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क्या राहुल गांधी कांग्रेस की डूबती नैया पार लगाएंंगे या डुबाएंगे? बुद्धीजीवियों के विचार

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क्या राहुल गांधी कांग्रेस की डूबती नैया पार लगाएंंगे या डुबाएंगे? बुद्धीजीवियों के विचार

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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नई दिल्ली। हाल ही में आए पांच राज्यों के चुनाव में आने वाले परिणामों में इंदिरा कांग्रेस की विफलता तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रचंड सफलतओं ने साम्प्रदायिक एवं लोकलुभावन राजनीति को करारा तमाचा जड़ा है| मतदाता जनता जनार्दन अब मनगढंत वादों और दावों को झुठलाने लगी है बताया जा रहा है कि आम आदमी भी सत्तालोलुप राजनीतिक दलों की राजनीति को समझने लगा है और उन्हें नकारने में भी उसे कोई गुरेज नहीं है| १40 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के लिए यह स्थिति अत्यन्त लज्जाजनक ही है| देखा जाए रहा है कि कांग्रेस के बडे बडे धुरंधर नेता और कार्यकर्ता पार्टी छोडकर भाजपा मे प्रवेश कर रहे हैं।कांग्रेस इस हालत में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और इसकी नीतियां ही जिम्मेदार हैं| पिछले 2014 के पूर्व 70 सालों से केंद्र और राज्यों में आरूढ़ कांग्रेस न तो अपने सहयोगी दलों को संतुष्ट कर पाई है और न ही भविष्य के भारत का खाका उसने जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है| घोटालों पर घोटाले, पड़ोसी देशों की उद्दंडता पर भीरूता, जनता को मालिक के बजाए गण मानने की प्रवृत्ति जैसे अनगिनत कारक हैं जो भारत की महान छवि के साथ अन्याय कर रहे हैं| इसके उलट भाजपा की राष्ट्र को सर्वोपरि मानने की नीति, जनता ही मालिक है का उदघोष, पार्टी शासित राज्यों में सुशासन, सुराज व दृढ संकल्प ने पार्टी को आम जन में लोकप्रिय बना दिया है| इसकी बानगी पार्टी की ऒर से प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की देशभर में आयोजित जनसभाओं में उमड़ती भारी भीड़ से लक्षित होती है| मोदी की लोकप्रियता व गुजरात सहित अन्य राज्यों में उनकी सरकारें के सुराज ने जनता को मोहित करते हुए यह विश्वास भी दिलाया है कि कमजोर और भीरु कांग्रेस के दिन अब समाप्त हो रहे हैं| हालांकि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के अनुसार मोदी की हवा जानबूझ कर मीडिया द्वारा बनाई गई है| यदि इनके दावे पर एक बारगी यकीन कर भी लिया जाए तो क्या यह सम्भव है? कदापि नहीं| लोकतंत्र का चौथा खम्भा बिकाऊ नहीं है परंते गूममराह जरुरहै | मोदी हों या राहुल; उसकी नज़र में सभी एक समान हैं| हां, जो जनता की बात करता है, सुराज का संकल्प लेता है, सुशासन की तस्वीर दिखाकर उसका वादा करता है, अपने कहे को यथार्थ के धरातल पर उतारकर दिखलाता है, जनता जिसकी एक झलक पाने को उसकी ऒर खिंची चली आती है; ऐसे नेता को यदि मीडिया तवज्जो देता भी है तो कोई अति नहीं करता| मीडिया तो राहुल गांधी के दलित घर में भोजन के प्रपंच को भी स्थान देता है| तब क्यों इन कांग्रेसियों की जुबान पर ताले पड़ जाते हैं? दरअसल अपना दामन किसी को भी साफ़ लग सकता है| यह मानवीय स्वभाव भी है और कांग्रेस की दुर्गति देखकर इसमें उबाल आना स्वाभाविक है| यह कहने में कोई गुरेज नहीं होता कि कांग्रेस अब देश में कांग्रेस एक ऐसी डूबती नाव बन गई है जिसकी सवारी करना शायद ही कोई पसंद करे? किन्तु तरस आता है उन नेताओं पर जो राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी से बड़ा व्यक्तित्व करार देते रहते हैं| उनके अनुसार २०१४ के लोकसभा चुनाव के पश्चात राहुल का कथित करिश्मा एक बार पुनः जनता के सर चढ़कर बोलने वाला लगा है| हालांकि विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में आम जनता कांग्रेस और राहुल दोनों को नकार रही है| कुछ अपवादों को यदि परे रख दिया जाए तो राहुल राजनीति में अब तक अपरिपक्व ही नज़र आए हैं| पिछले वर्ष उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में चुनावी जनसभा को सम्बोधित करते वक़्त मंच से समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र को फाड़ने से लेकर दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को घटिया बताकर तार-तार करने से वे अपनी पार्टी के चाटुकारों की नज़र में राष्ट्रीय नायक हो सकते हैं किन्तु आम जनता की नज़र में यह छिछोरापन ही है| मात्र बाहों पर कुर्ते को बार-बार चढ़ाकर बनावटी आक्रोश दिखाना आपको जनता का हितैषी होने का प्रमाण पत्र नहीं देता| देश के समक्ष जितने भी ज्वलंत मुद्दे आए हैं, उनमें राहुल की चुप्पी कई कयासों को जन्म देती है| फिर भी यदि चाटुकारों और चरणवंदकों की दृष्टि में वे लोकप्रियता के तमाम मापदंडों पर खरे उतरते हैं तो यह कांग्रेस पार्टी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा|
