मायामरी न मन मरा मर मर जाए शरीर आशा तृष्णा न मरी:-दासकबीर
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
9822550220
महान सूफी संत कबीरदास की अमृत वाणी के अनुसार
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर,” जीवन की नश्वरता और इच्छाओं की अनंतता को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि नश्वर शरीर मर जाता है, लेकिन मन, लोभ, माया और तृष्णा (इच्छाएं) हमेशा जीवित रहती हैं, जो इंसान को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधे रखती हैं।
दोहे का विस्तृत अर्थ और भावार्थ: माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर: इंसान का भौतिक शरीर उम्र के साथ नष्ट हो जाता है, लेकिन मन में बसी सांसारिक मोह-माया, लोभ और वासना कभी खत्म नहीं होती। आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर: कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य की उम्मीदें, आशाएं और कामनाएं (तृष्णा) कभी नहीं मरतीं, वे शरीर बदलने के बाद भी नई इच्छाओं के रूप में बनी रहती हैं।
भाव: सच्ची मुक्ति या मोक्ष शरीर की मृत्यु में नहीं, बल्कि मन की इच्छाओं और मोह को जीतने में है। जब तक इंसान लोभ और माया से मुक्त नहीं होता, तब तक वह सांसारिक बंधनों में बंधा रहता है।
यह दोहा हमें यह संदेश देता है कि हमें सांसारिक भोग -विलास से ऊपर उठकर आत्मज्ञान और संतोष को अपनाना चाहिए।
“संसार में बहुत से लोग अपनी अज्ञानता अविद्या स्वार्थ क्रोध लोभ हठ अभिमान आदि दोषों के कारण दूसरों के साथ अनुचित व्यवहार करते रहते हैं। वे स्वयं अयोग्य होते हुए भी दूसरे योग्य व्यक्तियों पर अपना शासन चलाना चाहते हैं।”
परंतु वे भोले लोग इस बात को नहीं समझते, कि “संसार में सभी आत्माएं एक जैसी हैं।”* उन्हें ऐसे सोचना चाहिए कि “जब आप नहीं चाहते कि कोई दूसरा योग्य व्यक्ति आप पर शासन करे, तो दूसरा योग्य व्यक्ति क्यों चाहेगा, कि आप उस पर शासन करें?” न्याय तो यही कहता है कि “जिसकी योग्यता कम हो, वह अधिक योग्यता वाले व्यक्ति के अनुशासन में रहे। कोई किसी पर अन्याय न करे। तभी सबका सुख बढ़ेगा।”
“फिर भी अपनी इस मूर्खता के कारण वे लोग दूसरे योग्य व्यक्तियों के साथ दुर्व्यवहार करते रहते हैं। अपने हठ अभिमान और क्रोध आदि दोषों के कारण दूसरों को दुख देते रहते हैं,” जिसका परिणाम यह होता है कि “उनके अन्य बुद्धिमानों के साथ संबंध टूट जाते हैं। वे जीवन भर दूसरे बुद्धिमानों से होने वाले लाभ को खो देते हैं, और जीवन भर अनेक प्रकार की हानियां उठाते हैं।” “यदि वे ऐसा न करते, और अन्य बुद्धिमानों के साथ प्रेम पूर्वक न्याय पूर्वक सत्य व्यवहार करते, तो उन्हें ऐसी हानियां नहीं उठानी पड़ती।”
इसलिए इस बात को सब लोग समझने का प्रयास करें, कि “क्रोध, हठ और अभिमान करने से कोई लाभ नहीं होता, बल्कि बहुत सारी हानियां होती हैं।”
हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि “हे भगवान्! आप सबको सद्बुद्धि दें। ताकि सब लोग अपनी मूर्खता हठ क्रोध लोभ आदि दोषों को छोड़कर सबके साथ न्यायपूर्वक अच्छा व्यवहार करें और अन्य लोगों के गुणों से भी जीवन भर लाभ उठाएं।”
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