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(भाग:149) अज्ञान अंधकार में डूबा हुआ उच्च शिक्षित विद्धान को “पवित्र पाखंडी” कहते है?

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भाग:149) अज्ञान अंधकार में डूबा हुआ उच्च शिक्षित विद्धान को “पवित्र पाखंडी” कहते है?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक रिपोर्ट

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अत्याधिक उच्च शिक्षित विद्धान यदि अज्ञानी की भांति आचरण करता है तो उसे पवित्र पाखंडी कहा जाएगा?उदाहरणार्थ कोई पढा लिखा विद्धान तो हो सकता है परंतु वह अपने स्वार्थ के लिए तथा दूसरों का अहित (नुकसान) करने के लिए राजा महाराजाओं (मंत्रियों) का ध्यानाकर्षित (ब्रेन-वाश) करते रहते है। एसे लोगों को मौकापरस्त और पवित्र पाखंडी माना जाता है। उनका अंन्त अच्छा नहीं होता है?

भ्रमभूतमिदं सर्व किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी ।
अध्क्ष्यस्फरणः शुद्धः। स्वभावेनैव शाम्याते॥७॥

अन्वय:- इदम् सर्वम् भ्रमभूतम् (परमार्थतः) किञ्चित् न अस्ति इति निश्चयी अलक्ष्यस्फुग्णः शुद्धः स्वभावेन एव शाम्यति ॥ ७० ॥

अधिष्ठान का साक्षात्कार होनेपर यह संपूर्ण विश्व ‘भ्रममात्र है, परमार्थहाष्ट से कुछ भी नहीं है, इस प्रकार जिस का निश्चय हुआ ह र स्वप्रकाश चेतनस्वरूप तथा स्वरूप के साक्षात्कार से दूर हो गया है अज्ञानरूप मल जिस का ऐसा ज्ञानी स्वभाव से ही शांति को प्राप्त होता है।॥ ७० ॥

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः।
क विधिः क च वैराग्यं क त्यागःकशमोऽपिवा॥७॥

अन्वय:- शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावम् अपश्यतः ( ज्ञानिनः ) विधिः क वैराग्यम् व त्यागः व अपि वा शमः च क ॥ ७१ ॥

शुद्ध स्फुरणरूप अर्थात् स्वप्रकाशचेतनस्वरूप और दृश्य पदार्थोको भी न देखनेवाले ज्ञानी को किसी कर्म के करने की विधि कहां ? और विषयों से वैराग्य कहां ? और त्याग कहां? तथा शांतिभो करना कहां? यह सब तो ता हो सकता है जब सांसारिक पदार्थाक वि हाट होती है ॥ ७१॥

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः ।
क्व बन्धः क च वा मोक्षः व हर्षेःक् विषादता॥७२॥

अन्वय:- अनन्तरूपेण स्फुरतः प्रकृतिम् च न पश्यतः (ज्ञानिनः) बन्ध. व मोक्ष कहः क वा विषान्ता च क ॥ ७२ ॥

जो ज्ञानी है वह अनंतरूप कर के भासता है और आत्माकोजानता है और देहादेि के विषें दृष्टि नहीं लगाता है, उस को संसार का बंधन नहीं होता है, मोक्ष की इच्छा नहीं होती है, हर्ष नहीं होता है और विषाद भी नहीं होता है ॥ ७२॥

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्र विवतते।
निर्मपो निरहंकारो निष्कामः शोभते बुधः॥७३॥

अन्वय:- बुद्धिपर्यन्तसंमारे मायामात्रम् विवर्त्तते ( अतः) बुधः निर्ममः निहिङ्कारः निष्कामः शोभते ॥ ७ ॥

यह जगत् अज्ञान से भासता है और ज्ञान से जब मायामात्र (अज्ञान) निवृत्त हो जाता है तब ज्ञानस्वरूप आत्मा ही शेष रहता है इस कारण ज्ञानी को इस संसारमें ममता अहंकार तथा इच्छा नहीं होती है, इस कारण ब्रह्माकारात्तेकर के अत्यंत शोभायमान होता है ॥७३॥

अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनः।
क विद्या कच वा विश्वंक देहाऽहं ममति वा ॥७४॥

अन्वय:- अक्षयम् गतसन्तापम् आत्मानम् पश्यतः मुनेः विद्या क वा विषयक दहः वा अहम् मम इति च क ॥ ७४ ॥

अविनाशी संतापरहित ऐसे आत्मस्वरूप का जिसको ज्ञान हुआ है ऐसे ज्ञानी को विद्या (शास्त्र ) कहां ? और विश्व कहां ? और देह कहां ? तथा अहंममभाव कहाँ ? क्योंकि उस को आत्मा से भिन्न अन्य स्फुरण ही नहीं होता है ॥ ७४॥

निरोधादीनि कर्माणिजहाति जडधीयदि।
मनोरथान्प्रलापांश्च कर्तुमानोत्यतत्क्षणात्॥७९॥

अन्वय:- जडधीः यदि निरोधादीनि कर्माणि जहाति ( तर्हि ) अतत्क्षणात् मनोरथान प्रलापान च कर्तुम् आनोति ॥ ७५ ॥

जो मूढबुद्धि देहाभिमानी पुरुष है वह अति परिश्रम कर के मन का निरोध करता है परंतु निरोध समाधिके छूटते ही उस का मन फिर तुरंत ही अनेक प्रकार से संकल्प विकल्प करने लगता है और प्रलाप आदि संपूर्ण व्यापारों को करने लगता है इस कारण ज्ञान के बिना निरोध कुछ काम नहीं देता है ॥ ७५ ॥

