वामन रत्नयुक्त समुद्र के सदृश जान पड़ते हैं। पीताम्बर से उनके श्याम विग्रह की कान्ति ऐसी प्रतीत होती है, मानो चमकती हुई बिजली से घिरा हुआ स्निग्ध मेघ शोभा पा रहा हो।
उन भगवान् वामन का दर्शन करके जीव जन्म एवं संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है। उस नगर में मेखला नामक महान् तीर्थ है, जिसमें स्नान करके मनुष्य शाश्वत वैकुण्ठधाम को प्राप्त होता है।
वहाँ जगत के स्वामी करुणासागर भगवान् नृसिंह का दर्शन करने से मनुष्य सात जन्मों के किये हुए घोर पापसे छुटकारा पा जाता है। जो मनुष्य मेखला में गणेशजीका दर्शन करता है, वह सदा दुस्तर विघ्नों के भी पार हो जाता है।

उसी मेघङ्कर नगरमें कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जो ब्रह्मचर्यपरायण, ममता और अहंकार से रहित, वेद-शास्त्रों में प्रवीण, जितेन्द्रिय तथा भगवान् वासुदेव के शरणागत थे। उनका नाम सुनन्द था।
प्रिये ! वे शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले भगवान के पास गीता के ग्यारहवें अध्याय “विश्वरूपदर्शनयोग” का पाठ किया करते थे। उस अध्याय के प्रभाव से उन्हें ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई
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परमानन्द-संदोहसे पूर्ण उत्तम ज्ञानमयी समाधि के द्वारा इन्द्रियों के अन्तर्मुख हो जानेके कारण वे निश्चल स्थितिको प्राप्त हो गये थे और सदा जीवन्मुक्त योगीकी स्थिति में रहते थे।
एक समय जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित थे, महायोगी सुनन्द ने गोदावरी तीर्थ की यात्रा आरम्भ की। वे क्रमशः विरजतीर्थ, तारातीर्थ, कपिलासंगम, अष्टतीर्थ, कपिलाद्वार, नृसिंहवन, अम्बिकापुरी तथा करस्थानपर आदि क्षेत्रों में स्नान और दर्शन करते हुए विवाहमण्डप नामक नगरमें आये।
वहाँ उन्होंने प्रत्येक घर में जाकर अपने ठहरने के लिये स्थान माँगा, परंतु कहीं भी उन्हें स्थान नहीं मिला। अन्त में गाँव के मुखिया ने उन्हें एक बहुत बडी धर्मशाला दिखा दी। ब्राह्मण ने साथियों सहित उसके भीतर जाकर रात में निवास किया।
सबेरा होने पर उन्होंने अपने को तो धर्मशाला के बाहर पाया, किंतु उनके और साथी नहीं दिखायी दिये। वे उन्हें खोजने के लिये चले, इतने में ही ग्रामपाल (मुखिये) से उनकी भेंट हो गयी।
ग्रामपाल ने कहा-‘मुनिश्रेष्ठ ! तुम सब प्रकार से दीर्घायु जान पड़ते हो। सौभाग्यशाली तथा पुण्यवान् पुरुषों में तुम सबसे पवित्र हो। तुम्हारे भीतर कोई लोकोत्तर प्रभाव विद्यमान है। तुम्हारे साथी कहाँ गये ? और कैसे इस भवन से बाहर हुए ? इसका पता लगाओ।
मैं तुम्हारे सामने इतना ही कहता हूँ कि तुम्हारे-जैसा तपस्वी मुझे दूसरा कोई नहीं दिखायी देता। विप्रवर ! तुम्हें किस महामन्त्र का ज्ञान है ? किस विद्या का आश्रय लेते हो तथा किस देवता की दया से तुम्हें अलौकिक शक्ति आ गयी है ?

भगवन् ! कृपा करके इस गाँव में रहो। मैं तुम्हारी सब सेवा-शुश्रूषा करूँगा।’ यों कहकर ग्रामपाल ने मुनीश्वर सुनन्द को अपने गाँव में ठहरा लिया। वह दिन-रात बड़ी भक्ति से उनकी सेवा-टहल करने लगा।
जब सात-आठ दिन बीत गये, तब एक दिन प्रातःकाल आकर वह बहुत दुखी हो महात्मा के सामने रोने लगा और बोला-‘हाय ! आज रात में राक्षस ने मुझ भाग्यहीन के बेटे को चबा लिया है। मेरा पुत्र बड़ा ही गुणवान् और भक्तिमान् था।’

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