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(भाग:209) माघ मकर रवि जब होई मकर संक्रांति पर गंगासागर मे स्नान का महत्व

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भाग:209) माघ मकर रवि जब होई मकर संक्रांति पर गंगासागर मे स्नान का महत्व?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्टमो•0822550220

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सनातन हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार साल की 12 संक्रान्तियों में मकर संक्रान्ति का सबसे महत्व ज्यादा है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य मकर राशि में आता हैं और इसके साथ देवताओं का दिन शुरु हो जाता है। गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु समुद्र को नारियल और यज्ञोपवीत भेंट करते हैं।
भारत के तीर्थों में गंगासागर एक महातीर्थ हैं। मकर संक्रान्ति पर यहां प्रतिवर्ष बहुत बड़ा मेला लगता है। जिसमें दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु गंगा सागर स्नान के लिए आते हैं। गंगासागर की तीर्थयात्रा सैकड़ों तीर्थयात्राओं के समान मानी जाती है। भारत में सबसे पवित्र गंगा नदी गंगोत्री से निकल कर पश्चिम बंगाल में सागर से मिलती है। गंगा का जहां सागर से मिलन होता है उस स्थान को गंगासागर के नाम से जाना जाता है। इस स्थान को सागरद्वीप के नाम से भी जाना जाता है।
पश्चिम बंगाल 24 परगना जिला में स्थित गंगासागर में मकर संक्रांति के दिन स्नान करने का विशेष महत्व है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन गंगासागर में जो श्रद्धालु एक बार डुबकी लगाकर स्नान करता है उसे 10 अश्वमेध यज्ञ और एक हजार गाय दान करने का फल मिलता है. गंगासागर मकर संक्रांति का यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है।
मकर संक्रांति के दिन को स्नान, दान और ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. इस दिन किसी भी नदी और समुद्र में स्नान कर दान-पुण्य करके प्राणी कष्टों से मुक्ति पा सकता है, लेकिन गंगासागर में किया गया स्नान कई गुना पुण्यकारी माना जाता है,
मकर संक्रांति पर्व इस वर्ष 15 जनवरी को मनाया जाएगा
गंगासागर में स्नान करने का है विशेष महत्व
मकर संक्रांति इस वर्ष 15 जनवरी को मनाया जाएगा. मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी या गंगासागर में स्नान करने की परंपरा है. इस दिन किसी भी नदी और समुद्र में स्नान कर दान-पुण्य करके प्राणी कष्टों से मुक्ति पा सकता है लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने से सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं. अगर आप गंगा स्नान के लिए नहीं जा सकते हैं तो घर में ही नहाने के पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान कर सकते हैं. इस दिन पानी में काले तिल डालकर स्नान करने का भी महत्व है. इस दिन गंगा स्नान से जुड़ी बहुत ही महत्वपूर्ण पौराणिक घटना है. मकर संक्रांति के दिन ही मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया था.
पौराणिक कथा
शास्त्रों की मान्यता के अनुसार दैविक काल में कपिल मुनि गंगासागर के समीप आश्रम बनाकर तपस्या करते थे. उन दिनों राजा सगर की प्रसिद्धि तीनों लोकों में छाई हुई थी. सभी राजा सगर के परोपकार और पुण्य कर्मों की महिमा का गान करते थे. यह देख स्वर्ग के राजा इंद्र बेहद क्रोधित और चिंतित हो उठे. इसी दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया. इंद्र देव ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया.
श्राप से जलाकर भस्म कर दिया
अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चोरी होने की सूचना पर राजा सगर ने अपने 60 हजार पुत्रों को उसकी खोज में लगा दिया. वे सभी पुत्र घोड़े को खोजते हुए कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंच गए. वहां पर उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा देखा. इस पर उन लोगों ने कपिल मुनि पर घोड़ा चोरी करने का आरोप लगा दिया. इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने राजा सगर के सभी 60 हजार पुत्रों को श्राप से जलाकर भस्म कर दिया.
क्षमा दान देने का निवेदन किया
राजा सगर भागते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और उनको पुत्रों को क्षमा दान देने का निवेदन किया. तब कपिल मुनि ने कहा कि सभी पुत्रों के मोक्ष के लिए एक ही मार्ग है, तुम मोक्षदायिनी गंगा को पृथ्वी पर लाओ. राजा सगर के पोते राजकुमार अंशुमान ने कपिल मुनि के सुझाव पर प्रण लिया कि जब तक मां गंगा को पृथ्वी पर नहीं लाते, तब तक उनके वंश का कोई राजा चैन से नहीं बैठेगा. वे तपस्या करने लगे. राजा अंशुमान की मृत्यु के बाद राजा भागीरथ ने कठिन तप से मां गंगा को प्रसन्न किया.

