भाग:130) अपनी माता के गर्भावस्था में हीं आत्म ब्रह्म और अनात्म ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान हो गया था ऋषि अष्टावक्र को
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री :सह-संपादक की रिपोर्ट
अष्टावक्र ने गर्भावस्था में बोला और अपने पिता को वैदिक पुस्तकों से प्राप्त सीमित ज्ञान के बारे में बताया, इन पुस्तकों के अलावा जानने के लिए और भी बहुत कुछ है। पिता ने क्रोधित होकर उन्हें आठ विकृतियों के साथ जन्म लेने का श्राप की वजह से उनका नाम ‘अष्टावक्र’ पड़ा था।
मैं उनको वापस बुला लेता हूं। सभी हारे हुए ब्राह्मण वापस आ गए, उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे। इसके बाद राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु बना लिया और उनके आत्मज्ञान प्राप्त किया।
अवलोकन। अष्टावक्र गीता अष्टावक्र और जनक के बीच स्व/आत्मा की प्रकृति, वास्तविकता और बंधन पर एक संवाद है। यह अद्वैतवादी दर्शन का एक मौलिक संस्करण प्रस्तुत करता है। गीता बाहरी जगत की पूर्ण असत्यता और अस्तित्व की पूर्ण एकता पर जोर देती है।
अथ विंशतिकं प्रकरणम् २०.
क भूतानि व देहो वा केन्द्रियाणि क वा मनः ।
क शून्यं क च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने॥१॥
अन्वय:- निरञ्जने मत्स्वरूपे भूतानि क्व वा देहः क्व, इन्द्रियाणि क वा मनः क्व, शून्यम् क्व, नैराश्यम् क्व च ॥ १ ॥
पूर्व वर्णन की हुई आत्मस्थिति जिस की हो जाय उस जीवन्मुक्त की दशा का इस प्रकारण में चौदह श्लोकोंकर के वर्णन करते हैं कि, हे गुरो! मैं संपूर्ण उपाधिरहित हूं, इस कारण मेरे विषें पंचमहाभूत तथा देह तथा इंद्रियें तथा मन नहीं है, क्योंकि में चेतनस्वरूपहूंतिसी प्रकार शून्यपना और निराशपना भी नहीं है ॥१॥
क शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः ।
क तृप्तिः क वितृष्णात्वं गतद्वन्द्रस्य मे सदा ॥२॥
अन्वय:- सदा गतद्वन्द्वस्य मे शास्त्रम् क्व, आत्मविज्ञानम् क, वा निर्विषयम् मनः क्व, तृप्तिः क्व, वितृष्णात्वम् व ॥ २ ॥
शास्त्राभ्यास करना, आत्मज्ञान का विचार करना, मन को जीतना, मन में तृप्ति रखना और तृष्णा को दूर करना यह कोई भी मुझ में नहीं है, क्योंकि मैं इंदरहित हूं ॥२॥
क विद्याक्कच वांविद्या काहं वेदं मम कवा।
कबन्धः क्व च वा मोक्षःस्वरूपस्य वरूपिता ॥३॥
अन्वय:- (मयि ) विद्या व वा विद्या च क्व, अहम् क्व इदम् क्क वा मम क्व, बन्धः क्व वा मोक्षः च क्व, स्वरूपस्य रूपिता व ॥३॥
अहंकाररहित जो मैं हूं तिस मेरे विषें विद्या अविद्या मैं हूं, मेरा है, यह है इत्यादि आभिमान के धर्म नहीं है तथा वस्तु का ज्ञान मेरे विषें नहीं है और बंध मोक्ष मेरे नहीं होते हैं, मेरा रूप भी नहीं है, क्योंकि मै चैतन्य मात्र हूं॥३॥
