(भाग:147) यथार्थ में सत्य की शरण और परमार्थ कर्म का मार्ग से ही मनुष्य मात्र की मुक्ति संभव:है?
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट,9822550220
अष्टावक्र का शास्त्रार्थ
महाभारत वनपर्व के तीर्थयात्रापर्व के अंतर्गत अध्याय 134 में अष्टावक्र का शास्त्रार्थ का वर्णन हुआ है। यहाँ वैशम्पायन जी ने जनमेजय से अष्टावक्र का शास्त्रार्थ के वर्णन की कथा कही है।[1]
जनक की सभा में बन्दी उपस्थित
अष्टावक्र बोले- भयंकर सेनाओं से युक्त महाराज जनक! इस सभागार में सग ओर से अप्रतिम प्रभावशाली राजा आकर एकत्र हुए है, परंतु इन सबके बीच में वादियों मे प्रधान बन्दी को नहीं पहचान पाता हूँ। यदि पहचान लूं तो अगाध जल में हंस की भाँति उन्हें अवश्य पकड़ लूंगा। अपने को अतिवादी मानने वाले बन्दी! तुमने पराजित हुए पण्डितों को पानी में डुबवा देने का नियम कर रखा है, कितु आज मेरे सामने तुम्हारी बोली बन्द हो जायेगी। जैसे प्रलयकाल के प्रज्वलित अग्नि के सामने नदियों का प्रवाह सूख जाता है; उसी प्रकार मेरे सामने आने पर तुम भी सूख जाओगे- तुम्हारी वादशक्ति नष्ट हो जायेगी। बन्दी! आज मेरे सामने स्थिर होकर बैठो।
बन्दी ने कहा- मुझे सोता हुआ सिंह समझकर न जगाओं (न छेड़ो), अपने जबड़ो को चाटता हुआ विषैला सर्प मानो। तुमने पैरों से ठोकर मारकर मेरे मस्तक को कुचल दिया है। अब जब तक तुम डंस लिये नहीं जाते तब तक तुम्हें छुटकारा नहीं मिल सकता, इस बात को अच्छी तरह समझ लो। जो देहधारी अत्यन्त दूर्बल होकर अहंकावश अपने हाथ से पर्वत पर चोट करता है, उसी के हाथ और नख विदीर्ण हो जाते है, उस चोट से पर्वत में घाव होता नहीं देखा जाता है।
अष्टावक्र बोले- जैसे सब पर्वत मैनाक से छोटे है, सारे बछड़े बैलो से लघुतर है, उसी प्रकार भूमण्डल के समसत राजा मिथिला नरेश महाराज जनक की अपेक्षा निम्न श्रेणी में है। राजन! जैसे देवताओं मे महेन्द्र श्रेष्ट है और नदियों मे गंगा श्रेष्ट है, उसी प्रकार सब राजाओं मे एकमात्र आप ही उत्तम है। अब बन्दी को मेरे निकट बुलवाइये।
लोमश जी कहते है- युधिष्ठिर! (बन्दी के सामने आ जाने पर) राजसभा में गर्जते हुए अष्टावक्र ने बन्दी से कुपित होकर इस प्रकार कहा- ‘मेरी पूछी हुई बात का उत्तर तुम दो और तुम्हारी बात का उत्तर मै देता हूँ।
तब बन्दी ने कहा- अष्टावक्र! एक ही अग्नि अनेक प्रकार से प्रकाशित होती है, एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है। शत्रुओ का नाश करने वाला देवराज इन्द्र एक ही वीर है तथा पितरों का स्वामी यमराज भी एक ही है।
अष्टावक्र-बन्दी संवाद
अष्टावक्र बोले- जो दो मित्रों की भाँति सदा साथ विचरते है, वे इन्द्र और अग्नि दो देवता है। परस्पर मित्रभाव रखने वाले देवर्षि नारद और पर्वत भी दो ही है। अश्विनीकुमारों की संख्या दो ही है, रथ के पहिये भी दो ही होते है, तथा विधाता ने (एक दूसरे के जीवनसंगी) पति और पत्नी भी दो ही बनाये हैं।
बन्दी ने कहा- यह सम्पूर्ण प्रजा कर्मवश देवता, मनुष्य और तिर्यक रुप तीन प्रकार का जन्म धारण करती है, ऋक, साम, और जयु- ये तीन वेद ही परस्पर संयुक्त हो बाजपेय आदि यज्ञ कर्मो का निवार्ह करते हैं। अध्वर्युलोक भी प्रात: सवन, मध्यांह सवन ओर सांयसवन वेद से तीन सवनों (यज्ञों का ही अनुष्ठान करते है (कर्मानुसार प्राप्त होने वाले भोगों के बिए स्वर्ग, मृत्यु और नरक ये लोक भी तीन ही बतायें ये है और मुनियों ने सूर्य देवता, चन्द्र और अग्नि रुप तीन ही प्रकार की ज्योतियां है।[1]
