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(भाग:118) हर संसारी मनुष्य माया मोह के आधीन विविध अनिष्ठ पाप ग्रह व्याधियों से ग्रसित है

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भाग:118) हर संसारी मनुष्य माया मोह के आधीन विविध अनिष्ठ पाप ग्रह व्याधियों से ग्रसित है

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट,संपर्क 9822550220,

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संसार का हर मनुष्य जाति का प्राणी मायाधीन अनेक दोषों से ग्रसित है । हर व्यक्ति जो ❛माया❜ के आधीन है उसमे चार दोष विधमान होते ही हैं। तो अब प्रश्न यह है कि क्यों ये दोष होते हैं? इसका कारण है माया। ❛माया❜ की वजह से, माया आधीन जीव अथवा मनुष्य अथवा स्त्री-पुरुष में चार दोष होते हैं। कुछ मनुष्य तो मायातीत (माया से मुक्त) भी होते हैं उनमें यह दोष नहीं होते। जैसे तुलसीदास, सूरदास, मीरा, वेद व्यास, आदि। जो मायातीत (माया से मुक्त) होते हैं, उनको महापुरुष, गुरु, रसिक, महात्मा व संत कहते है। जो माया के आधीन रहते है उनको मायाधीन मनुष्य कहते हैं।
मायाधीन मनुष्य (स्त्री-पुरुष) में चार दोष होतें हीं है किसी में कम तो किसी में ज्यादा । ये हैं
भ्रम कहते हैं किसी वस्तु को न पहचान करके उसे दूसरा रूप समझना। जैसे मैं आत्मा हूँ परन्तु अज्ञान (भ्रम) के कारण अपने को देह मानता हूँ। एक पीतल की चैन (chain) है, उसको एक व्यक्ति सोने की चैन समझता है। एक वस्तु को सही रूप में न पहचान कर गलत रूप में निर्णय करना यह भ्रम है। भागवत में कहा गया है, विपर्यय, मति विपर्यय इसको भ्रम कहते हैं। अर्थात बुद्धि नहीं समझ सके, किसी व्यक्ति-वस्तु का सही रूप और उसका उल्टा समझे यह भ्रम है।

प्रमाद किसे कहतें हैं?

मन की असावधानी, लापरवाही को प्रमाद कहते हैं। आप लोग समझदार व्यक्ति है। आपको गलती नहीं करना चाहिए। लेकिन कुछ मस्ती में कुछ लापरवाही में गलत बोल गए। फिर कहते हैं कि ‘वो बात मुँह से निकल गया, माफ़ कीजिये।’ ऐसा बोलते हैं हम लोग। निकल गया? अरे कोई बात स्वाभाविक(नेचुरल) निकलता है बिना सोचे-विचारे। हाँ! लापरवाही से ऐसा होता है। बड़े-बड़े बुद्धिमानों से होता है। तो मन की असावधानी, ये प्रमाद है

