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वैदिक सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार यमराज ही मृत्यू के देवता है

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वैदिक सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार यमराज ही मृत्यू के देवता है

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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वैदिक सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार यमराज मृत्यु के देवता माने गए हैं जिनका उल्लेख वेद में भी आता है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से भगवान सूर्य के जुड़वां पुत्र-पुत्री यमराज और यमुना उत्पन्न हुईं। मार्कडेयपुरण में लिखा है कि जब विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा ने अपने पति सूर्य को देखकर भय से आंखें बंद कर ली, तब सूर्य ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया कि जाओ, तुम्हें जो पुत्र होगा, वह लोगों का प्राण लेने वाला होगा। जब इस पर संज्ञा ने उनकी और चंचल दृष्टि से देखा, तब फिर उन्होंने कहा कि तुम्हें जो कन्या होगी, वह इसी प्रकार चंचलतापूर्वक नदी के रूप में बहा करेगी। पुत्र तो यही यम हुए और कन्या यमी हुई, जो बाद में ‘यमुना’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
हिंदुओं का विश्वास है कि मनुष्य मरने पर सब से पहले यमलोक में जाता है और वहां यमराज के सामने उपस्थित किया जाता है। वही उसकी शुभ और अशुभ कृत्यों का विचार करके उसे स्वर्ग या नरक में भेजते हैं। ये धर्मपूर्वक विचार करते हैं, इसीलिए ‘धर्मराज’ भी कहलाते हैं। यह भी माना जाता है कि मृत्यु के समय यम के दूत ही आत्मा को लेने के लिए आते हैं।
ये कहा जाए कि मृत्यु के देवता यमराज की मौत हुई थी तो जानकर आश्चर्य होगा लेकिन इस संबंध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। यूं तो यमराज की मृत्यु को लेकर कथा का भिन्न-भिन्न वर्णन मिलता है। लेकिन यहां इससे जुड़ी एक कथा पढ़ने को मिलेगी।

मान्यता है कि कालंजर में शिवभक्त राजा श्वेत राज्य करते थे। वृद्ध होने पर उन्होंने अपना राजपाठ बेटे को देकर गोदावरी नदी के तट पर एक गुफा में शिवलिंग स्थापित किया और वहां शिव की आराधना में लग गए। वे राजा श्वेत से महामुनि श्वेत बन गए थे। शिव की आराधना में लीन श्वेतमुनि को आभास नहीं हुआ कि उनकी आयु पूरी हो चुकी है। मृत्यु निकट आई तो यमदूतों ने मुनि के प्राण लेने के लिए जब गुफा में प्रवेश किया तो गुफा के द्वार पर ही उनके अंग शिथिल हो गए। वे गुफा के द्वार पर ही खड़े होकर श्वेतमुनि की प्रतीक्षा करने लगे। कहा जाता हैं कि जब यमदूत बलपूर्वक श्वेतमुनि को वहां से ले जाने लगे तो वहां श्वेतमुनि की रक्षा के लिए शिव के गण प्रकट हो गए। भैरव ने यमदूत मुत्युदेव पर डंडे से प्रहार कर उन्हें मार दिया।

इधर जब मृत्यु का समय निकलने लगा तो यमदूतों ने कांपते हुए यमराज के पास जाकर सारा हाल सुनाया। मृत्युदेव की मृत्यु का समाचार सुनकर यमराज क्रोधित हो गए और यमदंड लेकर भैंसे पर सवार होकर अपनी सेना के साथ वहां पहुंचे। यमराज जब बलपूर्वक श्वेतमुनि को ले जाने लगे तब सेनापति कार्तिकेय ने शक्तिअस्त्र यमराज पर छोड़ा जिससे यमराज की भी मृत्यु हो गई।

भगवान सूर्य के पास पुत्र की मृत्यु का समाचार पहुंचा तो सूर्य देव इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु ने भगवान शिव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करने का सुझाव दिया।

सूर्यदेव की तपस्या से शिव जी प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा। तब सूर्यदेव ने कहा कि हे महादेव, मेरे पुत्र यमराज की मृत्यु के बाद पृथ्वी पर असंतुलन फैल गया है। संतुलन बनाए रखने के लिए यमराज को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने नंदी से यमुना का जल मंगवाकर यम देव के पार्थिव शरीर पर छिड़के जिससे वे फिर जीवित हो गए।

