भाग:222) जानिए रहस्यमयी 14 विधाएं 64 कलाएं सीख श्रीकृष्णचंद्र ने किया था राक्षसों का संहार
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार दोनों भाइयों ने महज 64 दिनों में 64 कलाएं भी सीख ली थीं।
धर्मधानी उज्जयिनी भगवान कृष्ण की शिक्षास्थली भी रही है। यहां सांदीपनि आश्रम में कृष्ण ने अपने भाई बलराम और सखा सुदामा के साथ गुरु सांदीपनि से विद्या ग्रहण की थी। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार दोनों भाइयों ने महज 64 दिनों में 64 कलाएं ओर 14 विधाएं भी सीख ली थीं। इन 64 कलाओं में कुछ कलाएं रहस्मयी थीं, जिन्हें हर कोई नहीं सीख पाता था। इन कलाओं का उपयोग श्रीकृष्ण ने आततायियों के अंत के लिए किया।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में कृष्ण बलराम द्वारा ग्रहण की गई इन चौसठ कलाओं का उल्लेख है। 64 में से 20वीं कला इंद्रजाल, 21वीं चाहे जैसा वेष धारण कर लेना, 46वीं मुट्ठी की चीज या मन की बात बता देना, 49वीं शकुन-अपशकुन जानना, 55वीं छल से काम निकालना आदि शामिल हैं। दोनों ने 14 विद्याएं भी हासिल की थी। मां और बहन को सुनाई दिल की बात, और मिल गया जीवनभर का साथ। जरासंध का वध करवाया था
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में ही जरासंध के वध का भी प्रसंग है। इस प्रसंग में कृष्ण द्वारा वेष बदलकर ब्राह्मण बनने का उल्लेख है। दरअसल जरासंध ने भारतवर्ष के कई राजाओं को कैदी बना लिया था। भगवान श्री कृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मणों का वेश धारण कर गिरिव्रज जाते हैं और जरासंध से द्वंद्व युद्ध की भीक्षा मांगते हैं। इस पर जरासंध युद्ध के लिए तैयार होता और लड़ाई के लिए भीम को चुनता है। दोनों के बीच 28 दिनों तक युद्ध चला।
कृष्ण द्वारा युक्ति बताए जाने पर भीम जरासंध का वध किया। इस प्रकार कई राजाओं को प्रताड़ना से मुक्ति मिली। इसी तरह कृष्ण ने गुरु द्वारा सिखाई गई कलाओं का प्रयोग पृथ्वी पर शांति स्थापित करने और लोककल्याण के लिए किया था। इन कलाओं से जुड़ी एक दर्शक दीर्घा सांदीपनि आश्रम में बनाई गई है।
श्रीकृष्ण के पास मौजूद चौदह विद्याएं और चौसठ कलाओं का विवरण
रामायण, महाभारत जैसे अति प्राची सनातन हिंदू धर्मग्रंथ, पोथी-पुराण और हिंदू आध्यात्मिक कथाओं में कई बार चौदह (14) विद्या और चौसठ (64) कलाओं का वर्णन किया जाता है, और इसे सुनने या पढ़ने के पश्चात बहुतों में इनके बारे में संपूर्ण जानकारी पाने की जिज्ञासा होती है.
14 विद्याओं का गठन चार (4) वेद, चार (4) उपवेद और छह (6) वेदांग से होता है.
प्राचीन काल से जिन चौदह विद्या और चौंसठ कलाओं का वर्णन किया जाता है, वे इस प्रकार हैं:
4 वेद इस प्रकार है:-
1) ऋग्वेद: ऋग्वेद-संहिता ऋग्वैदिक वाङ्मय का मन्त्र-भाग है. इसमें 1017 सूक्त हैं. इसे विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद 3500 वर्षों से भी अधिक प्राचीन है.
2) यजुर्वेद: यजुर्वेद में यज्ञ से संबंधित विधियां और यज्ञों-कर्मों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्रो का विस्तृत वर्णन किया गया है हैं. यज्ञ के अलावा तत्व ज्ञान का वर्णन है. तत्व ज्ञान, अर्थात रहस्मयी ज्ञान, ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान. यह वेद गद्य-मय है.
3) सामवेद: चारों वेदों में सामवेद का महत्त्व सर्वाधिक है. साम’ शब्द का अर्थ है ‘गान’. सामवेद भारत के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में से एक है, और यह गीत-संगीत प्रधान वेद-ग्रंथ है. प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था. सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है.