विप्रलिप्सा कहते हैं अपने दोष को छुपाना। हर चीज में दखल देने का अहंकार। कोई चीज़ छेड़ दो कहीं पर, उसका ज्ञान हो चाहे न हो बोल पड़ते है सभी लोग। जिस विषय में बड़ी-बड़ी उपाधि (डिग्री) लिए रहतें हैं, उसमें भी वो सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) नहीं है। कौन डॉक्टर गलती नहीं करता। मरीज को पचास प्रकार से जाँच किया, समझा, दवा किया, नहीं फायदा हुआ। तब वो कहता है दवा बदल दो। अरे तेरी खोपड़ी बदल पहले। तूने समझा नहीं की क्या बीमारी है और इलाज शुरू कर दिया। तो डॉक्टर कहता है कि ‘भई मैं कोई अन्तर्यामी हूँ, यह लक्षण इस बीमारी में भी होतें हैं, इस बीमारी में भी होतें हैं। तो मैंने समझा यह बीमारी है।’ हम लोग अपने दोष को छुपाते हैं, संसार के सब लोग छुपाते हैं। यह सबमें बीमारी है। तो यह विप्रलिप्सा जो है। वो हम सब लोगों को घेरे हुयें हैं।
कर्णापाटव कहते है, अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना। हमको एक विषय का भी अनुभव नहीं है। और अगर मान भी ले की एक विषय में कोई सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) भी है, तो सैंकड़ों विषय है और उन विषयो में वह व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं है। वो इंजिनियर नहीं है। इंजिनियर है तो डॉक्टर नहीं है। डॉक्टर है तो वकील नहीं है। अब ऐसा कौन आदमी है जो सब में परिपूर्ण हो ये सौ वर्ष की उम्र में। तो अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना यह कर्णापाटव है।
तो यह चारों दोष मायाधीन मनुष्य में होते ही हैं। किसी में कम किसी में ज्यादा होता है। लेकिन यह चारों दोष होते
माया के चक्कर में फंसा इंसान
इंसान को हीरे जैसा मनुष्य जन्म मिला है, लेकिन इंसान दुनिया के रंग रूप और माया को देखकर इतना मतवाला हो गया है कि वह यह भूल गया है कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और मुझे कहां जाना है।भ वह यह भी भूल गया है कि इन आंखों से नजर आने वाली हर चीज परिवर्तनशील है और काल के अधीन है। यह बात रविवार को सेक्टर 30 में स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन में दिल्ली से आए संत निरंकारी मंडल की एडवाइजरी बोर्ड के उपाध्यक्ष केआर चड्डा ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा है
उन्होंने कहा कि इस दुनिया के अन्य सभी जीवों की रचना इंसान की सेवा के लिए की गई है। दुनिया की हवा लगते ही वह अपने प्रभु को भूल गया।
उन्होंने कहा कि अब का इंसान अपने पड़ोसी से ज्यादा माया इकट्ठी करने के चक्कर में दिन रात एक कर देता है लेकिन वह यह भूल चुका है कि यह माया तो उस नागिन के समान है जो अपने ही बच्चों को सुख देने की बजाए उन्हें ही खा जाती है। इंसान छल कपट करके कितनी माया इकट्ठी करता है, लेकिन उस गलती का अहसास उसे तब होता है जब सुखफ देने की बजाए दुख देने का कारण बनती है अर्थात उसे संभालने के चक्कर में पड़ा रहता है और अपना जीवन व्यर्थ गंवा देता है।
मन ही माया है
मन से मुक्त हो जाना ही संन्यास है। इसके लिए पहाड़ों पर या गुफाओं में जाने की कोई जरूरत नहीं है। दुकान में, बाजार में, घर में.. हम जहां भी हों, वहीं मन से छूटा जा सकता है।
मन से मुक्त हो जाना ही संन्यास है। इसके लिए पहाड़ों पर या गुफाओं में जाने की कोई जरूरत नहीं है। दुकान में, बाजार में, घर में.. हम जहां भी हों, वहीं मन से छूटा जा सकता है।
संत लाख कहें कि संसार माया है, लेकिन सौ में से निन्यानबे संत तो खुद ही माया में उलझे रहते हैं। लोग भी अंधे नहीं हैं। वे सब समझते हैं। वे समझते हैं कि महाराज हमें समझा रहे हैं कि संसार माया है, वहीं वे स्वयं माया में ही उलझे हुए हैं। मेरा मानना है कि संसार माया नहीं, बल्कि सत्य है।
संसार माया नहीं, वास्तविक है। परमात्मा से वास्तविक संसार ही पैदा हो सकता है। अगर ब्रह्मा सत्य है, तो जगत मिथ्या कैसे हो सकता है? ब्रह्मा का ही अवतरण है जगत। उसी ने तो रूप धरा, उसी ने तो रंग लिया। वही तो निराकार आकार में उतरा। उसने देह धरी। अगर परमात्मा ही असत्य हो, तभी तो संसार असत्य हो सकता है।
लेकिन न तो परमात्मा असत्य है, न ही संसार। दोनों सत्य के दो पहलू हैं- एक दृश्य एक अदृश्य। माया फिर क्या है? मन माया है। मैं संसार को माया नहीं कहता, मन को कहता हूं। मन है एक झूठ, क्योंकि मन वासनाओं, कामनाओं, कल्पनाओं और स्मृतियों का जाल है।
संसार माया है, यह भ्रामक बात समझकर लोग संसार छोड़कर भागने लगे। आखिर संसार को छोड़कर कहां जाओगे? जहां जाओगे, वहां संसार ही तो है। एक आदमी संसार से भाग गया। वह क्रोधी था। उसने किसी साधु से सत्संग किया, तो साधु ने कहा- संसार माया है। इसमें रहोगे, तो क्रोध, लोभ, मोह, काम और कुत्सा सब घेरेंगे। इस संसार को छोड़ दो।