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् ।
निर्विकल्पो बहियत्नादन्तविषयलालसः॥७६॥

अन्वय:- मन्दः तत् वस्तु श्रुत्वा अपि विमूहताम् न जहाति (अतः मूढः ) यत्नात् बहिः निर्विकल्पः अन्तः विषयलालस: (भवति)॥ ७६ ॥

जो देहाभिमानी मूढ पुरुष है वह वेदांतशास्त्रके अनेक ग्रंथों के द्वारा आत्मस्वरूप को सुनकर भी देहाभिमान को नहीं त्यागता है. यद्यपि अति परिश्रम करके ऊपर से त्याग दिखाता है परंतु मन में अनेक विषयवासना रहती है ॥ ७६॥

ज्ञानाइलित का यो लोकदृष्टयापि कर्मकृत् ।
नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७॥

अन्वय:- यः ज्ञानात् गलितकर्मा ( सः ) लोकदृष्टया कर्मका अपि किञ्चन कर्तुम् न वक्तुम एव (च) अवसरम् न आमोति॥७७॥

ज्ञानी लोकाचार के अनुसार कर्म करता है परंतु ज्ञान के प्रतापले कर्मफल की इच्छा नहीं करता है क्योंकि वह केवल आत्मस्वरूप के विषें लीन रहता है तिस से उस को कर्म करने का अथवा कहने का अवसर नहीं मिलता है ॥ ७॥

कतमःव प्रकाशोवा हान क च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा॥७८॥

अन्वय:- सर्वदा निरातकस्य निर्विकारस्य धीरस्य तमः कवा प्रकाशः क हानम् च क ( तस्य ) किश्चन न ( भवति ) ॥७८॥

जो ज्ञानी है वह निर्विकार होता है, उस को काल आदि का भय नहीं होता है, उस को अंधकार का भान नहीं होता है, प्रकाश का भान नहीं होता है, उसको किसी बात की हानि नहीं होती है, भय नहीं होता है, वह सर्वदा मुक्त होता है ॥ ७८॥

व धैर्य क विवेकित व निरातंकतापिवा। अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्सभावस्य योगिनः॥७९॥

अन्वय:- तिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः धैर्यम कविवेकित्वम् क अपि च निरातङ्कता क ॥ ७१ ॥

ज्ञानी का स्वभाव किसी के ध्यान में नहीं आता है। क्योंकि ज्ञानी स्वभावरहित होता है उस का धीरजपना, ज्ञानीपना तथा निर्भयपना नहीं होता है ॥ ७९ ॥

नस्वर्गों नैव नर को जीवन्मुक्तिन चैव हि ।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्टयान किञ्चन ॥८॥

अन्वय:- अत्र बहुना उक्तेन किम योगदृष्टया स्वर्गः न नरक: न एव हि जीवन्मुक्तिः च एव न, किश्चन न (भवति )॥८॥

जिस ज्ञानी की सर्वत्र आत्मदृष्टि हो जाती है उसको स्वर्ग, नर्क और मुक्ति आदि का भेद नहीं होता है अर्थात् अधिक कहने से क्या प्रयोजन है, ज्ञानी पुरुष को किसी प्रकार का भी भेद नहीं भासता है ॥८॥

नैवं प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति।
धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥८॥

अन्वय:- (धीरः) लामम् प्रार्थयते न एवम् अलामेन अनुशोचति न ( अतः ) धीरस्य चित्तम् अमृतेन पूरितम् शीतलमा एव ( भवति ) ॥ ८१ ॥

जो ज्ञानी है वह लाभ की इच्छा नहीं करता है और लाभ नहीं होते तो शोक नहीं करता है और इस कारण ही धैर्यवान् ज्ञानी का चित्तज्ञानामृत से परिपूर्ण और इसी कारण शीतल कहिये तापत्रयरहित होता है ॥ ८१॥

नशान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित्कृत्यं न पश्यति ॥ ८२॥

अन्वय:- निष्कामः शान्तम् न स्तौति; दुष्टम् अपि न निन्दति, एसः (सन ) समदुःखसुखः (भवति ) ( निष्कामत्वात ) किश्चित् कृत्यम् न पश्यति ॥८२॥

जो पुरुष कामनाशून्य ज्ञानी है वह किसी शांत पुरुष को देखकर प्रशंसा नहीं करता है और दुष्ट को देखकर निंदा नहीं करता है क्योंकि वह अपने ज्ञानरूपी अमृत से तृप्त होता है तिस कारण सुखदुःख की कल्पना नहीं करता है, तथा किसी कृत्य को नहीं देखता है ॥ ८२ ॥

धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति ।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न तोनचजीवति॥८३॥

अन्वय:- हर्षामर्षविनिर्मुक्तः धीरः संसारम् न देटि; आत्मानम् न दिदृक्षति; न मृतः ( भवति ); न च जीवति ॥ ८३ ॥

जो धैर्यवान अर्थात् ज्ञानी है वह संसार का द्वेष नहीं करता है तथा आत्मा को देखने की इच्छा नहीं करता है, क्योंकि वह स्वयं ही आत्मस्वरूप है इस कारण उसको हर्ष तथा शोक नहीं होता है और जन्ममरणरहित होता है॥ ८३॥

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च ।
निश्चिन्तःस्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः॥ ८४॥

अन्वय:- पुत्रारादी निःस्नेहः, विषयेषु च निष्कामः, स्वशरीरे मपि निश्चिन्तः; निराशः, बुधः शोभते ॥ ८४ ॥