4) अथर्ववेद: अथर्ववेद संहिता हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्म-ग्रंथ वेदों में से चौथे स्थान पर आता है. अथर्ववेद के दो पाठों, i) शौनक और ii) पैप्पलद, में संचरित हुए लगभग सभी स्तोत्र ऋग्वेद के स्तोत्रों के छदों में रचित हैं. अथर्ववेद का विद्वान् चारों वेदों का ज्ञाता माना जाता है.
4 उपवेद इस प्रकार है:-
1) अर्थशास्त्र: यह प्राचीन भारतीय हिंदू ग्रंथ है जो शासन-कला, आर्थिक और सैन्य रणनीति के बारे में ज्ञान प्रदान करता है, और “विष्णुगुप्त” को इसके लेखक के तौर पर जाना जाता है जो “कौटिल्य” के नाम से भी जाने जाते है.
2) धनुर्वेद: धनुर्वेद शब्द की उत्तपत्ति धनुष (घनश्या) और ज्ञान (वेद) इन दो शब्दों से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “धनुर्विद्या का विज्ञान”.
3) गंधर्ववेद: यह प्रदर्शन कलाओं पर एक आधारित एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ है. इसमें रंगमंच, नृत्य और संगीत कलाओं का समावेश किया गया हैं.
4) आयुर्वेद: आयुर्वेद या आयुर्वेदिक चिकित्सा भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है. आयुर्वेद शब्द आयुष (दीर्घायु) और वेद (ज्ञान) से बना है जो जीवन-विज्ञान को दर्शाता है.
6 वेदांग इस प्रकार है:-
1) व्याकरण – बोली भाषा में शब्दों का उपयोग कैसे और किस तरह किया जाये यह दर्शाता शास्त्र ज्ञान
2) ज्योतिष – ग्रह, नक्षत्र और अन्य खगोलीय पिण्डों का अध्ययन तथा कालचक्र को समझनेकी विद्या के विषय को ज्योतिष विज्ञान कहा जाता है
3) निरुक्त – वेदों में वर्णित कठिन शब्दों का अर्थ समझाने वाला शास्त्र
4) कल्प – धार्मिक अनुष्ठान, व्रतों, विधि-विधान तथा कर्मकांड का वर्णन करने वाला शास्त्र
5) छंद – शब्दों को काव्यात्मक रूप में ढाल कर गान रूप प्रदान करना
6) शिक्षा – शिक्षण देना, सिखना. अध्ययन और अध्यापन
चौसठ (64) कलाएं इस प्रकार हैं
1) अभिधान कोष छंदोज्ञान – शब्दों और छंदों की ज्ञान कला
2) वास्तुविद्या – घरों, भवनों, महलों का निर्माण करने की कला
3) बालक्रीडाकर्म – बच्चों का मनोरंजन करने की कला
4) चित्रशब्दापूपभक्षविपाक क्रिया – खाना बनाना, स्वादिष्ट भोजन की किस्में तैयार करने की कला
5) पुस्तकवाचन – काव्यालंकार, साहित्य, ग्रन्थ पढ़ने की कला
6) पट्टिका वेत्र वन कल्प – नवर, सुभ, वेत आदि से खटिया के लिए कपड़ा बुनने की कला
7) वैनायिकी विद्याज्ञान – अनुशासन, शिष्टाचार और विनय में निपुण बनने की कला
8) व्यायामिकी विद्याज्ञान – व्यायाम के बारे में शारीरिक और वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करणे की कला
9) वैजापिकी विद्याज्ञान – दूसरों पर विजय प्राप्त करने की कला
10) शुकसारिका प्रलापन – पक्षियों की बोली भाषा को जानने और समझने की कला
11) पानक रस और रागसव योजना – शराब और पेय पदार्थों को बनाने की कला
12) धतुवद – धातु विज्ञान, कच्चे और मिश्रधातु का पृथक्करण करने की कला
13) दुर्वाच योग – कठिन शब्दों की व्याख्या करना और निश्चित रूप से अर्थ निकालने की कला
14) आकर ज्ञान – खानों और खनिज विज्ञान की कला
15) काव्यसमस्यापूर्ती – आधी अधूरी कविता को पूर्ण रूप देने की कला
16) भाषाज्ञान – देशी और विदेशी विभिन्न भाषाओं का ज्ञान आत्मसात करने की कला
17) चित्रयोग – चित्र बनाना और उनमें रंगों को भरने की कला
18) कायाकल्प – वृद्ध व्यक्ति को युवा बनाना या उसे अपनी कला-कौशल से युवा जैसा दिखाने की कला
19) माल्यग्रंथ विकल्प – कपड़ों का सही विकल्प बनाने की कला
