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(भाग:234) लंका विजय से पहले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को क्यों बदलनी पड़ी रामसेतु की जगह

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भाग:234) लंका विजय से पहले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को क्यों बदलनी पड़ी रामसेतु की जगह

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रीराम को लंकाविजय के लिए समुद्र सेतु बनाना पड़ा था. रामजी वानर सेना का गठन कर समुद्र तट पर पहुंचे तो यहां पुल निर्माण की संभावना न देखकर रामेश्वर कूच करना पड़ा.

रामायण के अनुसार भगवान राम को वनवास हुआ तो उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से शुरू करते हुए भारत के अंतिम छोर रामेश्वरम और इसके बाद लंका में रावण वध के साथ पूरी की. इस दौरान उनके साथ घटी घटनाओं के 200 से अधिक स्थलों की पहचान हो चुकी है, इसमें एक कोडीकरई जगह है. हनुमान, सुग्रीव से मुलाकात कर श्रीराम ने ऋष्यमूक पर्वत पर वानर सेना बुलाई और लंका की ओर चल पड़े. आगे चलकर कोडीराई में श्रीरामजी ने फिर वानर सेना का गठन किया. कोडीकरई में श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला और सभी सेना नायकों के साथ विचार विमर्श कर अलग-अलग सेनानायकों को जिम्मेदारी बांटी गई. श्री राम की सेना ने सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता. यह जगह पुल बनाने के लिए भी उचित नहीं है. इसके बाद श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया.

 

नाराज रामजी समुद्र सुखाने जा रहे थे

 

सेतु के लिए समुद्र में डाले जाने वाले पत्थर डूबने लगे तो रामजी ने सागर से प्रार्थना की. मगर समुद्र ने प्रार्थना नहीं सुनी तो इससे रामजी क्रोधित हो गए और उन्होंने सागर को सुखाने के लिए ज्यों ही दिव्य वाण को धनुष पर चढ़ाया तो सागर भगवान राम के चरणों में आ गिरे और क्षमा मांगी

 

जीत के बाद धनुष से सेतु को तोड़ दिया

 

धर्मग्रथों के अनुसार रावण के भाई, विभीषण के अनुरोध पर राम ने धनुष के एक सिरे से सेतु तोड़ दिया, जिससे नाम धनुषकोडी पड़ा. कहा जाता है कि राम ने प्रसिद्ध धनुष के एक छोर से सेतु के लिए इस स्थान को चिह्नित किया. मान्यताओं के हिसाब से यह पुल 5 दिन में तैयार हो गया था. कहा जाता है कि पहले दिन 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन का कार्य पूरा किया गया था.

दूरदर्शन अपने सबसे लोकप्रिय धारावाहिक रामायण का रीटेलीकास्ट कर रहा है। रामायण में लंका कांड चल रहा है और श्रीराम लंका पर चढ़ाई के लिए पुल बनवा रहे हैं। कालांतर में इस पुल को रामसेतु कहा जाने लगा। लोगों के मन मे इस सेतु को लेकर सदैव कौतुहल रहा है कि क्या वाकई उस जगह समुद्र पर कोई मानव निर्मित पुल है या नहीं।

 

रामसेतु जहां कथा कहानियों में काफी लोकप्रिय है वहीं पिछले कुछ सालों में इसकी वैज्ञानिकता को लेकर भी कई दावे हुए हैं। कई लोग इसे कल्पना मात्र बताते हैं, जबकि विदेशी वैज्ञानक इसकी प्रामाणिकता पर मुहर लगा चुके हैं।

 

रामसेतु के बारे में कुछ रोचक तथ्य

कहां है राम सेतु ?

 

भारत के दक्षिणपूर्व में रामेश्वरम और श्रीलंका के पूर्वोत्तर में मन्नार द्वीप के बीच चूने की उथली चट्टानों की चेन है। जिसे भारत में रामसेतु और दुनिया में एडम्स ब्रिज (आदम का पुल) के नाम से जाना जाता है। इस पुल की लंबाई की बात करें तो करीब 30 मील यानी 48 किमी है।

 

