धरती पर झूठ छल कपट और विश्वासघात करने वाल् का नाश तय
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
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श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि ईश्वर द्धारा निर्मित इस धरती पर झूठ छल कपट विश्वासघात और अन्याय करने वाले का नाश तय है
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि झूठ, छल-कपट और अधर्म का मार्ग अपनाने वालों का विनाश निश्चित है। गीता के अनुसार, कर्म का सिद्धांत अटल है और गलत कार्यों का परिणाम दुःख और पतन के रूप में सामने आता है।
गीता में मानवी हित के संदर्भ में प्रमुख शिक्षाएं दी गई हैं.
अधर्मी का विनाश (गीता 16.21): श्रीकृष्ण ने अध्याय 16 के श्लोक 21 में स्पष्ट कहा है कि नरक के तीन द्वार हैं—काम (lust), क्रोध (anger), और लोभ (greed)। ये तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं और व्यक्ति को अधोगति की ओर ले जाते हैं।
स्वयं को धोखा (गीता 3.6): जो लोग बाहर से साधु बनते हैं लेकिन मन में कपट रखते हैं, उन्हें कृष्ण ने ‘मिथ्याचारी’ (ढोंगी) कहा है, जो स्वयं को और दूसरों को धोखा देते हैं।
कर्मफल का नियम (गीता 10.36): यद्यपि कृष्ण कहते हैं कि वे छल करने वालों में ‘द्यूत’ (जुआ) हैं, लेकिन इसका अर्थ यह है कि गलत तरीके से जो सफलता मिलती है, उसका परिणाम भी सर्वनाश ही होता है। वे पाप कर्मों के परिणामों से किसी को नहीं बचाते।
दैनिक जीवन में असत्य: बार-बार स्वार्थ के लिए झूठ बोलना और दूसरों को हानि पहुँचाना, उस व्यक्ति को अमान्य और नष्ट कर देता है.
संक्षेप में: गीता के अनुसार, धर्म ही सुरक्षा का एकमात्र उपाय है। झूठ और छल से की गई प्रगति क्षणिक होती है, और उसका अंत पतन (नाश) के रूप में ही होता है।
वैदिक सनातन धर्म में मर्यादाओं (नैतिक और धार्मिक नियमों) का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति इन मर्यादाओं को जानबूझकर तोड़ता है, अपने धर्म का त्याग करता है, या अधर्म का मार्ग अपनाता है, उसका पतन और विनाश निश्चित है।
कर्म का सिद्धांत (Law of Karma): सनातन धर्म में ‘जैसे कर्म, वैसे फल’ का सिद्धांत सर्वोपरि है। मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है, जो विनाश की ओर ले जाता है।
अधर्म का विनाश: भगवद गीता और अन्य पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब उसका विनाश होता है [1]। मर्यादाओं के खिलाफ आचरण करना अधर्म की श्रेणी में आता है।
पतित होना तय है जो व्यक्ति धर्म की मर्यादा को तोड़ता है, वह समाज और ईश्वर की दृष्टि में ‘पतित’ (नीचे गिरा हुआ) हो जाता है, जिससे उसकी कीर्ति और जीवन का संतुलन समाप्त हो जाता है। यह
मर्यादा पुरुषोत्तम का संदेश है भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उन्होंने जीवन भर मर्यादाओं का पालन किया और संदेश दिया कि मर्यादाओं को लांघने का परिणाम दुर्योधन या रावण की तरह विनाश ही होता है।
संक्षेप में, सनातन धर्म का मानना है कि मर्यादाएँ ही जीवन को सुव्यवस्थित और सुरक्षित रखती हैं। उनका उल्लंघन करना विनाश का कारण बनता है।
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