उस आदमी को बात समझ में आ गई। उसने कहा- ठीक है। वह जंगल में जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। पेड़ पर बैठे एक कौवे ने उसके ऊपर बीठ कर दी। कौवा तो ठहरा पक्षी, उसमें इतना ज्ञान कहां। कौवा साधु-संत और सामान्य लोगों में फर्क कैसे कर सकता है। उस आदमी ने क्रोध से आगबबूला होकर हाथों में डंडा उठा लिया। अब कौवा उड़ता रहा और वह डंडा लेकर उसके नीचे-नीचे दौड़ता रहा। कभी वह कौवे की ओर डंडा फेंकता तो कभी उसे पत्थर मारता।

संसार से भागोगे, तो यही होगा। आखिर उसने खुद से ही कहा – यह जंगल भी किसी काम का नहीं। यहां क्रोध से मुक्ति नहीं मिलेगी। यहां भी माया है। वह जाकर नदी किनारे बैठ गया, जहां आसपास कोई पेड़-पौधा नहीं था। वह अपने क्रोध के जाल से इतना उदास और हताश हो गया था कि उसे जीवन अकारथ नजर आने लगा। उसकी नजरों में जब संसार ही अकारथ है और माया है, तो जीने का अर्थ ही क्या? उसने लकडि़यां इकट्ठी कीं और अपने लिए चिता बनाने लगा। उसने सोचा इसमें आग लगाकर खुद बैठ जाऊंगा। आग लगाने को ही था कि आसपास के गांव के लोग आ गए। उन्होंने कहा कि आप यह सब कहीं और जाकर करें, पुलिस हमें बेवजह तंग करेगी। आप जलेंगे, तो दुर्र्गध भी तो हमें ही आएगी। उस आदमी के क्रोध की सीमा न रही।
संसार से भागोगे, तो भागोगे कहां? यहां जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल। संसार से भाग नहीं सकते हो। संसार माया है, इस धारणा ने लोगों को गलत संन्यास का रूप दे दिया है। संसार तो परमात्मा का प्रसाद है। संसार के फूल उसी के सौंदर्य की कथा कहते हैं। ये पक्षी उसी की प्रीति के गीत गाते हैं। ये तारे उसी की आंखों की जगमगाहट हैं। यह सारा अस्तित्व उससे भरपूर है, लबालब है।

लेकिन फिर भी मैं जानता हूं कि संसार में अगर कोई चीज माया है, तो वह एक ही है- वह है मन। मन ही भ्रमित करता है। इसलिए संसार से भागना नहीं, बल्कि मन से छूट जाना संन्यास है। मन से मुक्त हो जाना संन्यास है। इसके लिए पहाड़ों पर, गुफाओं में जाने की कोई जरूरत नहीं। दुकान में, बाजार में, घर में- तुम जहां हो, वहीं मन से छूटा जा सकता है। मन से छूटने की सीधी सी विधि है : अगर मन अतीत में जाता है, तो उसे जाने दो। लेकिन जब भी वह अतीत में जाए, उसे वापस लौटा लाओ। कहो कि भैया, अतीत में नहीं जाते। जो हो गया, सो हो गया। पीछे नहीं लौटते। इसी तरह जब मन भविष्य में जाने लगे, तब भी कहना, भैया इधर भी नहीं। अभी भविष्य आया ही नहीं, तो वहां जाकर क्या करोगे। यहीं, अभी और इस वक्त में रहो। यह क्षण तुम्हारा सर्वस्व हो। ऐसा होते ही, सारी माया मिट जाएगी। मन के सारे जंजाल खत्म हो जाएंगे।

ऐसे में अंधकार चला जाता है और रोशनी हो जाती है। क्योंकि अतीत और भविष्य दोनों ही अभाव हैं, उनका अस्तित्व नहीं है। वे अंधकार की तरह हैं, जबकि वर्तमान ज्योतिर्मय है।

जिन ऋषियों ने कहा है कि हे प्रभु, हमें तमस से ज्योति की ओर ले चलो, वे उस अंधेरे की बात नहीं कर रहे हैं, जो अमावस की रात को घेर लेता है। वे उस अंधेरे की बात कर रहे हैं, जो तुम्हारे अतीत और भविष्य में डोलने के कारण तुम्हारे भीतर घिरा है। और वे किस ज्योतिर्मय लोक की बात कर रहे हैं? वर्तमान में ठहर जाओ, ध्यान में रुक जाओ, समाधि का दीया जल जाए, तो अभी रोशनी हो जाए। जब तुम्हारे भीतर रोशनी हो जाए, तो तुम जो देखोगे, वही सत्य है।

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