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शंकराचार्य के सच्चे शिष्यगण भक्त होते है बेदाग निर्दोष और निरपराध

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शंकराचार्य के सच्चे शिष्यगण भक्त होते है बेदाग निर्दोष और निरपराध

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: 9822550220

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काशी बनारस। केदारघाट मठ बनारस के वेद वेदांत विशेषज्ञों का मानना है कि जगतगुरु शंकराचार्यों और महामण्डलेश्वरों के अधिकांश भक्त शिष्यगण अपने जीवन काल मे बेदाग निर्दोष और निरपराध होते हैं.हालकि कुछेक राजनैतिक पाखण्डी ठेकेदार अपने निज स्वार्थ पर धक्का लगने से बचने के लिए महात्मा विचारधारा के सज्जन बृंदों पर मनगढंत और बेबुनियाद आरोप और लांक्षन लगाकर दोषारोपण करते देखा और पाया जा रहा है।दरअसल मे जगतगुरु के शिष्यों को गुरुकुल मे एसी शिक्षा दीक्षा दी जाती है कि वह किसी दूसरे का रुपया धन दौलत वैभव तथा किसी दूसरे के यहां का खान-पान से भी संबंध कम रखते है.इनमे मुख्य रूप से निस्वार्थ भाव से राष्ट्रीय सामाजिक और सार्वजनिक सेवाभाव कूट कूट कर भरा रहता है,

जगतगुरू शंकराचार्य और महामण्डलेश्वर के भक्तगण को पराई स्त्रियों और पराया रुपया धन से दूरियां बनाए रखना होता है. जरुरत पडने पर वे आध्यात्मवादी सज्जन जनों के यहां से भिक्षाटन के द्धारा अपना निरवहन करना उन्हें पसंद होता है. जो सदैव ज्ञान भक्ती और तपस्या के माध्यम से दानदाता को आशीर्वाद प्रदान करने के लिए भगवान से प्रार्थना करना होता है.

हालकि वर्तमान परिवेश में अधिकांश निकृष्ट और ओछेपन की राजनैति करने वाले भ्रष्ट स्वार्थी नेता कान के कच्चे और वास्तविक आंतरिक आंखों के अंधे पाये जाते हैं.जो कि सच्चाई जाने बिना किसी भी सज्जन जनों के खिलाफ कुछ भी उलूल जुलूल आरोप प्रत्यारोप करते रहते हैं?नतीजतन अधिकांश बिचौलिए और मौकापरस्त छुटभैये नेताओं मे कर्कशा कुटला और वैश्याओं जैसे चरित्र और आचरण पाये जाते है.जबकि वैदिक सनातन धर्म को सच्चे दिल से मानने वाले भक्तगण अपने ह्रदय में सनातन धर्म की ध्वजा को धारण करने वाले हौते हैं.वे किसी की ईर्ष्या जलनखोरी चोरी चुगलखोरी चापलूसखोरी झूठ छल कपट विश्वाघाता बेईमानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए अभियान चलाते रहते हैं.

यह कथन एक व्यक्तिगत, भक्तिपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, न कि एक सार्वभौमिक, तथ्यात्मक सत्य है. ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से, शंकराचार्य के भक्त (जिन्हें अक्सर ‘शंकराचार्य’ या ‘स्मार्ट’ परंपरा का अनुयायी कहा जाता है) अन्य भक्तों की तरह ही इंसान होते हैं। “वेदाग” (वेदों के छह अंगों का ज्ञान रखने वाले), “निर्दोष” (दोषरहित), और “निरपराध” (अपराध रहित) होना व्यक्तिगत साधना, आचरण और नैतिक शुद्धता पर निर्भर करता है, न कि केवल किसी विशेष गुरु या परंपरा का अनुयायी होने पर।

धर्मग्रंथों और दर्शन में यह माना जाता है कि सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान या मोक्ष प्राप्त करने पर ही व्यक्ति दोषों से पूरी तरह मुक्त हो पाता है। तब तक, सभी मनुष्य कर्म के नियमों और सांसारिक दोषों के अधीन माने जाते हैं।

सार यह है कि किसी भक्त की शुद्धता उनके अपने जीवन और कार्यों से निर्धारित होती है, न कि केवल उनके गुरु के नाम से।दरअसल में राजनैतिक गलियारे ठेकेदारों की नीव एक दूसरे के प्रति शक करने, अपना उल्लू सीधा करके विकास कार्यों मे अनियमितताएं और भ्रष्टाचार को आत्मसात करते हैं. इसलिए मानव समाज का नैतिक पतन होता दिखाई पड रहा है. तदहेतु मामले की सच्चाई जाने बिना किसी पर बेबुनियाद आरोप नहीं लगाना चाहिए.

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