पुत्र स्त्री आदि के विषेप्रीति न करनेवाला, विषयोंके नादिक की चिन्ता न करनेवाला, इस प्रकार सर्वत्र आशारहित ज्ञानी शोभा को प्राप्त होता है ॥ ८४॥

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथा पतितवर्तिनः।
स्वच्छन्दं चरतो देशान्यवास्त-मितशायिनः॥ ८॥

अन्वय:- यत्रास्तमितशायिनः देशान् स्वच्छन्दम् चरतः, वथापतितवर्तिनः धीरस्य सर्वत्र तुष्टि ( धवनि ) ॥ ८५ ॥

जो ज्ञानी पुरुष है, उस को जो कुछ प्रारब्धानुसार मिल जाय उसस ही वह वर्ताव करता है और परम संतोपको प्राप्त होता है, तदनंतर अपनी दृष्टि जिधर को उठ जाती है उनी देशों में विचरता है और जहां ही सूर्य अस्त होय तहां ही शयन करता है ॥ ८५॥

पततूहेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः ।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः॥८६॥

अन्वय:- देहः पततु वा उदेतु, स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेपसंमृतेः महात्मनः अस्य चिन्ता न ( भवति ) ॥८६ ॥

देह नष्ट होय अथवा रहे परंतु अपने स्वरूपरूपी भूमि के विश्रामकर के संपूर्ण संसारकोभूलनेवाले ज्ञानीको इस देह की चिंता नहीं होती है ॥८६॥

अकिञ्चनः कामचारो निन्द्रश्छिन्नसंशयः ।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः॥८७॥

अन्वय:- अकिञ्चनः कामचारः निईन्दः छिन्नसंशयः सर्वभावेषु असक्तः वुधः केवल: रमते ॥ ८७ ॥

जो ज्ञानी है वह इकला ही आत्मस्वरूप के विषें रमता है, कुछ पास नहीं रखता है, तथापिअपनी इच्छानुसार बर्ता करता है, सुखदुःखते रहित होता है, ज्ञानी को संशय नहीं होता है और संपूर्ण विषयों से विरक्त रहता है॥८७॥

निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
सुभिन्नहृदयग्रन्थिविनिधूतरजस्तमः॥८८॥

अन्वय:- निर्ममः समलोष्टाश्मकाञ्चनः सुभिन्नहृदयग्रन्थिः विनिर्धूतरजस्तमः धीरः शोभते ॥ ८८ ॥

ममता का त्यागनेवाला, मट्टी. पत्थर और सुवर्णको समान माननेवाला आर दूर हो गई है हृदय की अज्ञानरूपी ग्रंथि जिस की ऐसा और दूर हो गये हैं रज और तमगुण जिस के ऐसा ज्ञानी शोभा को प्राप्त होता है ॥८८॥

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि ।
मुक्तात्मानो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९॥

अन्वय:- सर्वत्र अनवधानस्य हदि किश्चित् वासना न (भवति); (अतः) मुक्तात्मनः वितृप्तस्य ( तस्य) केन तुलना जायते ॥ ८९॥

जिस की संपूर्ण विषयों में आसक्ति नहीं है और जिसके हृदय के विषें किचिन्मात्र भी वासना नहीं है और जो मात्मानंद के विषें तृप्त है, ऐसे जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुषकी समान त्रिलो की में कौन हो सकता है ॥ ८९ ॥

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपिन पश्यति। ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निवासनाहते ॥९॥

अन्वय:- (यः ) जानन् अपि न जानाति, पश्यन् अपि न पश्यति ब्रुान् अपि च न ब्रूते; ( सः) निर्वासनात् ऋते अन्यः कः ? ॥९ ॥

जो जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआभी नहीं देखता है, बोलता हुआ भी नहीं बोलता है, ऐसा पुरुष ज्ञानी के सिवाय जगत् में और दूसरा कौन है ? अर्थात् कोई नहीं है, क्योंकि ज्ञानी को अभिमान तथा वासना नहीं होती है ॥९॥

भिक्षुर्वा भूपतिवापि यो निष्कामः स शोभते।
भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः॥९॥

अन्वय:- यस्य मावेषु शोमनाशीमना मतिः गलिता, (एताहुशः यः) निष्कामः सः भिक्षुः वा अपि वा भूपतिः शोभते॥९॥

जिस ज्ञानी की शुभ पदार्थों में इच्छा बुद्धि नहीं होती है और अशुभ पदार्थों में द्वेषबुद्धि नहीं होती है ऐसा जो कामनारहित ज्ञानी है वह राजा हो तो विदेह ( जनक) समान शोभित होता है और भिक्षु होय तो परम ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्यमुनि की समान शाभाको प्राप्त होता है क्यों कि आत्मानद के विषें मन पुरुषको राज्य बंधन नहीं करता है और त्याग माक्षदायक नहीं होता है । ९१॥

कस्वाच्छन्ध कसंकोचःकवा तत्वविनिश्चयः ।
निर्व्याजाजवभूतस्व चरितार्थस्य योगिनः॥९२॥

अन्वय:- नियाजावभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः स्वान्छन्धम् क सङ्कोचः क वा तत्त्वांवनिश्चयः क ॥ ९२ ॥

जिस पुरुष का मन कपटरहित और कोमलतायुक्त है और जिसने आत्मज्ञानरूपी कार्य को सिद्ध किया है, ऐसे जीवन्मुक्त पुरुष को स्वाधीनपना नहीं होता है और पराधीनपना भी नहीं होता है, तत्व का निश्चय करनाभी नहीं होता है, क्योंकि उस का देहाभिमान दूर हो जाता है ॥ ९२ ॥

आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतातिना ।
अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते॥९३॥

अन्वय:- आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतातिना (ज्ञानिना) अन्तः यत् अनुभूयेत, तत् कथम् कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥

जो पुरुष आत्मस्वरूप के विषें विश्रामरूपअमृतका पान कर के तृप्त हुआ है और आशामात्र निवृत्त हो गई है तथा जिस के भीतर की पीडा शांत हो गई है ऐसा ज्ञानी अपने अंतःकरण के विषें जो अनुभव करता है, उस को प्राणी किस प्रकार कह सकता है और उस अनुभव को किस को कहां जाय ? क्योंकि इस का आधिकारी दुर्लभ है ॥ ९३॥

सुप्तोऽपिन सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शायतो नच।
जागरेऽपि न जागति धीरस्तृप्तःपदे पदे ॥९४ ॥

अन्वय:- पदे पदे तृप्तः धीः सुषुमो भी च न सुप्ता, स्वप्ने अपि च न शयितः, जागरे अपि न जागति ॥ ९४ ॥

ज्ञानी की सुषुप्ति अवस्था दीखती है परंतु ज्ञानी सुषुप्ति के वशीभूत नहीं होता है, स्वप्नावस्था भासती है परंतु ज्ञानी शयन नहीं करता है किंतु साक्षीरूप रहता हे और जाग्रदअवस्था भासती है परंतु ज्ञानी जाग्रदवस्था के विकारों से अलग रहता है क्योंकि यह तो न अवस्था बुद्धि की है और जो बुद्धि से पर है और आत्मानंद से तृप्त है ॥ ९४॥

ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेंद्रियोऽपि निरिन्द्रियः।
सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहंकृती॥९५॥

अन्वय:- ज्ञः सचिन्तःअपि निश्चिन्तः ( भवति ), सेन्द्रियः अपि निरिन्द्रियः ( भात ); सुबुद्धिः अपि निद्धिः ( भवति ); साहंकारः अपि निरहंकृतिः (भवात) ॥ ९५ ॥

ज्ञानी को चिंता है ऐसा लोकों के देखने में आता है परंतु ज्ञानी निश्चित होता है, ज्ञानी इंद्रियोंतहित दीखता है परंतु वास्तव में ज्ञान इंद्रियरहित होता है, व्यवहारमें ज्ञानी चतुरबुद्धिवाला दीखता है, परंतु बानी बुद्धिरहित होता है और ज्ञानी अहंकारयुक्तसा दीखता है परंतु ज्ञानी को अहंकार का लेश भी नहीं होता है ॥ ९५ ॥

न सुखीन च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान्।
न मुमुक्षुने वा मुक्तो न किञ्चिन्नच किञ्चन॥ २६॥

अन्वय:- ( ज्ञानी ) न सुखी; वा न च दुःखी; न विरक्तः, न सङ्गवान् न मुमुक्षु वा न मुक्तः, न किञ्चित् न च किञ्चन ॥१६॥

ज्ञानी सुखी नहीं होता है, दुःखी नहीं होता है, विरक्त नहीं होता है, आसक्त नहीं होता है, मोक्षकी इच्छा नहीं करता है, मुक्त नहीं होता है, सत्रूप, अनिर्वचनीय होता है ॥ ९६॥

विक्षेपेऽपिन विभिप्तःममाधौ न ममाधिमान् ।
जाड्यापन जडो धन्यः पाण्डित्यऽपिन पण्डितः॥२७॥

अन्वय:- धन्यः विक्षपे अपि लिक्षिप्त. न, ममाचौ समाधिमान् म, जाडये अपि जड. न; पाण्डिन्ये अपि पण्डित न ॥ ९७ ॥

ज्ञानी का विक्षेप दीखता है परंतु ज्ञानी विक्षिप्त नहीं होता है, ज्ञानी की समाधि दीखती है परंतु ज्ञानी समाधि नहीं करता है, ज्ञानी के विपें जडपना दीखता है परंतु ज्ञानी जड नहीं होता है तथा ज्ञानी में पंडितपना दोखता है परंतु ज्ञानी पंडित नहीं होता है, क्योंकि यह संपूर्ण विकार देहाभिमानी के वर्षे रहते हैं ॥ ९७॥

मुक्तो यथास्थितिव यः कृतकर्तव्यनिवृतः।
समः सर्वत्र वैतष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ९८॥

अन्वय:- यथास्थितिस्वस्थः कृत कर्नव्यनिर्वृतः सर्वत्र समः मुक्तः बैतडण्यात कृतम् अकृतम् न स्मरति ॥ ९८॥

जैसी अवस्था प्राप्त होय उसमें ही स्वस्थ रहनेवाला और किये हुए और कर्तव्यकर्मो के विषें अहंकार और उद्वेग न करनेवाला अर्थात् संतोषयुक्त तथा सर्वत्र आत्मदृष्टि करनेवाला जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष तृष्णा के न होने से यह कार्य किया, यह नहीं किया ऐसा स्मरण नहीं करता है ॥ ९८॥

न प्रीयते वन्धमानो निंद्यमानो न कुप्यति ।
नैवोदिजति मरणेजीवने नाभिनन्दति॥९९॥

अन्वय:- (ज्ञानी) वंद्यमानः प्रीयते न निन्द्यमानः कुप्यति न; मरणे उद्विजति न; एव जीवने अभिनन्दति न ॥ ९९ ॥

