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(भाग:207) ईश्वर के अस्तित्व से जुड़ने का यह है सबसे सरल तरीका?परमात्म प्रकृति की रहस्यमयी शक्तियां

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भाग:207) ईश्वर के अस्तित्व से जुड़ने का यह है सबसे सरल तरीका?परमात्म प्रकृति की रहस्यमयी शक्तियां

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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धरातल धरती की मिट्टी में वृक्ष और वनस्पतियां,अन्न जल वायू उत्पन्न होती हैं। इनसे प्राणीजगत को अन्न,फलफूल,अमृत औषधियां मिलती है, जो हमारे शरीर को बनाता है। प्रकृति के साथ जो गंध और ध्वनि है, वह सदैव हमें करुणा और सेवा भाव से जोड़ता है। पर्वत और उसकी जलधाराओं के कारण प्रकृति समृद्ध बनती है, पृथ्वी की एकता प्रगाढ़ होती हैं।
देवत्व को प्रकट करने और उसके अस्तित्व के साथ स्वयं को जोड़ने का एकदम सरल उपाय है कि हम प्रकृति के अनुरूप दिनचर्या को अपना लें। ईश्वर कोई व्यक्ति, कोई वस्तु या हमारी परिभाषा में गढ़ा कोई विचार नहीं है। वह अस्तित्व का अनंत विस्तार और उसकी पावनता है, जो हरेक पल और हर जगह मौजूद है। ऐसे में जब हम धरती के अवयवों- मिट्टी, जल, वनस्पति और वायु से खुद को जोड़ते हैं तो हम स्वयं को देवत्व से जोड़ते हैं। धरती महज मिट्टी की संरचना नहीं, प्राणवान ऊर्जा है जो सृजन करती है और सहारा देती है। धरती की पोषण शक्ति अनंत है, वह विश्वंभरा है।

प्रकृति की अदभुत शक्तियां

धरती की मिट्टी में वृक्ष और वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं। इनसे प्राणीजगत को अन्न मिलता है, जो हमारे शरीर को बनाता है। प्रकृति के साथ जो गंध और ध्वनि है, वह सदैव हमें करुणा और सेवा भाव से जोड़ता है। पर्वत और उसकी जलधाराओं के कारण प्रकृति समृद्ध बनती है, पृथ्वी की एकता प्रगाढ़ होती हैं। ऋतुओं और मेघों से जुड़े मौसम का परिवर्तन सामाजिक जीवन को आनंद से भर देता है। भूमि के जल और अन्न, ऋतुओं के राग और रंग में घनिष्ठ संबंध है।

वनस्पति और मनुष्य इस धरती की संतान हैं। दोनों अडिग भाव से मातृसेवा में लगे हैं और माता भी अपने पुत्रों का सदैव भरण-पोषण करती है। धरती के कारण ही मनुष्य और वनस्पति दोंनों दीर्घजीवी हैं। परस्पर आश्रित होने के कारण दोनों विकसित होते हैं। पर्वतों की गोद, नदियों के संगम, अरण्य के गहवरों में मनुष्य के मन चिंतनशील होते हैं। वह प्रकृति की रहस्यमयी शक्ति का चिंतन करता हैं। चिंतन के पश्चात देवदार, बरगद, पीपल, आम, शाल और केला जैसे विशाल और पवित्र वृक्षों के साथ व्यक्ति अपना संबंध जोड़ता है, उनसे ज्ञान प्राप्त करता है और उन्हें सम्मान देता है। इससे वृक्ष देवता की परिकल्पना होती है।

हमारे मन में लताओं, पुष्पों और जल तथा वायु का भी बड़ा स्थान है। ये प्राणी का प्रकृति के प्रति एक आदर भाव बनाते हैं। ऐसे ही उदात्त भावों के कारण यह भावना बनी कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यदि जन का यह भाव और आगे बढ़ता जाए तो उसकी चेतना की प्राणवायु में देवत्व का संचार हाता जाएगा और व्यक्ति पृथ्वी से आकाश तक छा जाएगा। जहां भी दिव्यता दिखी, वहां देवत्व को प्रतिस्थापित कर दिया। जहां सृजन, शक्ति और साधना का केंद्र मिला, उसे देवस्थान बना दिया। हिमालय देवभूमि है, वहां कैलाश पर शिव अखंड समाधि में अवस्थित हैं, तो बदरी विशाल में श्रीकृष्ण तपरत रहे। गंधमाधन पर्वत की चोटी पर नर-नारायण साधनरत है। धरती के हरेक स्थान को देवत्व से जोड़ने के लिए शिव, विष्णु, शक्ति से स्थलों को जोड़ दिया गया।

जो हमारे जीवन को भरती है, पुष्ट करती है और स्वस्थ रखती है, वह प्रकृति है। प्रकृति क्या है? नदियों में निरंतर बहने वाला जल, आकाश में सदा बहने वाली वायु, सूर्य का नित्य प्रति मिलनेवाला तेज, हर ऋतु के अनुसार अन्न, फल और मधु देनेवाली पृथ्वी, निर्बाध विचरण का अवसर प्रदान करनेवाला आकाश ही प्रकृति है। ये सब हमारे मन और काया को प्रसन्न रखने के लिए हैं। जब हम प्रकृति के इन गुणों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं तो हम प्रकृतिमय हो जाते हैं। यह प्रकृति ही ईश्वर है, जो हमें धारण करता है