क प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि कवा ।
क तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥४॥
अन्वय:- सर्वदा निर्विशेषस्य ( मे ) प्रारब्धानि कर्माणि क्व, वा जीवन्मुक्तिः अपि क्व, तद्विदेहकैवल्यम् क्व ॥ ४॥
सर्वदा निर्विशेष स्वरूप जो मैं तिस मेरे प्रारब्धकर्म नहीं होता है और जीवन्मुक्ति अवस्था तथा विदेहमुक्तिभी नहीं है क्योंकि मैं सर्वधर्मरहित हूं॥४॥
व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्किंयं ग स्फुरणं व वा।
वापरोक्षं फलं वाक निःस्वभावस्य मे सदा ॥५॥
अन्वय:- सदा निःस्वभावस्य मे कर्ता व वा भोक्ता व वा निष्क्रियम् स्फुरणम् क्व, अपरोक्षम् व वा फलम् क्व ॥ ५ ॥
मैं सदा स्वभावरहित हूं, इस कारण मेरे विषें कर्तापना नहीं है, भोक्तापना नहीं है तथा विषयाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप फल नहीं है ॥५॥
कलोकः क्व मुमुक्षुर्वा क योगी ज्ञानवान् कवा।
कबद्धःकच वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥६॥
अन्वय:- अहमद्रये स्वस्वरूपे लोकः क्व वा मुमुक्षुः क्व, योगी क, ज्ञानवान् क्व, बद्धः क्व वा मुक्तः च क्व ॥ ६ ॥
आत्मरूप अद्वैत स्वस्वरूप के होनेपर न लोक है, न मोक्ष की इच्छा करनेवाला हूं, न योगी हूं, न ज्ञानी हूं, नबंधन है, न मुक्ति है ॥६॥
व सृष्टिः क्व च संहारःक्क साध्यं क च साधनम् ।
व साधकः क सिद्धिा स्वस्वरूपेऽहमद्रये ॥ ७॥
अन्वय:- अहम्-अद्वये स्वस्वरूपे सृष्टिः क, संहारः च व साध्यम् क्व, साधनम् च क्व, साधकः क्व वा सिद्धिः क्व ॥ ७॥
आत्मरूप अद्वैत स्वस्वरूप के होनेपर न सृष्टि है, न कार्य है, न साधन है और न सिद्धि है, क्योंकि मैं सवेंधर्म रहित हूँ॥७॥
क प्रमाता प्रमाण वाक प्रमेयंक च प्रमा।
क किञ्चित्क न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८॥
अन्वय:- सर्वदा विमलस्य मे प्रमाणं वा प्रमाता क्व प्रमेयं क प्रमा च क्व किञ्चित् क्व न किञ्चित् क्व ॥ ८॥
आत्मा उपाधिरहित है तिस आत्मा के विषें प्रमाता, प्रमाण तथा प्रमेय ये तीनों नहीं है और कुछ है अथवा कुछ नहीं है, ऐसी कल्पना भी नहीं है ॥ ८॥
क विक्षेपः क चैकाम्यं क निर्बोधः क मूढता।
क हषः क विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥९॥
अन्वय:- सर्वदा निष्क्रियस्य मे विक्षेपः क्व ऐकाम्यं चक्क निर्बोधः क्व मूहता क्व हर्षः क्व विषादः क्व ॥ ९ ॥
मैं सदा निर्विकार आत्मस्वरूप हूं इस कारण मेरे विषें विक्षेप तथा एकाग्रता, ज्ञानीपना, मूढता, हर्ष और विषाद ये विकार नहीं है ॥ ९॥
कचैष व्यवहारो वा क च सा परमार्थता ।
व सुखं क च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥१०॥
अन्वय:- सदा निर्विमर्शस्य मे एषः व्यवहारः क्व वा सा परमार्थता च क्व, सुखं च क्व वा दुःखं च क्व ॥ १० ॥