भगवान शिव को तप से प्रसन्न किया
मां गंगा का वेग इतना था कि वे पृथ्वी पर उतरतीं तो सर्वनाश हो जाता. तब राजा भगीरथ ने भगवान शिव को अपने तप से प्रसन्न किया ताकि वे अपनी जटाओं से होकर मां गंगा को पृथ्वी पर उतरने दें, जिससे गंगा का वेग कम हो सके. भगवान शिव का आशीर्वाद पाकर राजा भगीरथ धन्य हुए. मां गंगा को अपनी जटाओं में रखकर भगवान शिव गंगाधर बने.

मां गंगा पृथ्वी पर उतरीं

मां गंगा पृथ्वी पर उतरीं और आगे राजा भगीरथ और पीछे-पीछे मां गंगा पृथ्वी पर बहने लगी. राजा भगीरथ मां गंगा को लेकर कपिल मुनि के आश्रम तक लेकर आए, जहां पर मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया. जिस दिन मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष दिया, उस दिन मकर संक्रांति थी. वहां से मां गंगा आगे जाकर सागर में मिल गईं. जहां वे मिलती हैं, वह जगह गंगा सागर के नाम से प्रसिद्ध है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति को गंगासागर या गंगा नदी में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और पाप धुल जाता है.

भारत के तीर्थों में गंगासागर एक महातीर्थ हैं। मकर
संक्रान्ति पर यहां प्रतिवर्ष बहुत बड़ा मेला लगता है। जिसमें दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु गंगा सागर स्नान के लिए आते हैं। गंगासागर की तीर्थयात्रा सैकड़ों तीर्थयात्राओं के समान मानी जाती है। भारत में सबसे पवित्र गंगा नदी गंगोत्री से निकल कर पश्चिम बंगाल में सागर से मिलती है। गंगा का जहां सागर से मिलन होता है उस स्थान को गंगासागर के नाम से जाना जाता है। इस स्थान को सागरद्वीप के नाम से भी जाना जाता है।

कुम्भ मेले को छोडकर देश में आयोजित होने वाले तमाम मेलों में गंगासागर का मेला सबसे बड़ा मेला होता है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में इसकी चर्चा मोक्षधाम के तौर पर की गई है। जहां मकर संक्रान्ति के मौके पर दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु मोक्ष की कामना लेकर आते हैं और सागर-संगम में पुण्य की डुबकी लगाते है। कोरोना के कारण 2022 के मकर संक्रान्ति स्नान के अवसर पर यहां आने वाले लोगों की संख्या पहले की तुलना में कम ही रहेगी।
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पहले गंगासागर जाना हर किसी के लिये सम्भव नहीं होता था। तभी कहा जाता था कि सारे तीरथ बार-बार गंगासागर एक बार। हालांकि यह पुराने जमाने की बात है जब यहां सिर्फ जल मार्ग से ही पहुंचा जा सकता था। आधुनिक परिवहन साधनों से अब यहां आना सुगम हो गया है। पश्चिम बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले में स्थित इस तीर्थस्थल पर कपिल मुनि का मंदिर बना हुआ हैं। जिन्होंने भगवान राम के पूर्वज और इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के 60 हजार पुत्रों का उद्धार किया था। मान्यता है कि यहां मकर संक्रान्ति पर पुण्य-स्नान करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

गंगासागर में मकर संक्रान्ति से पन्द्रह दिन पहले ही मेला शुरू हो जाता है। मेले में दुनिया के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री, साधु-संत आते हैं और संगम में स्नान कर सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं। मेले की विशालता के कारण लोग इसे मिनी कुंभ मेला भी कहते हैं। मकर संक्रान्ति के दिन यहा सूर्यपूजा के साथ विशेष तौर कपिल मुनि की पूजा की जाती है।

ऐसी मान्यता है कि ऋषि-मुनियों के लिए गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन वर्जित होता है। भगवान विष्णु जी के कहने पर कपिलमुनि के पिता कर्दम ऋषि ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। उन्होने विष्णु भगवान से शर्त रखी कि भगवान विष्णु को उनके पुत्र रूप में जन्म लेंना होगा। भगवान विष्णु ने शर्त मान ली फलस्वरुप कपिलमुनि का जन्म हुआ जिन्हें विष्णु का अवतार माना गया।

आगे चल कर गंगा और सागर के मिलन स्थल पर कपिल मुनि आश्रम बना कर तप करने लगे। इस दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया। इस के बाद यज्ञ के अश्वों को स्वतंत्र छोड़ा गया। ऐसी परिपाटी है कि ये जहां से गुजरते हैं वे राज्य अधीनता स्वीकार करते है। अश्व को रोकने वाले राजा को युद्ध करना पड़ता है। राजा सगर ने यज्ञ अश्वों के रक्षा के लिए उनके साथ अपने 60 हजार पुत्रों को भेजा।

