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(भाग :241)लक्ष्मणजी के प्राण बचाने संजीवनी बूटी लेकर पहुंचे हनुमान?राम दल में छाया उत्साह।रामलीला मंचन

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भाग :241)लक्ष्मणजी के प्राण बचाने संजीवनी बूटी लेकर पहुंचे हनुमान?राम दल में छाया उत्साह।रामलीला मंचन

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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जब वैद्यराज सुषेण ने उनमें से संजीवनी बूटी को पहचान कर उसे पीस कर लेपन तैयार किया तब लक्ष्मण मृत्यु के मुख से बाहर निकल पाए। यह रामानन्द सागर की रामायण का एक मात्र ऐसा प्रसंग है जिसमें लक्ष्मण की मूर्छा को देखकर राम भी अपने आंसू रोक नहीं पाए थे।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लीला के मंचन में लक्ष्मण और मेघनाद के बीच घनघोर युद्ध होता है। लक्ष्मण घायल होकर मुर्छित हो जाते हैं। हनुमान जी लक्ष्मण जी को बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाते हैं, जिससे लक्ष्मण जी स्वस्थ हो जाते हैं। वहीं, श्रीराम हनुमान जी को गले लगा लेते हैं।

मंचन में रावण अंगद के संधि प्रस्ताव को ठुकरा देता है। इसके बाद राम और रावण की सेनाओं के बीच जबरदस्त युद्ध होता है। कई योद्धा मारे जाते हैं। मेघनाद युद्ध में ब्रह्मा द्वारा प्रदान की गई वीर घातनी शक्ति का प्रयोग करता है, जिससे लक्ष्मण मुर्छित हो जाते हैं। जामवंत की प्रेरणा से हनुमान जी हवा से बातें करते हुए द्रोणगिरी पर्वत पहुंचते हैं। रास्ते में रावण का भेजा हुआ कालनेमी उनका रास्ता रोकता है, लेकिन वह मारा जाता है। वहीं, संजीवनी की पहचान न होने पर हनुमान जी समूचा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं। संजीवनी बूटी पर्वत को लाते देख राम दल में उत्साह छा जाता है। संजीवनी बूटी लक्ष्मण जी को पिलायी जाती है। इससे वह तुरंत स्वस्थ हो जाते हैं। मंचन में अर्पित मुखरैया ने श्रीराम की, कृष्णा पांडेय ने लक्ष्मण की, अंश तिवारी ने भरत की, रमाशंकर रावत ने हनुमान की, राजू मिश्रा ने रावण की, ऋषभ यादव ने मेघनाद की, एनडी सेन ने कालनेमी की, प्रशांत ने जामवंत की, हरीमोहन दुबे ने विभीषण की भूमिका निभायी। निर्देशन शांतनू पांडेय ने किया। इस अवसर पर कमेटी के कार्यवाहक अध्यक्ष विकास खत्री, नरेंद्र कौशिक, गगन जैन, श्याम बिहारी मुखरैया, अजय कक्कड़, अर्जुन यादव, कोमल चंद्र जैन, कमलेश खरे, राकेश शर्मा, विजय पटैरिया आदि मौजूद रहे।

जब शबरी के बेर ने बचाई थी लक्ष्मण की युद्ध में जान

रामायण में एक किस्सा मिलता है जिसके अनुसार श्री राम ने माता शबरी के झूठे बेर खाए थे लेकिन लक्ष्मण जी ने उन बेरों को हाथ तक नहीं लगाया था। माना जाता है कि शबरी के उसी बेर के कारण लक्ष्मण जी के प्राण बचे थे।

रामायण में ऐसे कई किस्से हैं जो भक्त और भगवान के मनोरम प्रेम और आस्था को दर्शाते हैं। भगवान के प्रति भक्त की असीम भक्ति, अडिग विश्वास और निश्छल प्यार को दिखाते हैं। इन्हीं किस्सों में से एक पृष्ठ था माता शबरी और श्री राम का।

 

रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि श्री राम ने माता शबरी के भक्तिभाव में खोकर उनके झूठे बेर खाए थे लेकिन गौर करने वाली बता यह है कि लक्ष्मण जी को माता शबरी का श्री राम के प्रति यह भाव भाया नहीं था। इस घटना से वह इतने क्रोधित हो गए थे कि उन्होंने श्री राम की आज्ञा भी न मानी।

 

ज्योतिष एक्सपर्ट डॉ राधाकांत वत्स का कहना है कि लक्ष्मण भैय्या ने श्री राम के प्रति अपने अनुशासित लगाव के कारण माता शबरी के भोले प्रेम भाव को न समझा और श्री राम के कहने के बाद भी शबरी के झूठे बेर नहीं खाए। फिर कैसे शबरी के उसी बेर के कारण लक्ष्मण जी की युद्ध में बची थी जान।

 

रामायण के अनुसार, शबरी माता जब श्री राम को अपने झूठे बेर खिला रही थीं तब श्री राम ने उन बेरों को बड़े ही प्रेम से खाया था और लक्ष्मण जी से बात करने के दौरान उन बेरों को माता सीता द्वारा बनाए गए अनगिनत मिष्ठानों से भी मीठा बताया था। यह सुन लक्ष्मण जी विचलित हो उठे थे कि उनकी माता समान भाभी के लिए श्री राम (जानें कौन थी श्री राम की बहन) ऐसा कह रहे हैं।

इसलिए लक्ष्मण जी ने गुस्से में उन बेरों को हाथ तक नहीं लगाया था लेकिन जब श्री राम ने लक्ष्मण जी से बेर खाने को कहा तो उन्होंने एक बेर श्री राम के हाथों से लिया और उनकी नज़रों से बचाकर इतनी दूर फेंक दिया कि वह बेर द्रोणगिरी पर्वत पर जा गिरा। असल में यह श्री राम की लीला ही थी क्योंकि श्री राम को आगे होने वाली सभी घटनाओं का पता था।

श्री राम को पता था कि आगे चलकर उनका युद्ध रावण से होना वाला है और इसी युद्ध में रावण पुत्र मेघनाद और लक्ष्मण भैय्या का भयंकर संग्राम छिड़ेगा। इसलिए उन्होंने लक्ष्मण द्वारा जानबूझकर माता शबरी के बेर को द्रोणगिरी अर्वत पर फिकवाया था। दरअसल, माता शबरी का यही बेर श्री राम की महिमा से द्रोणगिरी पर्वत पर संजीवनी बूटी बन गया है।

इसी संजीवनी बूटी को हनुमान जी (जानें हनुमान जी की पत्नी और ससुर का नाम) तब लेने पहुंचे थे जब मेघनाद से युद्ध के दौरान शक्ति लगने के कारण लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे और उनके प्राण संकट में आ गये थे। हनुमान जी जब संजीवनी बूटी लाए और उस बूटी के कारण लक्ष्मण जी के प्राण बच गए, तब श्री राम ने लक्ष्मण भैय्या को इस घटना के माध्यम से प्रेम भक्ति का भाव समझाया और उन्हें प्रेम भक्ति की महिमा बताई।

चमोली जनपद में है द्रोणागिरी पर्वत जहां से हनुमान ले गये संजीवनी, जीव जगत की ८४ लाख योनियों का विवरण,हिन्दुओं के प्रमुख आराध्य देवों में से एक है, और सम्पूर्ण भारत में इनकी पूजा की जाती है। लेकिन बहुत काम लोग जानते है की हमारे भारत में ही एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ के रहवासी हनुमान जी द्वारा किए गए एक काम से आज तक नाराज़ हैं। यह जगह है उत्तराखंड के चमोली जनपद में अवस्थित द्रोणागिरि गांव।

द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है।

यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर पाबंदी है।

 

द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार जब हनुमान बूटी लेने के लिये इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी।

 

उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गये पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे।

जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ते बने। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं।

इस घटना से जुड़ा प्रसंग – यूँ तो राम के जीवन पर अनेकों रामायण लिखी गई है पर इनमे से दो प्रमुख है एक तो वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और एक तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस। इनमे से जहाँ वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है वही तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस सबसे अधिक पढ़ा जाता है।