मैं सदा संकल्पविकल्परहित आत्मस्वरूप हूं, इस कारण मेरे विषें व्यवहारावस्था नहीं है, परमार्थावस्था नहीं है और सुख नहीं है तथा दुःख भी नहीं है ॥१०॥
क्वमायाक च संसारःव प्रीतिर्विरतिः कवा।
क जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥११॥
अन्वय:- सर्वदा विमलस्य मे माया व संसारः च क्व प्रीतिः कवा विरतिः क जीवः क्व तत् ब्रह्म च क्व ॥ ११ ॥
मैं सदा शुद्ध उपाधिरहित आत्मस्वरूप हूं, इस कारण मेरे विषें माया नहीं है, संसार नहीं है, प्रीति नहीं है, वैराग्य नहीं है, जीवभाव नहीं है तथा ब्रह्मभावभी नहीं है ॥ ११॥
क प्रवृत्तिनिवृत्तिा क मुक्तिः क च बन्धनम् ।
कूटस्थनिविभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२॥
अन्वय:- कूटस्थनिर्विभागस्य सदा स्वस्थस्य मम प्रवृत्तिः क. वा निवृत्तिः क, मुक्तिः क, बन्धनम् च क्व ॥ १२ ॥
आत्मस्वरूप जो मैं हूं तिस मेरे विषें प्रवृत्ति नहीं है, मुक्ति नहीं है तथा बंधन भी नहीं है ॥ १२॥
कोपदेशःव वा शास्त्रं क शिष्यः कं च वा गुरुः।
क चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥
अन्वय:- निरुपाधेः शिवस्य मे उपदेशः क्व वा शास्त्रं व शिष्यः क्व वा गुरुः क्व वा पुरुषार्थः क्व च अस्ति ॥ १३ ॥
उपाधिशून्य नित्यानंदस्वरूप जो मैं हूं तिस मेरे अर्थ उपदेश नहीं है, शास्त्र नहीं है, शिष्य नहीं है, गुरु नहीं है तथा परम पुरुषार्थ जो मोक्ष सो भी नहीं है ॥१३॥
क चास्ति क च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क च द्वयम् । बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४॥
अन्वय:- ( मम ) अस्ति च क, वा न अस्ति च क्व, एक च के अस्ति, द्वयं च क्व, इह बहुना उक्तेन किम्, मम किश्चित् न उत्तिष्ठते ॥ १४ ॥
मैं आत्मस्वरूप हूं इस कारण मेरे विषें अस्तिपना नहीं है, नास्तिपना नहीं है, एकपना नहीं है, द्वैतपना नहीं है इस प्रकार कल्पित पदार्थो की वार्ता करोडों वर्षापर्यंत कहूं तब भी हार नहीं मिल सकता, इस कारण से कहता हूं कि, मेरे विषें किसी कल्पना का भी आभास नहीं होता है, क्योंकि मैं एकरस चेतन स्वरूप हूं ॥१४॥
इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां भाषाटीकासहितं विशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥२०॥
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अथैकविंशतिकं प्रकरणम् २१ ।
विंशतिश्चोपदेशे स्युःश्लोकाश्च पञ्चविंशतिः।
सत्यात्मानुभवोल्ला से उपदेशे चतुर्दश॥१॥
अन्वय:- उपदेशे विंशतिः च स्युः । सत्यात्मानुभवोल्ला से च पञ्चविंशतिः । उपदेशे चतुर्दश ॥ १॥
अब ग्रंथकर्ताने इस प्रकरण में ग्रंथ की श्लोकसंख्या और विषय दिखाये हैं। गुरूपदेशनामक प्रथम प्रकरण में २० श्लोक हैं शिष्यानुभवनामक द्वितीय प्रकरणमें २५ श्लोक हैं आक्षेपोपदेशनामकं तृतीय प्रकरण में १४ श्लोक हैं ॥१॥