जो ज्ञानी है उस की कोई प्रशंसा करे तो प्रसन्न नहीं होता है और निंदा करे तो कोप नहीं करता है, तिसी प्रकार मृत्यु भी सामने आता दीखे तो भी ज्ञानी घबडता नहीं है और बहुत वर्षांपर्यंत जीवें तो भी प्रसन्न नहीं होता है ॥ ९९ ॥

न धावति जनाकीर्ण नारण्यमुपशान्तधीः ।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते ॥१०॥

अन्वय:- उपशान्तधीः जनाकीर्णम् न धावति, (तथा ) अरण्यम् न (धावति) किन्तु यत्र तत्र यथा तथा समः एव अवतिष्ठते ॥ १००॥

जिस ज्ञानी की वृत्ति शांत हो गई है वह जहां मनुष्यों की सभा होय तहां जाने की इच्छा नहीं करता है, तिसी प्रकार निर्जन स्थान जो वन तहां भी जाने की इच्छा नहीं करता है, किंतु जिस समय जो स्थान मिल जाय तहां ही स्थिति कर के निवास करता है, क्योंकि नगरमें तथा वन में ज्ञानी की एक समान बुद्धि होती है अर्थात् ज्ञानी की दृष्टि में जैसा नगर है वैसा ही वन होता है॥१००॥

इति श्रीमदष्टावक्रमनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां भाषाटीकया सहितं शान्तिशतकं नामाटादश प्रकरणं समाप्तम् ॥१८॥

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अथैकोनविंशतिकं प्रकरणम् १९.

तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात् ।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतोमया॥१॥

अन्वय:- मया हृदयोदरात् तत्त्वविज्ञानसंदंशम् आदाय नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतः ॥ १॥

श्रीगुरु के मुख से साधनसहित ज्ञान का श्रवण करके शिष्य को आत्मस्वरूप के विषें विश्रामप्राप्त हुआ, तिसका सुख आठ श्लोकोंकर के वर्णन करते हैं। हे गुरो! आपसे तत्वज्ञानरूप सांडसी को लेकर अपने हृदय में से नाना प्रकार के संकल्पविकल्परूप कांटे को दूर कर दिया ॥१॥

कधर्मःकच वा कामः क चार्थः क विवेकिता।
कद्वैतंक च वाद्वैतं खमहिनि स्थितस्य मे॥२॥

अन्वय:- स्वमहिम्नि स्थितस्य से धमः क, वा कामः च क; अर्थः क; विवकिता च का द्वैतम् क; वा अद्वैतम् च के ॥ २॥

हे गुरो ! धर्म अर्थ काम मोक्ष इन चारों का फल तुच्छ है, इस कारण तिन धर्मादिरूप कांटे को दूर करके आत्मस्वरूप के विषें स्थिति को प्राप्त हुआ जो मैं तिस मुझे द्वैत नहीं भासता है, इस कारण ही मुझे अद्वैतविचार भी नहीं करना पडता है, क्योंकि “ उत्तीर्णे तु परे पारे नोकायाः किं प्रयोजनम् “ जब परली पार उतर गये तो फिर नौ का की क्या आवश्यकता है ? इस कारण जब द्वैत का भान ही नहीं है तो फिर अद्वैत विचार करने से फल ही क्या ? ॥२॥

क भूतं व भविष्यद्वा वर्तमानमपि क वा ।
क देशःव चवा नित्यं स्वमहिनि स्थितस्य मे ॥३॥

अन्वय:- नित्यम् स्वमहिनि स्थितस्य मे भूतम् क वा भविष्यत् क, अपि वा वर्तमानम् क, देशः क ( अन्यत् ) च वा क॥ ३ ॥

नित्य आत्मस्वरूप के विषें स्थित जो मैं तिस मुझे भूतकाल कहां है, भविष्यत् काल कहाँ है, वर्तमानकाल कहां है, देश कहां है तथा अन्य वस्तु कहां है ?॥३॥

व चात्मा क चवानात्मा क शुभकाशुभं तथा ।
कचिन्ताक चवाचिन्ता स्वमहिम्निस्थितस्य मे॥४॥

अन्वय:- स्वमहिन्नि स्थितस्य मे आत्मा क बा अनात्मा च क; शुभम् क तथा अशुभम् क. चिन्ता कवा अचिन्ता च व ॥ ४ ॥

आत्मस्वरूप के विषें स्थित जो मैं तिस मुझे आत्मा, अनात्मा, शुभ, अशुभ, चिंता और अचिंता यह नाना प्रकार भेद नहीं भासता है ॥४॥

कस्वप्नःक्क सुषुप्तिा क च जागरणं तथा।
व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥५॥

अन्वय:- स्वमहिम्न स्थितस्य मे स्वप्नः व वा सुषुप्तिः च क, तथा जागरणम् क्व, तुरीयम् अपि वा भयम् व ॥५॥

आत्मस्वरूप के विषें स्थित जो मैं तिस मेरी स्वप्नावस्था नहीं होती है, सुषुप्ति अवस्था नहीं है तथा जायत् अवस्था नहीं होती है, क्योंकि यह तीनों अवस्था बुद्धि की हैं, आत्मा की नहीं हैं, मेरी तुरीयावस्थाभी नहीं होती है तथा अंतःकरणधर्म जो भय आदि सोभी मुझे नहीं होता है ॥५॥

क दूरंक समीपं वा बाह्य काभ्यन्तरं कवाक
स्थूलंकच वा सूक्ष्म स्वमहिन्नि स्थितस्य मे॥६॥