यम सहित मृत्यु के 14 देवताओं की महिमा का वर्णन: स्मृतियों में चौदह यमों के नाम आए हैं, जो इस प्रकार हैं— यम, धर्मराज, मृत्यु, अंतक, वैवस्वत, काल, सर्वभूत, क्षय, उदुंबर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त।
भगवान शिव शनि देव के तर्क से प्रसन्न हुए और उन्होंने शनि देव के आग्रह पर सूर्य पुत्र यम को जीवित कर दिया। भगवान शिव ने सूर्य पुत्र यम को मृत्यु के देवता का कार्यभार सौंपा और इस प्रकार सूर्य पुत्र यम मृत्यु देव यमराज बने। मृत्यु का देवता कौन सा ग्रह है।
मृत्यु के देवता यमराज को माना जाता हैं | यम को देव हो कर भी सूर्यलोक से निष्कासित होकर धरती पर आना पड़ा और धरती पर आसुरी शक्तियों से घोर युद्ध करने के पश्चात मृत्यु को भी झेलना पड़ा था |

वैवस्वत , यम और यमी सूर्य देव और माता संज्ञा की तीन संतान माने जाते हैं , जबकि शनि सूर्य देव और माता छाया की संतान माने जाते हैं,इसकी संज्ञा की प्रतिरूप उनकी ही छाया थीं ,यमी कालान्तर में यमुना नदी के रूप में धरती पर अवतरित हुईं थीं |
सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार यमराज मृत्यु के देवता हैं। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा और भगवान सूर्य के पुत्र में रूप में जन्मे यमराज का उल्लेख वेद शास्त्रों में भी आता है। । यमराज का वाहन महिषवाहन (भैंसे पर सवार) हैं मृत्यु के देवता यमराज को धर्मराज भी कहा जाता है
व्यक्ति मरता है तो सबसे पहले यमदूतों के पल्ले पड़ता है, जो उसे ‘यमराज’ के समक्ष उपस्थित कर देते हैं। यमराज को दंड देने का अधिकार प्रदान है। वही आत्माओं को उनके कर्म अनुसार नरक, स्वर्ग, पितृलोक आदि लोकों में भेज देते हैं।
क्या देवता भी मरते हैं? मनुष्य तो मृत्यु के भय से हार मान लेते हैं परंतु देवता युध्द में क्यों हार जाते थे?
वैसे तो देवता अमर माने जाते हैं । उनमें बालपन और बुढ़ापा भी नहीं आता । वे सदैव युवा रहते हैं । जब जब वे अपनी शक्तियों का अभिमान करते हैं , सोमरस के नशे में डूब जाते हैं , उद्धत और उछृंखल व्यवहार करने लगते हैं , आसुरी शक्तियां उन पर हावी हो जाती हैं और उन्हें युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ता है । जब सृष्टि में प्रलय होता है , तब वे भी परम तत्व में लीन हो जाते हैं । सृष्टि के प्रारम्भ में उनका अस्तित्व बनता है । अवतार मनुष्य के समान जन्म लेते हैं , बड़े होते हैं और समय समाप्त होने पर विलीन हो जाते हैं ।
परम सत् की प्रकृति में दिव्यताओं को देवता कहते हैं जो सदा रहती हैं. देवासुर संग्राम शुभ और अशुभ प्रकृति का युद्ध है जो सदा चलता रहता है. अशुभ हावी होती हैं पर अंत में शुभ जीतती हैं. कहानियाँ प्रतीकात्मक हैं.
देवता और दैत्य कश्यप ऋषि की संतान है कश्यप ऋषि की पत्नी दिति और अदिति से देवताओं और दैत्यों की उत्पत्ति हुई है दैत्य देवताओं से अधिक बलवान है इसलिए देवता युद्ध में हार जाते थे ।
मृत्यु के देवता यमराज हैं, क्या यमराज जिंदा हैं, यदि नहीं तो यमराज की मृत्यु किसने की?
( यमु उपरमे ) इस धातु से यम शब्द बनता है । *”य: सर्वान् प्राणिनो नियच्छति से यम:*” अर्थात् जो सब प्राणियों के कर्मफल देने की व्यवस्था करता है और सब अन्यायों से पृथक करता है इसलिए परमेश्वर का ही नाम यम है । परमेश्वर के सर्व शक्तिमान होने से उसे अपने कार्यों के लिए किसी अन्य की आवश्यकता नहीं होती है । भैंसे पर सवार सींग युक्त काली भयानक आकृति वाले यमराज की मान्यता काल्पनिक है । ईश्वर का ही नाम यम है और वह अजर और अमर है । अतः उसकी मृत्यु का प्रश्न ही पैदा नहीं होता

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