विश्व मे शल्य चिकित्सा और प्लास्टिक सर्जरी के जनक महर्षि शुश्रुत
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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नई दिल्ली। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार दुनियां के इतिहास में महर्षि सुश्रुत (छठी-सातवीं ईसा पूर्व) को भारतीय शल्य चिकित्सा (Surgery) का जनक और प्लास्टिक सर्जरी का अग्रदूत माना जाता है।
आचार्य सुश्रुत प्राचीन भारत के प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री तथा शल्य चिकित्सक थे। इन्हें शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। सुश्रुत ने प्रसिद्ध चिकित्सकीय ग्रंथ सुश्रुत संहिता की रचना की थी। इस ग्रंथ में शल्य क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है.सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था। सुश्रुत के जन्म के विषय में केवल अनुमान ही लगाये जा सकते है। उनका जन्म ऋषि विश्वामित्र के कुल में हुआ था और उनकी अद्भुत रचना सुश्रुत संहिता का रचना काल ईसा पूर्व छठी शताब्दी माना जाता है। दिवोवास नामक चिकित्सा शास्त्री काशी नरेश भी थे। उनका दूसरा नाम धन्वन्तरि भी था। उस काल में चिकित्सकों को धन्वन्तरि भी कहा जाता था। आचार्य सुश्रुत का जन्म भी ऐसे ही कुल में हुआ था। भारतीय चिकित्सा पद्धति में सुश्रुत संहिता को विशेष स्थान प्राप्त है। इसमें शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गये थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयाँ, चिमटियाँ आदि हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की। वैद्यकी क्षेत्र में त्वचारोपण- तंत्र के भी सुश्रुत अच्छे जानकार थे। सुश्रुत ने अपने ग्रन्थ में शल्य चिकित्सा की आठ प्रक्रियाओं छेद्य, भेद्य, लेख्य, वेध्य, ऐष्य, अहार्य, विश्रव्य, व सीव्य का उल्लेख किया है। सुश्रुत संहिता के पहले हिस्से यानी पूर्व तंत्र में पाँच हिस्से हैं। जिन्हें सूत्रस्थान, निदानस्थान, शरीरस्थान, कल्पस्थान तथा चिकित्सास्थान के नाम से लिखा गया है । इसके 120 अध्याय हैं, जिनमें आयुर्वेद के चार प्राथमिक अंगों ‘शल्यतंत्र’, ‘अगदतंत्र’, ‘रसायनतंत्र’, ‘वाजीकरण’ के बारे में विस्तार से बताया गया है। महर्षि सुश्रुत के ग्रन्थ का दूसरा हिस्सा यानी उत्तर तंत्र को चौंसठ अध्यायों में बाँटा गया है। जिसमें आयुर्वेद के बाकी के चार अंगों ‘शालाक्य’, ‘कौमार्यभृत्य’, ‘कायचिकित्सा’ तथा ‘भूतविद्या’ के विषय का उल्लेख किया गया है। आयुर्वेदीय साहित्य में शरीररचना का जितना विशद विवेचन सुश्रुत संहिता में प्राप्त होता है उतना किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं है। इसी कारण आयुर्वेद वाङ्मय में शारीरे सुश्रुतः श्रेष्ठः उक्ति प्रसिद्ध है
उन्होंने ‘सुश्रुत संहिता’ की रचना की, जिसमें 300 से अधिक सर्जरी प्रक्रियाओं, 120 उपकरणों और 1100+ रोगों का वर्णन है। काशी में भगवान धनवंतरी से शिक्षा पाकर उन्होंने युद्ध के घायलों पर सफल प्रयोग किए, जिनमें नासिका संधान (राइनोप्लास्टी) प्रमुख थी।
महर्षि सुश्रुत का इतिहास और प्रयास: प्रारंभिक जीवन में वे काशी में गंगा किनारे के निवासी थे और उन्हें महर्षि देवोदास का शिष्य माना जाता है।
शल्य क्रिया के जनक थे उन्होंने युद्ध में घायल सैनिकों का इलाज करते हुए शरीर रचना विज्ञान (Anatomy) और शल्य चिकित्सा का गहरा ज्ञान विकसित किया।
सुश्रुत संहिता: इस ग्रंथ में 1,120 बीमारियों, 120 शल्य उपकरणों (चाकू, चिमटियां, सुइयां), और 300 से अधिक प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं (प्लास्टिक सर्जरी, मोतियाबिंद, प्रसव) का विवरण है। प्लास्टिक सर्जरी और विशेषज्ञता: वे कटी हुई नाक को जोड़ने (राइनोप्लास्टी) की जटिल प्रक्रिया में निपुण थे, जो आधुनिक पुनर्निर्माण सर्जरी की नींव बनी।
प्रायोगिक शिक्षा: वे शिष्यों को शल्य चिकित्सा सिखाने के लिए फलों, सब्जियों और मृत शरीरों का उपयोग करते थे, जो उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
संज्ञाहरण (Anaesthesia): दर्द कम करने के लिए वे मद्यपान (शराब) या विशेष जड़ी-बूटियों का प्रयोग करते थे, इसलिए उन्हें अनस्थेसिया का पितामह भी कहा जाता है।
महर्षि सुश्रुत का महत्व:
वैश्विक मान्यता के अनुसार उन्हें ‘Father of Surgery’ के रूप में दुनिया भर में सम्मान प्राप्त है।
चिकित्सा में क्रांति मे उनका विशेष स्थान रहा है.हजारों साल पहले उनके द्वारा वर्णित शल्य क्रियाएं आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का आधार हैं, जैसे कि टांके लगाने की तकनीक, पथरी निकालना, और सिजेरियन ऑपरेशन।
शैक्षिक दृष्टिकोण: उन्होंने केवल इलाज ही नहीं किया, बल्कि उसे ‘सुश्रुत संहिता’ के माध्यम से अगली पीढ़ियों के लिए प्रलेखित (Documented) किया, जिससे चिकित्सा का ज्ञान संरक्षित हुआ।
अमर विरासत: ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में रॉयल ऑस्ट्रेलिया कॉलेज ऑफ सर्जन्स में उनकी मूर्ति स्थापित है, जो उनके कार्यों की महत्ता को दर्शाती है।
महर्षि सुश्रुत ने प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा को एक अलग और उन्नत पहचान दी, जो अपने समय से सदियों आगे थी।
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