अन्वय:- स्वमहिम्नि स्थितस्य मे दूरम् क वा समीपम् क्व, बाह्यम् क वा आभ्यन्तरम् क, स्थूलम् क्व वा सूक्ष्मम् च व ॥ ६ ॥

दूरपना, समीपपना, बाहरपना, भीतरपना, मोटापना तथा सूक्ष्मपना ये सब मेरे विषें नहीं हैं क्योंकि मैं तो सर्वव्यापी आत्मस्वरूप में स्थित हूं॥६॥

जिगाट क मृत्यु वितं वा व लोकाः कास्य क लौकिकम् ।
क लयः व समाधिवा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ७॥

अन्वय:- स्वमहिम्नि स्थितस्य अस्य मे मृत्युः क्व, जीवितम् क, लोकाः क्व वा लौकिकम् क्व, लयः क्व वा समाधिः क्व ॥ ७॥

आत्मस्वरूप के विषें स्थित जो मैं तिस मेरा मरण नहीं होता है, जीवन नहीं होता है, क्योंकि मैं तो त्रिकाल में सत्यरूपह, केवल आत्मामात्र को देखनेवाला जो में तिस मुझे भू आदि लोकों की प्राप्ति नहीं होती है इसी कारण मुझे कोई लोकिक कार्य भी कर्तव्य नहीं है। मैं पूर्णात्मा हूं, इस कारण मेरा लय वा समाधि नहीं होती है ॥७॥

अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम् ।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥८॥

अन्वय:- आत्मनि विश्रान्तस्य मम त्रिवर्गकथया योगस्य कथया अलम् विज्ञानकथया अपि अलम् ॥ ८॥

आत्मा के विषें विश्राम को प्राप्त हुआ जो मैं तिसमझे धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग की चर्चा से कुछ प्रयोजन नहीं है, योग की चर्चा कर के कुछ प्रयोजन नहीं है, तथा ज्ञान की चर्चा करने से भी कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ८॥

इति श्रीमदष्टावक्रमुनिकृतायां ब्रह्मविद्यायां भाषाटीकया सहितकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १९॥

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अथ विंशतिकं प्रकरणम् २०.

क भूतानि व देहो वा केन्द्रियाणि क वा मनः ।
क शून्यं क च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने॥१॥

अन्वय:- निरञ्जने मत्स्वरूपे भूतानि क्व वा देहः क्व, इन्द्रियाणि क वा मनः क्व, शून्यम् क्व, नैराश्यम् क्व च ॥ १ ॥

पूर्व वर्णन की हुई आत्मस्थिति जिस की हो जाय उस जीवन्मुक्त की दशा का इस प्रकारण में चौदह श्लोकोंकर के वर्णन करते हैं कि, हे गुरो! मैं संपूर्ण उपाधिरहित हूं, इस कारण मेरे विषें पंचमहाभूत तथा देह तथा इंद्रियें तथा मन नहीं है, क्योंकि में चेतनस्वरूपहूंतिसी प्रकार शून्यपना और निराशपना भी नहीं है ॥१॥

क शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः ।
क तृप्तिः क वितृष्णात्वं गतद्वन्द्रस्य मे सदा ॥२॥

अन्वय:- सदा गतद्वन्द्वस्य मे शास्त्रम् क्व, आत्मविज्ञानम् क, वा निर्विषयम् मनः क्व, तृप्तिः क्व, वितृष्णात्वम् व ॥ २ ॥

शास्त्राभ्यास करना, आत्मज्ञान का विचार करना, मन को जीतना, मन में तृप्ति रखना और तृष्णा को दूर करना यह कोई भी मुझ में नहीं है, क्योंकि मैं इंदरहित हूं ॥२॥

क विद्याक्कच वांविद्या काहं वेदं मम कवा।
कबन्धः क्व च वा मोक्षःस्वरूपस्य वरूपिता ॥३॥

अन्वय:- (मयि ) विद्या व वा विद्या च क्व, अहम् क्व इदम् क्क वा मम क्व, बन्धः क्व वा मोक्षः च क्व, स्वरूपस्य रूपिता व ॥३॥

अहंकाररहित जो मैं हूं तिस मेरे विषें विद्या अविद्या मैं हूं, मेरा है, यह है इत्यादि आभिमान के धर्म नहीं है तथा वस्तु का ज्ञान मेरे विषें नहीं है और बंध मोक्ष मेरे नहीं होते हैं, मेरा रूप भी नहीं है, क्योंकि मै चैतन्य मात्र हूं॥३॥

क प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि कवा ।
क तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥४॥

अन्वय:- सर्वदा निर्विशेषस्य ( मे ) प्रारब्धानि कर्माणि क्व, वा जीवन्मुक्तिः अपि क्व, तद्विदेहकैवल्यम् क्व ॥ ४॥

सर्वदा निर्विशेष स्वरूप जो मैं तिस मेरे प्रारब्धकर्म नहीं होता है और जीवन्मुक्ति अवस्था तथा विदेहमुक्तिभी नहीं है क्योंकि मैं सर्वधर्मरहित हूं॥४॥

व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्किंयं ग स्फुरणं व वा।
वापरोक्षं फलं वाक निःस्वभावस्य मे सदा ॥५॥

अन्वय:- सदा निःस्वभावस्य मे कर्ता व वा भोक्ता व वा निष्क्रियम् स्फुरणम् क्व, अपरोक्षम् व वा फलम् क्व ॥ ५ ॥

मैं सदा स्वभावरहित हूं, इस कारण मेरे विषें कर्तापना नहीं है, भोक्तापना नहीं है तथा विषयाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप फल नहीं है ॥५॥