अचानक यज्ञ अश्व गायब हो गया। खोजने पर यज्ञ का अश्व कपिल मुनि के आश्रम में मिला। फलतः सगर पुत्र साधनरत ऋषि से नाराज हो उन्हे अपशब्द कहने लगे। ऋषि ने नाराज हो कर उन्हे शापित करते हुये अपने नेत्रों के तेज से भस्म कर दिया। मुनि के श्राप के कारण उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकी। काफी वर्षों के बाद राजा सगर के पौत्र राजा भागीरथ कपिल मुनि से माफी मांगने पहुंचे। कपिल मुनि राजा भागीरथ के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होने कहा कि गंगा जल से ही राजा सगर के 60 हजार मृत पुत्रों का मोक्ष संभव है। राजा भागीरथ ने अपने अथक प्रयास और तप से गंगा को धरती पर उतारा। अपने पुरखों के भस्म स्थान पर गंगा को मकर संक्रान्ति के दिन लाकर उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति दिलाई। यही स्थान गंगासागर कहलाया। इसलिए यहां स्नान का इतना महत्व है।
जानिये लोहड़ी पर्व का धार्मिक और सामाजिक महत्व तथा इससे जुड़ी परम्पराएँ
हिन्दू मान्यता के अनुसार साल की 12 संक्रान्तियों में मकर संक्रान्ति का सबसे महत्व ज्यादा है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य मकर राशिन में आता हैं और इसके साथ देवताओं का दिन शुरु हो जाता है। गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु समुद्र को नारियल और यज्ञोपवीत भेंट करते हैं। समुद्र में पूजन एवं पिण्डदान कर पितरों को जल अर्पित करते हैं। गंगासागर में स्नान-दान का महत्व शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है। मान्यतानुसार जो युवतियां यहां पर स्नान करती हैं। उन्हें अपनी इच्छानुसार वर तथा युवकों को स्वेच्छित वधु प्राप्त होती है। मेले में आये लोग कपिल मुनि के आश्रम में उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मन्दिर में गंगा देवी, कपिल मुनि तथा भागीरथ की मूर्तियां स्थापित हैं।

सुन्दरवन निकट होने के कारण गंगासागर मेले को कई विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है। तूफान व ऊंची लहरें हर वर्ष मेले में बाधा डालती हैं। इस द्वीप में ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां दलदल, जलमार्ग तथा छोटी छोटी नदियां, नहरें भी है। बहुत पहले इस स्थान पर गंगा जी की धारा सागर में मिलती थी। किंतु अब इसका मुहाना पीछे हट गया है। अब इस द्वीप के पास गंगा की एक बहुत छोटी सी धारा सागर से मिलती है। यह मेला पांच दिन चलता है। इसमें स्नान मुहूर्त तीन दिनों का होता है। यहां अलग से गंगाजी का कोई मंदिर नहीं है। मेले के लिये एक स्थान निश्चित है। कहा जाता है कि यहां स्थित कपिल मुनि का प्राचीन मंदिर सागर की लहरें बहा ले गयी थी। मन्दिर की मूर्ति अब कोलकाता में रहती है और मेले से कुछ सप्ताह पूर्व यहां के पुरोहितों को पूजा अर्चना के लिये मिलती है।

गंगासागर वास्तव में एक टापू है जो गंगा नदी के मुहाने पर स्थित है। यहां बंगला भाषी आबादी रहती है। यह पूरी तरह से ग्रामीण इलाका है। यहां आने वाले तीर्थयात्रियों के रहने के लिए यहां पर होटल, आश्रम व धर्मशालायें है। अब पूरे वर्ष लोग यहां लोगों का आवागमन लगा रहता है। कोलकाता से पूरे मार्ग में सडक बनी हुयी है मात्र 8 किलोमीटर पानी में नाव का सफर करना पड़ता है। गंगासागर में मकर संक्रांति के दिन 14 व 15 जनवरी को मुख्य मेला लगता है। जिसमें लाखों लोग स्नान करते हैं।

10 अश्वमेध यज्ञ और एक हजार गाय दान करने का फल मिलता है।
पश्चिम बंगाल में स्थित गंगासागर में मकर संक्रांति के दिन स्नान करने का विशेष महत्व है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन गंगासागर में जो श्रद्धालु एक बार डुबकी लगाकर स्नान करता है उसे 10 अश्वमेध यज्ञ और एक हजार गाय दान करने का फल मिलता है. इन्हीं कारणों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन गंगासागर में स्नान करने आते हैं.

मकर संक्रांति पर न करें ये काम
1. इस दिन भूलकर भी नहाने से पहले खाना नहीं चाहिए. सबसे पहले स्नान करें और फिर दान करें. इसके बाद भोजन करे.
2. मकर संक्रांति के दिन तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए.
3. मकर संक्रांति के दिन घर से किसी जरूरतमंद को खाली हाथ न लौटाएं. इस दिन दान अवश्य करें

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