✍️मोहन कारेमोरे : की खोजपूर्ण रिपोर्ट
बेंगलोर।भारतीय जनता पार्टी के लिए की हर तरफ़ से निराशाजनक वाली ख़बरों के बीच ये जान फूँकने वाली ख़बर से कम नहीं है.बीजेपी हार गई है लेकिन उसे इस हार से उबरना इतना मुश्किल नहीं होगा.लेकिन कांग्रेस यहाँ हार जाती तो 2024 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का मुक़ाबला पूरे दमखम के साथ शायद ही कर पाती है.कर्नाटक में कांग्रेस का बहुमत हासिल करना उस ट्रेंड का भी दोहराव है जिसमें 1985 के बाद यहाँ कोई भी सरकार दोबारा चुनकर नहीं आई है.
कर्नाटक में बीजेपी की हार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कितना नुकसान कर्नाटक में जीत के बाद क्या विपक्षी एकता की धुरी बन पाएगी कांग्रेस पार्टी और उनके सहयोगी दल।
कर्नाटक विधानसभा चुनाव
कर्नाटक राज्य से जुड़े हर सवाल का जवाब जानिए भारतीय जनता पार्टी के लिए 2008 का कर्नाटक विधानसभा चुनाव ऐतिहासिक था. यह पहली बार था, जब बीजेपी ने दक्षिण भारत के एक राज्य में अपनी सरकार बनाई थी.
समसामयिक विषयों का कार्यक्रम
बीजेपी बहुमत से ज़्यादा पीछे नहीं थी, लेकिन चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.तब कर्नाटक में बीजेपी की कमान बीएस येदियुरप्पा के पास थी और वही मुख्यमंत्री बने थे.मुख्यमंत्री बने रहने के लिए येदियुरप्पा को कुछ और विधायकों की ज़रूरत थी और यह काम बेल्लारी के रेड्डी भाइयों ने किया था.
रेड्डी भाइयों ने तब छह निर्दलीय विधायकों को बीजेपी के पाले में किया था और इसके साथ ही येदियुरप्पा के पास सामान्य बहुमत का प्रबंध हो गया था.बीजेपी के पाले में इन विधायकों को लाने की प्रक्रिया को ‘ऑपरेशन कमल’ नाम दिया गया था.
इसके बाद से ही ‘ऑपरेशन कमल’ काफ़ी चर्चित हुआ था. छह विधायकों में से पाँच को येदियुरप्पा कैबिनेट में मंत्री बनाया गया था.लेकिन रेड्डी भाइयों से मदद लेकर बीजेपी सरकार बनते ही कठघरे में आ गई थी, क्योंकि इन पर अवैध खनन से पैसा बनाने के गंभीर आरोप थे.इसी का नतीजा था कि येदियुरप्पा को तीन साल बाद ही कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. इससे पहले बीएस येदियुरप्पा 2007 में सात दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे.येदियुरप्पा जेडीएस के समर्थन वापस लेने के कारण विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाए थे और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
कर्नाटक चुनाव: बीजेपी के लिए क्यों ज़रूरी हैं
कर्नाटक में बीजेपी का परचम लहराने में येदियुरप्पा का सबसे बड़ा योगदान माना जाता है
येदियुरप्पा ही बीजेपी के खेवनहार
कर्नाटक में अब तक केवल तीन मुख्यमंत्री ही पाँच साल का कार्यकाल पूरा कर पाए हैं और ये तीनों मुख्यमंत्री कांग्रेस के रहे हैं.
ये तीनों मुख्यमंत्री हैं- एस निजलिंगप्पा (1962-1968), डी देवराजा उर्स (1972-1977) और सिद्धारमैया (2013-2018).अवैध खनन मामले में कर्नाटक लोकायुक्त की रिपोर्ट में येदियुरप्पा का भी नाम था. येदियुरप्पा इस्तीफ़ा नहीं देना चाहते थे, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आडवानी जी इसके लिए तैयार नहीं थे. 2012 में येदियुरप्पा बीजेपी से अलग हो गए.कर्नाटक में 2008 से पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर 30% से 36% के बीच रहा है जबकि इसी अवधि में प्रदेश में कांग्रेस का वोट शेयर 35 से 38 प्रतिशत के बीच रहा है.दूसरी तरफ़ जनता दल (सेक्युलर) का वोट शेयर 18 से 20 प्रतिशत के बीच रहा है. तीनों पार्टियों का वोट देखें तो जातीय गोलबंदी की अहम भूमिका रही है.कर्नाटक में बीजेपी का एक बड़ी पार्टी के रूप में उभार 1990 के दशक से शुरू होता है और इस उभार में दो कारकों को ख़ासा अहम माना जाता है.पहला कारण यह कि कर्नाटक के प्रभुत्वशाली समुदाय लिंगायत-वीरशैव का समर्थन बीजेपी को मिला है. प्रदेश में बीजेपी के दिग्गज नेता येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से हैं.येदियुरप्पा को बीजेपी ने कर्नाटक के सीएम पद से क्यों हटाया?
हिन्दुत्व की राजनीति और दूसरा कारण यह बताया जाता है कि बीजेपी कर्नाटक में हिन्दुत्व की राजनीति को मज़बूत करने में कामयाब रही है.इसके अलावा बीजेपी को एक और प्रभुत्व वाली जाति वोक्कालिगा से भी बिखरा हुआ समर्थन मिलता रहा है.
कर्नाटक के मध्य वर्ग के साथ अनुसूचित जाति और जनतातियों में भी बीजेपी एक हद तक पैठ बनाने में कामयाब रही है.लेकिन कर्नाटक में पिछले तीन विधानसभा चुनाव को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि बीजेपी जाति और मजहब के समीकरण में भी स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम रही है.कर्नाटक में बीजेपी ने 2008 और 2019 में दो बार सरकार बनाई, लेकिन किसी भी चुनाव में उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला.2008 में बीजेपी को सबसे ज़्यादा 110 सीटें मिली थीं और 2018 में 105 सीटें. 2018 में कांग्रेस को 78 और जनता दल सेक्युलर को 37 सीटें मिली थीं.दोनों बार बीजेपी प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी, लेकिन बहुमत से भी दूर रही.
2013 के विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी मुँह के बल गिर गई थी. तब बीएस येदियुरप्पा बीजेपी छोड़ अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे थे.बीजेपी 2013 में 40 सीटों पर सिमट कर रह गई थी.बीजेपी ने 2008 और 2019 में सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों या जिन निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में किया, वे अलग-अलग जातियों से थे.ये जातियाँ थीं- ब्राह्मण, लिंगायत-वीरशैव और इनकी उपजातियाँ, वोक्कालिंगा, कुरुबास, छोटी पिछड़ी जातियाँ और अनुसूचित जनजातियों का समावेश है.
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