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त्याग तपस्या व हजारों वर्षों की समाधि पर आदर्श दंपति कहे जाते हैं शिव-पार्वती?

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त्याग तपस्या व हजारों वर्षों की समाधि पर आदर्श दंपति कहे जाते हैं शिव-पार्वती?

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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देवाधिदेव भगवान शंकर भोलेनाथ और माता पार्वती के बीच कोई भी बात राज नहीं है. इसलिए शिव पुराण, भागवत और स्कंद पुराण में भगवान शिव और पार्वती की जोड़ी को आदर्श दंपति कहा गया है. शिव पुराण में तो इस जोड़ी को गृहस्थों के लिए प्रेरणास्रोत कहा गया है.

आत्मदाह, तांडव और हजारों वर्षों की समाधि के लिए भगवान शिव और पार्वती को आदर्श दंपति कहा जाता हैं।

पुराणों में भगवान शिव और पार्वती की जोड़ी को आदर्श दंपति कहा गया है. शिव पुराण में तो इस जोड़ी को गृहस्थ जीवन के लिए आदर्श तक कहा गया है. इसके पीछे मूल बात यही है कि ना तो माता सती भगवान शंकर से कोई बात छिपाती हैं और ना ही भगवान शंकर ही पार्वती के सामने किसी तरह का कोई राज रखते हैं. यहां तक कि कान में मिला गुरुमंत्र भी भगवान शंकर सहज ही माता पार्वती को बता देते हैं. इस दंपति में जुड़ाव ऐसा था कि एक बार तो माता पार्वती जब सती रूप में थीं, मायके में पति का उपहास उड़ाए जाने पर उन्होंने पिता को श्राप दे दिया था.

पति के उपहास से दुखी माता सती ने उसी समय खुद को योगाग्नि में भष्म कर लिया था. जब इसकी खबर करुणावतार भगवान शंकर को मिली तो वह भी अपनी मूल प्रवृति छोड़ कर रौद्र रूप धारण कर लिए थे. भगवान शंकर और पार्वती के दांपत्य जीवन की कथाएं शिवपुराण के अलावा स्कंद पुराण और श्रीमद् भागवत में कई जगह आती हैं. शिवपुराण की कथा के मुताबिक एक बार देवर्षि नारद ने माता पार्वती से कह दिया था कि भगवान शिव उन्हें प्यार नहीं करते. उस समय देवर्षि नारद को जवाब देते हुए माता पार्वती ने कहा था कि भोलेनाथ उन्हें इतना प्यार करते हैं कि वह कान में मिला गुरुमंत्र तक उन्हें बता देते हैं.

यही नहीं, समाधि में वह नारायण के जिस स्वरुप का दर्शन करते हैं, समाधि से बाहर आते ही उसका व्याख्यान कर देते हैं. इस जवाब पर नारद ने भी कह दिया कि यदि वह प्यार करते तो यह जरूर बता देते कि उनके गले में जो मुंडों की माला है, उसमें किसके मुंड हैं. यह बात माता पार्वती को लग गई और वह तत्काल समाधि में बैठे भगवान शिव के पास पहुंची. उन्होंने भगवान से पूछ लिया कि उनकी माला में किसके मुंड हैं. उस समय भगवान शंकर ने माता पार्वती के सभी रूपों का वर्णन किया. बताया कि यह मुंड उनके ही हर रूप के हैं, और उन सभी मुंडों को वह हमेशा अपने हृदय से लगाकर रखते हैं.

शिवपुराण में इसी से जुड़ा एक और प्रसंग है. इसमें एक बार माता सती बिना बुलाए अपने पिता राजा हिमाचल के यज्ञ में पहुंच गई थीं. उस समय वहां भगवान शिव का उपहास उड़ाया जा रहा था. यह देखकर माता सती क्रोधित हो गईं. उन्होंने तत्काल अपने पिता को श्राप दिया और दाहिने पैर के अंगूठे से योगाग्नि पैदा कर उसमें भष्म हो गई थीं. यह खबर जब नारद के जरिए भगवान शिव को मिली तो उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को पैदा किया, जिसने राजा हिमाचल के यज्ञ का विध्वंस कर दिया है।

कथा आती है कि उस समय करुणावतार भगवान शिव अपना मूल प्रवृति को छोड़ कर रौद्र रूप धारण कर लिया और तांडव करने लगे थे. सभी गुण और दोष से परे रहने वाले भगवान शिव भी माता सती का विरह में बेचैन हो गए थे. इसके बाद वह 87 हजार वर्षों के लिए समाधि में चले गए. बाद में राक्षसों के नाश और वंश उत्पत्ति के लिए देवताओं ने कामदेव के जरिए उनकी समाधि भंग कराई थी. हालांकि इसमें कामदेव को भी शिव के क्रोधाग्नि का सामना करना पड़ा था.

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