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वर्णसंकर किस्म की होती है नाजायज पिता की चरित्रहीन वामपंथी संतानै  

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वर्णसंकर किस्म की होती है नाजायज पिता की चरित्रहीन वामपंथी संतानै

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:

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9822550220

 

प्राचीनतम वैदिक सनातन धर्म के अनुसार नाजायज पिता से उत्पन्न संतान को वर्णसंकर (दोग्ली नश्ल) मिश्रित हाइब्रिड कहते है. दुनिया-भर मे सबसे अधिक वर्णसंकर किस्म का समुदाय पाश्चात्य देशों की सांस्कृतिक में पाया गया है.जिन्हे पाश्चात्य संस्कृति से प्रेम है उन्हें वर्णसंकर समझा जाता है.

वर्णसंकर का शाब्दिक अर्थ है “मिश्रित वर्ण” या दो अलग -अलग जातियों/वर्णों के मिलन य दूसरे व्यक्ति से उत्पन्न संतान को कहते हैं। प्राचीन हिंदू ग्रंथों और रूढ़िवादी मान्यताओं में, वर्णसंकर संतान देश धर्म व समाज के लिए कुलघातक और हानिकारक होते हैं. इन्हें नैतिक रूप से कमजोर और चरित्रहीन माना गया है। एक दूसरे मे फूट डालने, पट्टी पढाने,अच्छे और वेदाग निष्कलंक और निष्पाप लोगों के खिलाफ उकसाने भडकाने और ब्रेनवाश करने में माहिर होते हैं. इतना ही नहीं एसे लोग अपने निज स्वार्थ साधने के लिए किसी भी अधिकारियों और राजे महाराजाओं को मूर्ख बनाने मे माहिर होते हैं.वर्णसंकर किस्म के लोगों में ईर्श्या जलनखोरी कामचोरी चुगलखोरी चापलूस खोरी झूठ छल कपट बेईमान विश्वासघात और भ्रष्टाचार किस्म के होते हैं. वर्णसंकर किस्म के लोग वामपंथी विचारधारा के होते हैं.सदैव अधर्म के मार्ग प्रशस्त करते और खुन्नस की भावनाओं के आवेश मे जीवन यापन करते है.इनका मुख्य उद्देश्य फूट डालो और राज करो की नीति अपनाया करते हैं.

इसके बारे में विस्तृत धारणाएँ निम्नलिखित हैं:

पारंपरिक मान्यता (गीता और स्मृतियाँ): भगवद्गीता (अध्याय 1) में अर्जुन ने कहा है कि वर्णसंकर के कारण कुल-परंपरा नष्ट होती है, जो अंततः मनुष्य समाज में अराजकता, अधर्म और कुल के पतन का कारण बनता है।

माना जाता है कि ऐसी संतानों में माता-पिता दोनों के सही संस्कार न होने के कारण उनमें अच्छे विचार उत्पन्न नहीं होते हैं, जिससे वे समाज के लिए हानिकारक हो सकते हैं।

यह भी धारणा है कि वर्णसंकर संतान द्वारा किया गया पिंडदान या तर्पण पूर्वजों से शुभ फल नहीं मिलता है, जिससे पितरों को भी अधिक कष्ट होते है। वर्णसंकर किस्म के लोगों के चरित्र विचारधारा स्वाभाव और कार्यप्रणाली वैदिक सनातन धर्म के नियमों के खिलाफ होते हैं.

परिभाषा: इसे अनुलोम (उच्च पुरुष + निम्न स्त्री) और प्रतिलोम (निम्न पुरुष + उच्च स्त्री) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

 

सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-

 

उपरोक्त समाचार सामान्य ज्ञान पर अधारित मानव धर्म का पालन करने की दृष्टी से जनहितार्थ प्रस्तुत है.दरअसल में यह धारणा प्राचीन सामाजिक और धार्मिक नियमों (वर्ण व्यवस्था) पर आधारित है। आधुनिक समय में वर्ण-आधारित विवाह और यह मान्यताएँ अब मान्य नहीं हैं, और वर्ण-संकर को अब एक सामाजिक कुरीति या पुराने विचार के रूप में देखा जाता है। अधिक जानकारी के लिए सनातन धर्म सांस्कृतिक विशेषज्ञों से उचित-अनुचित परामर्श जरुरी है.

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