षडल्ला से लये चैवोपदेशे च चतुश्चतुः । पञ्चकं स्यादनुभवे बन्धमोक्षे चतुष्ककम् ॥२॥
अन्वय:- (चतुर्थे ) उल्ला से षट् । लये च उपदेशे च एव चतुश्चतुः । अनुभवे पञ्चकम् । बन्धमोक्षे चतुष्ककं स्यात् ॥ २ ॥
शिष्यानुभवनामक चतुर्थ प्रकरण में ६ श्लोक हैं। लयनामक पंचम प्रकरण में ४ श्लोक हैं। गुरूपदेशनामक पष्ठ प्रकरणमें भी ४ श्लोक हैं। शिष्यानुभवनामक सप्तम प्रकरण में ५ श्लोक हैं। बंधमोक्षनामक अष्टम प्रकरणमें ४ श्लोक हैं ॥२॥
निर्वेदोपशमे ज्ञाने एवमेवाष्टकं भवेत् ।
यथासुखसप्तकंच शांतीस्याटे. दसंमितम् ॥३॥
अन्वय:- निर्वेदोपशमे एवं एव ज्ञाने अष्टकम् भवेत् । यथा सुखे च सप्तकम् । शान्तौ च वेदसंमितं स्यात् ॥ ३ ॥
निर्वेदनामक नवम प्रकरण में ८ श्लोक हैं । उपशमनामक दशम प्रकरण में ८ श्लोक है । ज्ञानाष्टकनामक एकादश प्रकरण में ८ श्लोक हैं । एवमेवाष्टक नामक द्वादश प्रकरण में ८ श्लोक हैं । यथासुखनामक त्रयोदश प्रकरण में ७ श्लोक हैं। शांतिचतुष्कनामक चतुर्दश प्रकरण में ४ श्लोक हैं ॥३॥
तत्त्वोपदेशे विशच्च दश ज्ञानोपदेश के ।
तत्त्वस्वरूपे विंशच शमे च शतकं भवेत्॥४॥
अन्वय:- तत्त्वोपदेशे विंशत् । ज्ञानोपदेश के च दश । तत्त्वस्वरूप के च विंशत् । शमे च शतकम् भवेत् ॥ ४॥
तत्वोपदेशनामक पंचदशप्रकरण में २० श्लोक हैं। ज्ञानोपदेशनामक षोडश प्रकरण में १० श्लोक हैं। तत्वस्वरूपनामक सप्तदश प्रकरण में २० श्लोक हैं। शमनामक अष्टादशप्रकरण में १०० श्लोक हैं ॥४॥
अष्टकं चात्मविश्रान्तौ जीवन्मुक्ती चतुर्दश ।
षट् संख्याक्रमविज्ञाने ग्रन्थेकात्म्यं ततः परम् ॥५॥
विशकमितैः खण्डैः श्लोकैरात्मानिमध्यखैः।
अवधूतानुभूतेश्च श्लोकाः संख्याक्रमा अमी॥६॥
अन्वय:- आत्मविश्रान्तौ च अष्टकम् । जीवन्मुक्ती चतुर्दश । संख्याः क्रमविज्ञाने पट् । ततः परम् आत्माग्निमध्यखैः श्लोकः विंशत्येकमितैः खण्डैः ग्रन्थैकात्म्यम् ( भवति ) । अमी श्लोकाः अवधूतानुभूतेः संख्याक्रमाः ( कथिताः ) ॥ ५॥ ६ ॥
आत्मविश्रान्तिनामक उन्नीसवें प्रकरण में ८ श्लोक हैं। जीवन्मुक्तिनामक विंशतिक प्रकरण में १४ श्लोक हैं। और संख्याकमविज्ञाननामक एकविंशतिक प्रकरण में ६ श्लोक हैं और संपूर्णग्रंथ में इक्कीस प्रकरण और ३०३ श्लोक हैं। इस प्रकार अवधूत का अनुभवरूप जो ᳚अष्टावक्रगीता” है उस के श्लोकों की संख्या का क्रम कहा। यद्यपि अंत के श्लोककर के सहित ३०३ श्लोक हैं परंतु दशमपुरुष की समान यह श्लोक अपने को ग्रहणकर अन्य श्लोकों की गणना करता है॥५॥६॥
इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां सान्वयभाषाटीकया सहितं संख्याक्रमव्याख्यानं नामैकविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥२१॥
इति सान्वयभाषाटीकासमेता अष्टावक्रगीता समाप्ता
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