प्रकृति परमात्म परम दाता है और प्रकृति विनाशक भी है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? क्यों और क्यों नहीं?
जी हाँ मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ क्योंकि गीता में लिखा है कि “मैं प्रकृति ही किसी भी चीज के अस्तित्व में होने या इसके विनाश के लिए केवल मैं औऱ मैं ही जिम्मेदार हूँ ”। इसके अलावा जीवविज्ञान भी इस बात को सही ठहराता है क्योंकि किसी भी जीव का अस्तित्व केवल प्रकृति के चयन द्वारा ही किया जाता है। उदहारण के लिए डायनासोरो के अस्तित्व को प्रकृति ने अस्वीकार कर दिया था इसलिए आज डायनासोर का अस्तित्व ही नहीं रह गया है ।क्योंकि वे प्रकृति के अनुसार अपने आप को ढाल नहीं पाए थे। अतः किसी भी चीज के लिए प्रकृति ही परमदाता है और प्रकृति ही विनाशक है।तो नम्रता जी मैं आशा करता हूँ कि आपको आपके सवाल का उत्तर मिल गया है।

प्रकृति हर किसी को कुछ न कुछ विशेष गुण देती है, क्या आप इस बात से सहमत हैं?
बहुत अच्छा प्रश्न किया है आपने, यह बात सच है कि जिंदा रखने के लिए प्रकृति सभी को कुछ ना कुछ विशेष गुण अवश्य देती है। जो कुछ भी आगे लिख रहा हूं उसे अपने कर्मों का फल मान लें या कुछ और क्योंकि प्रकृति बिना किसी कारण के किसी से कुछ नहीं छीनती बल्कि सबको कुछ ना कुछ अवश्य देती है।
1. प्रकृति से जिसे रंग रूप नहीं मिला उसे दिल खोलकर बुद्धि और विवेक दिया है।

2. प्रकृति से जिसे आंखें नहीं मिलीं या जिसने अपनी आंखें खो दी हैं उसे आंतरिक चक्षु दिए हैं।

3. प्रकृति से जिसे आवाज नहीं मिली उसे इशारों की भाषा से बात करने में पारंगत कर दिया।

4. प्रकृति से जिसको सुनने की क्षमता नहीं मिली उसे इशारों की भाषा समझने की गजब की क्षमता दी है।

5. जिसके किसी कारण बस पैर नहीं काम करते उसके हाथों में ही पैरों जैसी शक्ति भर दी।

6. जिसके किसी कारण बस हाथ खराब है तो उसके पैरों में हाथों जैसी कला भर दी।

7. किसी की आवाज में रस घोल दिया, तो किसी की बातों में जादू डाल दिया, किसी को बहुत ज्ञानी बना दिया, तो किसी को धनवान बना दिया, किसी को निर्धन बना दिया तो उसमें ईमानदारी कूट-कूट कर भरदी, जिसके पास औलाद नहीं है तो उसे सब सुख और करोड़पति बना दिया।

प्रकृति का खेल निराला है एक बात सोच कर हमेशा हैरान हो जाता हूं कि आखिर प्रकृति किस तरह से पूरे ब्रह्मांड को संचालित करती है जिसका एक छोटा सा नमूना मैं आपसे साझा करना चाहता हूं-

प्रकृति ने जिसे पेट दिया उसे ज्यादा धन नहीं दिया, और जिसे बहुत सारा धन दिया तो उसका पेट छीन लिया,

अर्थ- गरीब और मजदूर जिनकी पाचन शक्ति बहुत अच्छी है और अच्छा अच्छा खानें की बहुत ज्यादा इच्छा रखते हैं किंतु उनके पास इतना धन नहीं होता कि वे मनचाहा खाना खा सकें।

और जिनके पास करोड़ों अरबों की संपत्ति है उनकी पाचन शक्ति खत्म हो चुकी है और जब वे डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर उनसे साफ कह देता है कि दूध खा नहीं सकते, मलाई खा नहीं सकते, हाई कैलोरी वाला भोजन खा नहीं सकते, तीखा चटपटा आदि खा नहीं सकते, पिज़्ज़ा बर्गर आदि खा नहीं सकते केवल करेले और लौकी का जूस या उबली हुई सब्जियां ही खानें के लिए बोल दिया जाता है।

यानि कि जिनके पास अथाह संपत्ति है वे रोगों के कारण नहीं खा सकते और जिसके पास धन नहीं है वे धन की कमी के कारण नहीं खा सकते, क्या रचाने वाले ने खूब रचना रचाई है।

यदि प्रकृति इसे उल्टा कर देती गरीब को अमीर का धन दे देती या अमीर को गरीब का पेट, तो दुनियां में कोई चीज नहीं बचती जो सेव संतरे और केले बाजार में रखे दिखाई देते हैं वे सब बाजार से गायब हो जाते। क्योंकि जिसके पास पेट है उसके पास धन नहीं और जिसके पास धन है उसके पास पेट नहीं, मैं आपके विचारों से पूर्ण रूप से सहमत हूँ

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