अष्टावक्र बोले- ब्राह्मणों के लिये आश्रम चार है। वर्ण भी चार है, जो इस यज्ञ का भर वहन करते हैं। मुख्य दिशाएं भी चार ही है। वर्ण भी चार ही हैं तथा गो अथार्थ वाणी भी सदा चार ही चरणों से युक्त बतयी जाती हैं।
बन्दी बोले- यज्ञ की अग्नि गार्हपत्य, दक्षिणाअग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसध्य के भद से पांच प्रकार की कही गयी हैं। पंक्ति छन्द भी पांच पादों से ही बनता है, यज्ञ भी पांच ही है- देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्य यज्ञ। इस प्रकार इन्दियों की संख्या भी पांच ही है। वेद में पांच वेणी वाले[2]तथा लोक में पांच नदियों से विशिष्ट पुण्यमय पंचनन्द प्रदेया विख्यात है। अष्टावक्र बोले- कुछ विद्वानो का मत है कि अग्नि की स्थापना के समय दक्षिण में छ: गौ ही देनी चाहिये। ये छ: ऋतुएं ही संवत्सररुप कालचक्र की सिद्धि करती हैं। मन सहित ज्ञानेन्द्रयां भी छ: ही है। कृतिकाओं की संख्या छ: ही है तथा सम्पूर्ण वेदों में साद्यस्क नामक यज्ञ भी छ: ही देखे गये है।
बन्दी ने कहा- ग्राम्य पशु सात है ( जिनके नाम इस प्रकार है) – गाय, भैस, बकरी, भेड, घोड़ा, कुत्ता और गदहा। जंगली पशु भी सात है[3]। गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप और जगती- ये सात ही छन्द एक एक यज्ञ का निर्वाह करते हैं। सर्प्तषि नाम से प्रसिद्ध ऋषियों की संख्या भी सात ही है ( यथा- मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु अगिरा और वसिष्ठ), पूजन के संक्षिप्त उपचार भी सात है ( यथा- गन्ध, पुश्प, धूप, दौप, नैवेध, आचमन और ताम्बुल) तथा वीणा के भी सात ही तार विख्यात है।
अष्टावक्र बोले- तराजू में लगी हुई सन की डोरीयां भी आठ ही होती हैं, जो सैकड़ो का मान (तौल) करतती हैं। सिंह को भी मार गिराने वाले शरभ के आठ ही पैर होते हैं। देवताओं में वसुधा की संख्या भी आठ ही सुनी गयी है और सम्पूर्ण यज्ञों में आठ कोण के ही यूप का निर्माण किया जाता है।
बन्दी ने कहा- पितृयज्ञ में समिधा देकर अग्नि को उद्दीप्त करने के लिये जो मन्त्र पढ़े जाते है, उन्हें सामिधेनी ऋचा कहते है, उनकी संख्सा नौ ही बतायी गयी है, इसमें प्रकृति, पुरुष, महत्तत्व, अहंकार तथा पंचतन्मात्रा- इन नौ पदार्थों का संयोग कारण है, ऐसा विज्ञ पुरुषों का कथन है। बृहती-छन्द के प्रत्येक चरण में नौ अक्षर बताये गये है और एक से लेकर नौ अंको का योग सदा गणना के उपयोग में आता है।[4][5]
अष्टावक्र ने कहा- पुरुष के लिये संसार में दस दिशायें बतायी गयी है। दस सौ मिलकर ही पूरा ऐ सहस्त्र कहा जाता है, गर्भवती स्त्रियां दस मास तक ही गर्भ धारण करती है, निन्दक भी दस होते है, शरीर की अवस्थाएं भी दस है तथा पूजनीय पुरुष भी दस ही बताये गये है।
बन्दी ने कहा- प्राणधारी पशुओ ( जीवों ) के लिए ग्यारह विषय है। उन्हें प्रकाशित करने वाली इन्द्रियां भी ग्यारह ही है, यज्ञ, याग आदि में यूप भी ग्यारह ही होते है, प्राणियों के विकार भी ग्यारह है, तथा स्वार्गीय देवताओं में जो रुद्र कहलाते है; उनकी संख्या भी ग्यारह ही है।