20) वृक्षायुर्वेद योग – बाग, उपवन, उद्यान बनाना तथा पेड़-पौधे जड़ी-बूटियों द्वारा चिकित्सा या चिकित्सा उपचार का अभ्यास करने की कला
21) आकर्षण क्रीडा – दूसरे को प्रलोभित या आकर्षित करने की कला
22) कौचुमार योग – किसी कुरूप व्यक्ति को साज श्रृंगार प्रसाधन द्वारा सुंदर बनाने की कला
23) हस्तलाघव – हाथ से शिल्पकला बनाने की कला
24) प्रहेलिका – कविता के माध्यम से कूट प्रश्न, पहेलियों को बनाने और सुलझाने की कला
25) प्रतिमाला – स्मृति और कौशल के परीक्षण के रूप में अंताक्षरी में माहिर बनने की कला
26) गंधयुक्ती – खुशबूदार सुगंधित गंध, लेप आदि निर्माण करने की कला
27) यंत्रमातृका – विभिन्न यंत्रों का निर्माण करने की कला
28) अत्तर विकल्प – फूलों से अर्क या इत्र बनाने की कला
29) संपाठय़ – दूसरों की बात सुनना और वही बात बिलकुल उसी ढंग से दोहराने की कला
30) धारण मातृका – यादाश्त को बढ़ाने और वृद्धिंगत करने की कला
31) छलीक योग – छल से धोखा देने की कला
32) वस्त्रगोपन – फटे कपड़ों की सिलाई करने की कला
33) मणिभूमिका – जमीन पर मोतियों से विविध रचनाये बनाने की कला
34) द्यूतक्रीडा – जुआ खेलने की कला
35) पुष्पशकटिका निमित्त ज्ञान – प्राकृतिक संकेतों और लक्षणों के आधार पर भविष्य बताने की कला
36) माल्यग्रथन – पुष्पमाला, माला, हार, गजरा बनाने की कला
37) मणिरागज्ञान – रंग के आधार पर रत्नों की पहचान करने की कला
38) मेषकुक्कुटलावक – युद्ध विधि मुर्गी, बकरा, सांप-नेवले आदि प्राणियों की लड़ाई लगाने की कला
39) विशेषकच्छेद ज्ञान – माथे पर लगाए जाने वाले तिलक के सांचे बनाने की कला
40) क्रिया विकल्प – किसी वस्तु की क्रिया के प्रभाव को उलट देने की कला
41) मानसी काव्यक्रिया – त्वरित और तत्तपरता से कविता रचने की कला
42) आभूषण भोजन – शरीर को सोने, चांदी या मोती से सजाने की कला
43) केशशेखर पीड ज्ञान – मुकुट बनाना और बालों में फूल संवारने की कला
44) नृत्यज्ञान – नृत्य कौशल में निपुणता पाने की कला
45) गीतज्ञान – शास्त्रीय गायन में गहन ज्ञान पाने की कला
46) तंडुल कुसुमावली विकार – चावल और फूलों की रंगोली निर्माण की कला
47) केशमार्जन कौशल्य – तेल से मस्तिष्क की मालिश करने की कला
48) उत्सादन क्रिया – तेल से अंगों की मालिश करने की कला
49) कर्णपत्र भंग – फूलों और पत्तियों द्वारा कर्णफुले बनाने की कला
50) नेपथ्य योग – मौसम के अनुसार वस्त्रालंकार को परिधान या चयन करने की कला
51) उदकघात – जलविहार करना, रंगीन पानी से पिचकारी बनाने की कला
52) उदकवाद्य – पानी से भरे बर्तन को वाद्य साधन के तहत ध्वनि निर्माण करने की कला
53) शयनरचना – बिस्तर को सजाने की कला
54) चित्रकला – नक्काशी वेलवुट्टी और चित्र आदि बनाने की कला
55) पुष्पास्तरण – फूलों को कलात्मक रूप से सजाकर बिस्तर बनाने की कला
56) नाटय़अख्यायिका दर्शन – नाटकों में अभिनय करने की कला
57) दशनवसनांगरात – दांत, कपड़े, शरीर को रंगना या सजाने की कला
58) तुर्ककर्म – चरखे पर सूत कताई की कला
59) इंद्रजाल – जादू-टोना, मन्त्र-तंत्र का ज्ञान और बाजीगरी की कला
60) तक्षणकर्म – लकड़ी पर नक्काशी बनाने की कला
61) अक्षर मुष्टिका कथन – करपल्लवी के माध्यम से वार्तालाप करने की कला
62) सूत्र तथा सूचीकर्म – कपडे पर धागे से रफू करने की कला
63) म्लेंछीतकला विकल्प – परभाषा ज्ञान की जानकारी हासिल करने की कला
64) रत्नरौप्य परीक्षा – कीमती धातुओं और रत्नों का परीक्षण करने की कला
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