अब जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में अधिक वक़्त नहीं बचा है; सुनते हैं कि अक्टूबर 2024 में विपक्ष इंडिया गठबंधन विधिवत राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर सकती है| देखा जाए तो यह पहले से तय था और इस सम्भावित घोषणा पर कोई आश्चर्य भी नहीं है किन्तु सवाल यह उठता है कि देश एक बार फिर वंशवाद का दंश आखिर क्यों बर्दाश्त करे? 2024 लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की जीत पर पार्टी की सर्वेसर्वा होने के नाते सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री पद पर दावा पुख्तानहीं है | हालांकि विदेशी मूल का मुद्दा उन्हें इस पद से दूर कर गया और देश को अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मिला किन्तु चाटुकारों की फ़ौज़ ने इसे भी उनकी अंतरात्मा की आवाज बताकर प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी| यदि एक बार मान भी लें कि सोनिया गांधी ने अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुना और कथित रूप से त्याग की प्रतिमूर्ति बन बैठीं तो अब उनका त्याग कहां गया? क्या वर्तमान में पुत्र मोह में वे इतनी भ्रमित हो गई हैं कि पुनः जनता पर वंशवाद थोप रही हैं? दरअसल 2024 के पूर्व वर्षों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जानबूझ कर अपदस्त और अपमानित करने का जो षड़यंत्र १० जनपथ से चल रहा था उससे तो यही जान पड़ता है| सोनिया के इशारे पर उनके ख़ास लोग भी मनमोहन सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर सवालिया निशान लगाते रहे हैं| हालांकि 2014 के पूर्व 10 वर्षों से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन मनमोहन सिंह इतनी राजनीतिक समझ को पैदा कर चुके हैं कि वे सत्ता के त्रिकोण को बखूबी साध रहे चुके है| सोनिया को शायद इसका अनुमान न रहा हो किन्तु मनमोहन सिंह का सत्ता केंद्र बने रहना एक बार फिर नरसिम्हाराव के कार्यकाल की याद दिलाता है| राव ने सोनिया को राजनीति के ऐसे-ऐसे पाठ पढ़ाए थे कि उन्होंने पुत्र-पुत्री समेत इटली जाने का निर्णय ले लिया था| चूंकि मनमोहन राव जितने राजनीतिक दक्ष नहीं हैं अतः राहुल की राजनीतिक नासमझी व उद्दंडता को भी अपने ऊपर झेलते रहे| उनका एहसान मानना तो दूर; सोनिया अब उनकी राजनीतिक शहादत को युवराज के पक्ष में भुनाना चाहती हैं| सत्ता को ज़हर मानने वाली सोनिया अब अचानक ही राहुल को विषपान करवाना चाहती हैं तो आखिर इसके निहितार्थ क्या हैं? देखा जाए तो यह गांधी-नेहरू वंश का सत्ता के शीर्ष पर काबिज रहने का दम्भ ही है कि राजीव गांधी,नरसिम्हाराव और डा मनमोहन सिंह के बाद अब राहुल को देश पर थोपा जाना उचित नहीं है|
कांग्रेसियों के वादों और दावों के बीच यदि राहुल की सम्भावित ताजपोशी 2024 में हो जाती है तो उनका मुकाबला मोदी से होना तय है| ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल अब मोदी का सामना करने में सक्षम होंगे| फिलहाल तो यह दूर की कौड़ी लगता है| देश की नज़र में ही नहीं वरन विदेशी मीडिया और राजनीतिक क्षेत्र में भी राहुल की भद पिटती रही है| कुछ समय पूर्व ब्रिटेन की द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने राहुल की काबिलियत पर सवाल उठाते हुए उन्हें एक समस्या तक करार दे दिया था| द राहुल प्रॉब्लम शीर्षक से लिखे लेख में संसद में उनकी भागीदारी और बोलने से बचने का जिक्र करते हुए उन्हें भ्रमित व्यक्ति भी बताया गया। पत्रिका ने अभी तक सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाने की राहुल की आदत को उनकी योग्यता से जोड़ दिया। पत्रिका का दावा था कि एक नेता के तौर पर राहुल अब तक अपनी योग्यता साबित करने में नाकाम रहे हैं। वह शर्मीले हैं और पत्रकारों व राजनीतिक विरोधियों से बात करते हुए झिझकते हैं। संसद में आवाज बुलंद करने में भी राहुल पीछे हैं। कोई नहीं जानता कि राहुल गांधी के पास क्या क्षमता है? अपनी पढ़ाई, लंदन में किए गए काम को छिपाने और उस पर रक्षात्मक रहने के लिए भी कांग्रेस महासचिव पर सवाल खड़े किए गए| एक भारतीय पत्रकार की राहुल पर लिखी किताब का हवाला देते हुए कहा तक कहा गया कि कांग्रेस महासचिव ने अभी तक यूथ विंग और विधानसभा चुनावों में ही पार्टी का नेतृत्व किया है। यही नहीं, दोनों ही मोर्चो पर उन्हें खास सफलता भी नहीं मिली। द इकोनॉमिस्ट पत्रिका की राहुल के बारे में चाहे जो राय हो किन्तु इससे इंकार नहीं है कि राहुल हैं है ऐसे| वे समस्याओं को बतलाते हैं पर उनका समाधान उन्हें नहीं सूझता| भविष्य के भारत का भी उनके पास कोई खाका नहीं है| कभी अपनी दादी और पिता की शहादत को भुनाने की कोशिश तो कभी १२५ करोड़ जनता का रहनुमा कहलाने की राजनीति; राहुल हर मोर्चे पर विफल साबित हुए हैं| और उनकी इतनी विफलताओं के बाद जनता आश्वस्त है कि मोदी-राहुल की टकराहट में जीत मोदी की ही होगी और उनकी खूबियों का बखान करना जायज नहीं है| जनता का अपार समर्थन ही इस तथ्य की पुष्टि कर देता है|

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