अष्टावक्र बोले- एक संवत्सर में महीने बताये गये है, जगती छन्द का प्रत्येक पाद बारह अक्षरों का होता है, प्राकृत यज्ञ बारह दिनों का माना गया है, ज्ञानी पुरुष यहाँ बारह आदित्यों का वर्णन करते हैं।
बन्दी बोले- त्रयोदशी तिथि उत्तम बतायी यी है तथा यह पृथ्वी तेरह द्वीपों से युक्त है। 1 काम क्रोघ, लोभ-मोहि, मद-मत्सर, हर्ष-शोक, राग-द्वेष और अहंकार- ये ग्यारह विकार होते हैं। 2 ’मृगव्याध, सर्प, तहायशस्वी, र्निऋति, अजैकपाद, अर्हिबुध्न्य, शत्रु-संतापन पिना की, दहन, ईश्वर, परमकान्िमान कपाली, स्थाणु और भगवान भव- ये ग्यारह रुद्र माने गये है। 3- ‘धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान, पूषा, दसवें सविता, ग्यारह वे त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गये है। ‘
लोमश जी कहते है- इतना कहकर बन्दी चुप हो गया। तब शेष आधे श्लोक की पुष्टि अष्टावक्र ने इस प्रकार की।
अष्टावक्र द्वारा श्लोक की पुष्टि
अष्टावक्र बोले- केशी नामक दानव ने भगवान विष्णु के साथ तेरह दिनों तक युद्ध किया था। वेद में जो अतिशब्द विशिष्ट छन्द बताये गये है, उनका एक एक पाद तेरह आदि अक्षरों से सम्पन्न होता है (अर्थात अतिजगती छन्द का एक पाद तेरह अक्षरों का, अतिशकरी का एक पाद पन्द्रह अक्षरों का, अत्यष्टिका प्रत्येक पाद सत्रह अक्षरों का तथा अतिभूति का हर एक पाद उन्नीस अक्षरों का होता है )।
लोमश जी कहते है- इतना सुनते ही सूतपुत्र बन्दी चुप हो गया और मूंह नीचा किये किसी भारी सोच विचार मे पड़ गया। इधर अष्टावक्र बोलते ही रहें, यह सब देख दर्शको और श्रोताओं में महान कोलाहल मच गया। महाराज जनक के उस समृद्धिशाली यज्ञ में जब कि चारों ओर कोलाहल व्याप्त हो रहा था, सब ब्राह्मण हाथ जोड़े हुए श्रद्धापूर्वक अष्टावक्र के समीप आये और उनका आदर सत्कारपूर्वक पूजन किया।
तत्पश्चात अष्टावक्र ने कहा- महाराज! इसी बन्दी ने पहले बहुत से शास्त्रज्ञ (विद्वान) ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ मे पराजित करके पानी में डुबवाया है, अत: इसकी भी वही गति होनी चाहिये, जो इसके द्वारा दूसरो की हुई। इसलिये इसे पकड़कर शीघ्र पानी में डुबवा दीजिये। बन्दी बोला- महाराज जनक! मैं राजा वरुण का पुत्र हुं। मेरे पिता के यहाँ भी आपके इस यज्ञ के समान ही बारह वर्षों में पूर्ण होने वाला यज्ञ हो रहा था। उस यज्ञ के अनुष्ठान के लिये ही ( जल में डुबाने के बहाने ) कुछ चुने हुए श्रेष्ट ब्राह्मणों को मैने वरुणलोक में भेज दिया था।
वे सब-के-सब वरुण का यज्ञ देखने के लिये गये है और अब पुन: लौटकर आ रहे है। मैं पूजनीय ब्राह्मण अष्टावक्र जी का सत्कार करता हूं; जिनके कारण मेरे अपने पिताजी से मिलना होगा।
अष्टावक्र बोले- राजन! बन्दी ने अपनी जिस वाणी (प्रवचनपटुता अथवा मेघ बुद्धिबल) से विद्वान ब्राह्मणों को भी परास्त किया और समुद्र के जल मे डुबाया है, उसी उस वाकशक्ति को मैने अपनी बुद्धि से किस प्रकार उखाड़ फेंका है, यह सब इस सभा में बैठे हुए विद्वान पुरुष मेरी बातें सूनकर ही जान गये होंगे। अग्नि स्वाभाव से ही दहन करने वाला है तो भी वह ज्ञेय विषय तत्काल जानने मे समर्थ है। इस कारण परीक्षा के समय जो सदाचारी और सत्यवादी होते है, उनके घरों को ( शरीरों को ) छोड़ देता है, जलता नहीं। वैसे ही संत लोग भी विनम्रभाव से बोलने वाले बालक पुत्रों के वचनों मे से जो सत्य और हितकर बात होती है, उसे चुन लेते है- (उसे मान लेते है, उनकी अवहेलना नहीं करते )। भाव यह कि तुमको मेरे वचनों का भाव समझकर उन्हें ग्रहण करना चाहिये। राजन! जान पड़ता है, तुमने लसोड़े के पत्तों पर भोजन किया है या उसका फल खा लिया है, इसी से तुम्हारा तेज क्षीण हो गया है; अत: तुम बन्दी द्वारा की गई स्तुतियां तुम्हें उन्मत्त कर रही है, यही कारण है कि अंकुश की मार खाकर भी न मानने वाले मतवाले हाथी की भाँति तुम मेरी इन बातों को नहीं सुन पा रहे हो।