तुलसीदास कृत महाकाव्य ‘रामायण’ में लिखा है कि भगवान राम के लंका पर चढ़ाई के उद्देश्य हेतु रामसेतु का निर्माण भगवान राम की सेना में मौजूद वानर नल और नील ने किया था। इन भाइयों में नल शिल्पकार विश्वकर्मा के पुत्र थे। वानर सेना ने एक-एक पत्थर डालकर सेतु का निर्माण किया था। कहा जाता है कि नल और नील जिस पत्थर पर श्रीराम का नाम डालकर उसे पानी में डालते वो तैरने लगता।

 

मान्यताओं के अनुसार इस पुल का निर्माण 5 दिन में हुआ था। पुल की पूरी लंबाई 100 योजन थी। इसके साथ ही चौड़ाई 10 योजन की गई। इस सेतु का पहले दिन 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन का निर्माण किया गया था। आपको बता दें कि एक योजन में करीब 13 से 15 किमोमीटर होता है।

 

इतिहासकार और पुरातत्वविद क्या कहते हैं

बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट में इतिहासकार और पुरातत्वविद प्रोफ़ेसर माखनलाल कहते हैं कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कोरल और सिलिका पत्थर जब गरम होता है तो उसमें हवा कैद हो जाती है जिससे वो हल्का हो जाता है और तैरने लगता है। ऐसे पत्थरों को चुनकर ये पुल बनाया गया गया था। साल 1480 में आए एक तूफ़ान में ये पुल काफ़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। उससे पहले तक भारत और श्रीलंका के बीच लोग पैदल और साइकिल (पहियों) के ज़रिये इस पुल का इस्तेमाल करते रहे थे।

 

वैज्ञानिक प्रमाण

अमेरिकी आर्कियोलॉजिस्ट की टीम ने सेतु स्थल के पत्थरों और बालू के सैटेलाइट से मिले चित्रों का अध्ययन करने के बाद एक रिपोर्ट जारी की थी। जिसनें उन्होंने इसके अस्त‍ित्व के बारे में बताया।

 

इस रिपोर्ट के अनुसार रामसेतु’ के पत्थर और रेत पर किए गए टेस्ट से ऐसा लगता है कि पुल बनाने वाले पत्थरों को बाहर से लेकर आए थे और 30 मील से ज़्यादा लंबा ये पुल मानव निर्मित है। भू-वैज्ञानिकों का ये भी दावा है कि जिस रेत पर यह पत्थर रखा हुआ है ये कहीं दूर जगह से यहां पर लाया गया है। इसके साथ ही कहा कि रेत के निचले हिस्से का पत्थर 7 हजार साल पुराना है जबकि सैंड के ऊपरी हिस्से का पत्थर महज 4 हजार साल पुराना

वाल्मीकि रामायण कहती है कि जब श्रीराम ने सीता को लंकापति रावण से छुड़ाने के लिए लंका पर चढ़ाई की, तो उन्होंने नल और नील से एक सेतु बनवाया था. इस सेतु को बनाने वानर सेना ने नल और नील की मदद की थी. इस सेतु को पानी में तैरने वाले पत्थरों का इस्‍तेमाल कर बनाया गया था. इन पत्‍थरों को किसी दूसरी जगह से लाया गया था. कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस सेतु में ज्वालामुखी के ‘प्यूमाइस स्टोन’ का इस्‍तेमाल किया गया था क्‍योंकि ये डूबते नहीं हैं. फिर ऐसा क्‍या हुआ कि रामसेतु पानी में कुछ फुट डूब गया, जबकि उसके पथर हमेशा तैरने वाले थे? आज भी वहां से लाए गए पत्‍थर देश में कई जगह पर पानी में तैरते हुए मिल जाते हैं. ऐसा ही एक पथर उत्‍तर प्रदेश के बरेली के अलखनाथ मंदिर में पानी में तैर रहा है.

श्रीराम ने अपनी सेना के साथ लंका पर चढ़ाई करने के लिए धनुषकोडी से श्रीलंका तक समुद्र पर जिस पुल का निर्माण कराया, उसका नाम ‘नल सेतु’ रखा था. दरअसल, ये पुल नल के निरीक्षण में वानरों ने 5 दिन के भीतर बना दिया था. इसका जिक्र ‘वाल्मिकी रामायण’ में मिलता है. रामायण में इस पुल की लंबाई 100 योजन और चौड़ाई 10 योजन बताई गई है. गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण-कथा-सुख-सागर में वर्णन है कि श्रीराम ने सेतु का नाम ‘नल सेतु’ रखा. महाभारत में भी श्रीराम के नल सेतु का जिक्र आया है

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