कलोकः क्व मुमुक्षुर्वा क योगी ज्ञानवान् कवा।
कबद्धःकच वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥६॥

अन्वय:- अहमद्रये स्वस्वरूपे लोकः क्व वा मुमुक्षुः क्व, योगी क, ज्ञानवान् क्व, बद्धः क्व वा मुक्तः च क्व ॥ ६ ॥

आत्मरूप अद्वैत स्वस्वरूप के होनेपर न लोक है, न मोक्ष की इच्छा करनेवाला हूं, न योगी हूं, न ज्ञानी हूं, नबंधन है, न मुक्ति है ॥६॥

व सृष्टिः क्व च संहारःक्क साध्यं क च साधनम् ।
व साधकः क सिद्धिा स्वस्वरूपेऽहमद्रये ॥ ७॥

अन्वय:- अहम्-अद्वये स्वस्वरूपे सृष्टिः क, संहारः च व साध्यम् क्व, साधनम् च क्व, साधकः क्व वा सिद्धिः क्व ॥ ७॥

आत्मरूप अद्वैत स्वस्वरूप के होनेपर न सृष्टि है, न कार्य है, न साधन है और न सिद्धि है, क्योंकि मैं सवेंधर्म रहित हूँ॥७॥

क प्रमाता प्रमाण वाक प्रमेयंक च प्रमा।
क किञ्चित्क न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८॥

अन्वय:- सर्वदा विमलस्य मे प्रमाणं वा प्रमाता क्व प्रमेयं क प्रमा च क्व किञ्चित् क्व न किञ्चित् क्व ॥ ८॥

आत्मा उपाधिरहित है तिस आत्मा के विषें प्रमाता, प्रमाण तथा प्रमेय ये तीनों नहीं है और कुछ है अथवा कुछ नहीं है, ऐसी कल्पना भी नहीं है ॥ ८॥

क विक्षेपः क चैकाम्यं क निर्बोधः क मूढता।
क हषः क विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥९॥

अन्वय:- सर्वदा निष्क्रियस्य मे विक्षेपः क्व ऐकाम्यं चक्क निर्बोधः क्व मूहता क्व हर्षः क्व विषादः क्व ॥ ९ ॥

मैं सदा निर्विकार आत्मस्वरूप हूं इस कारण मेरे विषें विक्षेप तथा एकाग्रता, ज्ञानीपना, मूढता, हर्ष और विषाद ये विकार नहीं है ॥ ९॥

कचैष व्यवहारो वा क च सा परमार्थता ।
व सुखं क च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥१०॥

अन्वय:- सदा निर्विमर्शस्य मे एषः व्यवहारः क्व वा सा परमार्थता च क्व, सुखं च क्व वा दुःखं च क्व ॥ १० ॥

मैं सदा संकल्पविकल्परहित आत्मस्वरूप हूं, इस कारण मेरे विषें व्यवहारावस्था नहीं है, परमार्थावस्था नहीं है और सुख नहीं है तथा दुःख भी नहीं है ॥१०॥

क्वमायाक च संसारःव प्रीतिर्विरतिः कवा।
क जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥११॥

अन्वय:- सर्वदा विमलस्य मे माया व संसारः च क्व प्रीतिः कवा विरतिः क जीवः क्व तत् ब्रह्म च क्व ॥ ११ ॥

मैं सदा शुद्ध उपाधिरहित आत्मस्वरूप हूं, इस कारण मेरे विषें माया नहीं है, संसार नहीं है, प्रीति नहीं है, वैराग्य नहीं है, जीवभाव नहीं है तथा ब्रह्मभावभी नहीं है ॥ ११॥

क प्रवृत्तिनिवृत्तिा क मुक्तिः क च बन्धनम् ।
कूटस्थनिविभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२॥

अन्वय:- कूटस्थनिर्विभागस्य सदा स्वस्थस्य मम प्रवृत्तिः क. वा निवृत्तिः क, मुक्तिः क, बन्धनम् च क्व ॥ १२ ॥

आत्मस्वरूप जो मैं हूं तिस मेरे विषें प्रवृत्ति नहीं है, मुक्ति नहीं है तथा बंधन भी नहीं है ॥ १२॥

कोपदेशःव वा शास्त्रं क शिष्यः कं च वा गुरुः।
क चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥

अन्वय:- निरुपाधेः शिवस्य मे उपदेशः क्व वा शास्त्रं व शिष्यः क्व वा गुरुः क्व वा पुरुषार्थः क्व च अस्ति ॥ १३ ॥

उपाधिशून्य नित्यानंदस्वरूप जो मैं हूं तिस मेरे अर्थ उपदेश नहीं है, शास्त्र नहीं है, शिष्य नहीं है, गुरु नहीं है तथा परम पुरुषार्थ जो मोक्ष सो भी नहीं है ॥१३॥

क चास्ति क च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क च द्वयम् । बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४॥

अन्वय:- ( मम ) अस्ति च क, वा न अस्ति च क्व, एक च के अस्ति, द्वयं च क्व, इह बहुना उक्तेन किम्, मम किश्चित् न उत्तिष्ठते ॥ १४ ॥

मैं आत्मस्वरूप हूं इस कारण मेरे विषें अस्तिपना नहीं है, नास्तिपना नहीं है, एकपना नहीं है, द्वैतपना नहीं है इस प्रकार कल्पित पदार्थो की वार्ता करोडों वर्षापर्यंत कहूं तब भी हार नहीं मिल सकता, इस कारण से कहता हूं कि, मेरे विषें किसी कल्पना का भी आभास नहीं होता है, क्योंकि मैं एकरस चेतन स्वरूप हूं ॥१४॥

इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां भाषाटीकासहितं विशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥२०॥

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अथैकविंशतिकं प्रकरणम् २१ ।

विंशतिश्चोपदेशे स्युःश्लोकाश्च पञ्चविंशतिः।
सत्यात्मानुभवोल्ला से उपदेशे चतुर्दश॥१॥

अन्वय:- उपदेशे विंशतिः च स्युः । सत्यात्मानुभवोल्ला से च पञ्चविंशतिः । उपदेशे चतुर्दश ॥ १॥

अब ग्रंथकर्ताने इस प्रकरण में ग्रंथ की श्लोकसंख्या और विषय दिखाये हैं। गुरूपदेशनामक प्रथम प्रकरण में २० श्लोक हैं शिष्यानुभवनामक द्वितीय प्रकरणमें २५ श्लोक हैं आक्षेपोपदेशनामकं तृतीय प्रकरण में १४ श्लोक हैं ॥१॥

षडल्ला से लये चैवोपदेशे च चतुश्चतुः । पञ्चकं स्यादनुभवे बन्धमोक्षे चतुष्ककम् ॥२॥

अन्वय:- (चतुर्थे ) उल्ला से षट् । लये च उपदेशे च एव चतुश्चतुः । अनुभवे पञ्चकम् । बन्धमोक्षे चतुष्ककं स्यात् ॥ २ ॥

शिष्यानुभवनामक चतुर्थ प्रकरण में ६ श्लोक हैं। लयनामक पंचम प्रकरण में ४ श्लोक हैं। गुरूपदेशनामक पष्ठ प्रकरणमें भी ४ श्लोक हैं। शिष्यानुभवनामक सप्तम प्रकरण में ५ श्लोक हैं। बंधमोक्षनामक अष्टम प्रकरणमें ४ श्लोक हैं ॥२॥

निर्वेदोपशमे ज्ञाने एवमेवाष्टकं भवेत् ।
यथासुखसप्तकंच शांतीस्याटे. दसंमितम् ॥३॥

अन्वय:- निर्वेदोपशमे एवं एव ज्ञाने अष्टकम् भवेत् । यथा सुखे च सप्तकम् । शान्तौ च वेदसंमितं स्यात् ॥ ३ ॥

निर्वेदनामक नवम प्रकरण में ८ श्लोक हैं । उपशमनामक दशम प्रकरण में ८ श्लोक है । ज्ञानाष्टकनामक एकादश प्रकरण में ८ श्लोक हैं । एवमेवाष्टक नामक द्वादश प्रकरण में ८ श्लोक हैं । यथासुखनामक त्रयोदश प्रकरण में ७ श्लोक हैं। शांतिचतुष्कनामक चतुर्दश प्रकरण में ४ श्लोक हैं ॥३॥

तत्त्वोपदेशे विशच्च दश ज्ञानोपदेश के ।
तत्त्वस्वरूपे विंशच शमे च शतकं भवेत्॥४॥

अन्वय:- तत्त्वोपदेशे विंशत् । ज्ञानोपदेश के च दश । तत्त्वस्वरूप के च विंशत् । शमे च शतकम् भवेत् ॥ ४॥

तत्वोपदेशनामक पंचदशप्रकरण में २० श्लोक हैं। ज्ञानोपदेशनामक षोडश प्रकरण में १० श्लोक हैं। तत्वस्वरूपनामक सप्तदश प्रकरण में २० श्लोक हैं। शमनामक अष्टादशप्रकरण में १०० श्लोक हैं ॥४॥

अष्टकं चात्मविश्रान्तौ जीवन्मुक्ती चतुर्दश ।
षट् संख्याक्रमविज्ञाने ग्रन्थेकात्म्यं ततः परम् ॥५॥
विशकमितैः खण्डैः श्लोकैरात्मानिमध्यखैः।
अवधूतानुभूतेश्च श्लोकाः संख्याक्रमा अमी॥६॥

अन्वय:- आत्मविश्रान्तौ च अष्टकम् । जीवन्मुक्ती चतुर्दश । संख्याः क्रमविज्ञाने पट् । ततः परम् आत्माग्निमध्यखैः श्लोकः विंशत्येकमितैः खण्डैः ग्रन्थैकात्म्यम् ( भवति ) । अमी श्लोकाः अवधूतानुभूतेः संख्याक्रमाः ( कथिताः ) ॥ ५॥ ६ ॥

आत्मविश्रान्तिनामक उन्नीसवें प्रकरण में ८ श्लोक हैं। जीवन्मुक्तिनामक विंशतिक प्रकरण में १४ श्लोक हैं। और संख्याकमविज्ञाननामक एकविंशतिक प्रकरण में ६ श्लोक हैं और संपूर्णग्रंथ में इक्कीस प्रकरण और ३०३ श्लोक हैं। इस प्रकार अवधूत का अनुभवरूप जो ᳚अष्टावक्रगीता” है उस के श्लोकों की संख्या का क्रम कहा। यद्यपि अंत के श्लोककर के सहित ३०३ श्लोक हैं परंतु दशमपुरुष की समान यह श्लोक अपने को ग्रहणकर अन्य श्लोकों की गणना करता है॥५॥६॥

इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां सान्वयभाषाटीकया सहितं संख्याक्रमव्याख्यानं नामैकविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥२१॥

इति सान्वयभाषाटीकासमेता अष्टावक्रगीता समाप्ता।

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