जनक ने कहा- ब्रह्मन! मै आपकी दिव्य एवं अलौकिक वाणी सुन रहा हूं, आप साक्षात दिव्यस्वरूप है, आपने शास्त्रार्थ में बन्दी को जीत लिया है। आपकी इच्छा अभी पूरी की जा रही है। देखिये यह है आपके द्वारा जीता हुआ बन्दी।
अष्टावक्र बोले- महाराज! इस बन्दी के जीवित रहने से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यदि इसके पिता वरुणदेव है तो उनके पास जाने के लिये इसे निश्चय ही जलाशय में डुबो दीजियें।
बन्दी बोला- राजन! मै वास्तव में राजा वरुण का पुत्र हूं, अत: डुबाये जाने पर का मुझे कोई भय नहीं हैं। ये अष्टावक्र दीर्घकाल से नष्ट हुए अपने पिता कहोड़ को इसी समय देखेंगे।
पंचचूड़ा अप्सरा का वर्णन देखा गया है
यथा सिहं, बाघ, भेड़िया, हाथी, वानर भालू और मृग
1- ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास। 2- ब्राह्मण, क्ष्त्रिय, वैश्य और शुद्र। 3- पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर। 4- हृस्व, दीर्ध, प्लुत और हल। 5- परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी- ये बाणी के चार पैर है। 6- आठ-आठ अखर के पांच पादों से पंक्तिछन्द की सिद्धि होती है। 7- त्वचा, ओत्र, नेत्र, रसना और नासिका- ये पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं। 8- पंचचूडा अप्सरा का उल्लेख महाभारत के अनुशासन पर्व में 38 वे अध्याय मं भी आया हैं। 9- बिपाशा (व्यास), इरावती (रावी), वितस्त (झेलम), चन्द्रभागा (चिनाव) और शतद्र (शतलज) ये ही पांच प्रदेश की पांच नदियां है।
महाभारत वन पर्व अध्याय 134 श्लोक 11-16
1 यथा रोगी, दरिद्र, शोकार्त, राजदण्डित, शठ, खल वृत्ति- से वंचित, उन्मत्त, र्इर्ष्यापरायण और कामि- ये दस निन्दक होते हैं। जैसा कि निम्नाकितं श्लोक से सियुधिष्ठिर होता है- ‘आमयी दुर्मत: शोकी दण्डितश्व शठ: खल:। नष्टवृत्तिमदी चैष्यीं कामी च दश निन्दका:। ।’ ( इति नीतिशास्त्रोक्ति) 2- उन दसो अवस्थाओं के नाम इस प्रकार है- गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, योवन, प्रौड़, वाद्धक्य तथा मृत्यु’ 3- अध्यापक, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, श्वश्रुर, नाना, दादा अपने से बडी अवस्था वाले कुटुम्बी तथा पितृत्य ( चाचा ताउ)- ये दस पूजनीय पुरुष माने गये है। जैसा कि कूर्मपुराण का वचन है- उपाध्याय: पिता ज्येष्ठभ्राता चैव महीपती:। मातुल: श्चसुरश्वैव मातामहपितामहौ।। वन्धुजष्ठ: पितृव्यश्च पुंस्येते गुरुओं मता:। 4- वाक्य बोलना, ग्रहण करना, चलना, फिरना, मलत्याग करना और मैथुन जनित सुख का अनुभव करना- से पांच कामेंन्द्रियों के विषय है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गन्ध– से पांच ज्ञानेन्द्रियों के विषय है और इन सबका मनन- मन का विषय है। इस प्रकार कुल मिलाकर ग्यारह विषय
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