रामायण और रामचरितमानस में अनेक घटनाओं में, कई प्रसंगो में अंतर है। ऐसा ही कुछ अंतर दोनों पुस्तकों में इस प्रसंग के संबंध में भी है। यहाँ हम आपको दोनों पुस्तकों में वर्णित प्रसंग के बारे में बता रहे है।

 

वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार

 

हनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर ले जाने का प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चलाकर श्रीराम व लक्ष्मण सहित समूची वानर सेना को घायल कर दिया। अत्यधिक घायल होने के कारण जब श्रीराम व लक्ष्मण बेहोश हो गए तो मेघनाद प्रसन्न होकर वहां से चला गया।

उस ब्रह्मास्त्र ने दिन के चार भाग व्यतीत होते-होते 67 करोड़ वानरों को घायल कर दिया था।हनुमानजी, विभीषण आदि कुछ अन्य वीर ही उस ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच पाए थे। जब हनुमानजी घायल जामवंत के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा – इस समय केवल तुम ही श्रीराम-लक्ष्मण और वानर सेना की रक्षा कर सकते हो।

तुम शीघ्र ही हिमालय पर्वत पर जाओ और वहां से औषधियां लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जामवंत ने हनुमानजी से कहा कि- हिमालय पहुंचकर तुम्हें ऋषभ तथा कैलाश पर्वत दिखाई देंगे। उन दोनों के बीच में औषधियों का एक पर्वत है, जो बहुत चमकीला है।

वहां तुम्हें चार औषधियां दिखाई देंगी, जिससे सभी दिशाएं प्रकाशित रहती हैं। उनके नाम मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी है।हनुमान तुम तुरंत उन औषधियों को लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान की बात सुनकर हनुमानजी तुरंत आकाश मार्ग से औषधियां लेने उड़ चले।

कुछ ही समय में हनुमानजी हिमालय पर्वत पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने हनुमानजी ने अनेक महान ऋषियों के आश्रम देखे। हिमालय पहुंचकर हनुमानजी ने कैलाश तथा ऋषभ पर्वत के दर्शन भी किए। इसके बाद उनकी दृष्टि उस पर्वत पर पड़ी, जिस पर अनेक औषधियां चमक रही थीं।

हनुमानजी उस पर्वत पर चढ़ गए और औषधियों की खोज करने लगे। उस पर्वत पर निवास करने वाली संपूर्ण महाऔषधियां यह जानकर कि कोई हमें लेने आया है, तत्काल अदृश्य हो गईं। यह देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने वह पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, जिस पर औषधियां थीं। कुछ ही समय में हनुमान उस स्थान पर पहुंच गए, जहां श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना बेहोश थी।

हनुमानजी को देखकर श्रीराम की सेना में पुन: उत्साह का संचार हो गया। इसके बाद उन औषधियों की सुगंध से श्रीराम-लक्ष्मण व घायल वानर सेना पुन: स्वस्थ हो गई। उनके शरीर से बाण निकल गए और घाव भी भर गए। इसके बाद हनुमानजी उस पर्वत को पुन: वहीं रख आए, जहां से लेकर आए थे।

 

तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार

 

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा चरित श्रीरामचरितमानस के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद व लक्ष्मण के बीच जब भयंकर युद्ध हो रहा था, उस समय मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाकर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया।

हनुमानजी उसी अवस्था में लक्ष्मण को लेकर श्रीराम के पास आए। लक्ष्मण को इस अवस्था में देखकर श्रीराम बहुत दु:खी हुए। तब जामवंत ने हनुमानजी से कहा कि लंका में सुषेण वैद्य रहता है, तुम उसे यहां ले आओ। हनुमानजी ने ऐसा ही किया।

सुषेण वैद्य ने हनुमानजी को उस पर्वत और औषधि का नाम बताया और हनुमानजी से उसे लाने के लिए कहा, जिससे कि लक्ष्मण पुन: स्वस्थ हो जाएं। हनुमानजी तुरंत उस औषधि को लाने चल पड़े। जब रावण को यह बात पता चली तो उसने हनुमानजी को रोकने के लिए कालनेमि दैत्य को भेजा।

कालनेमि दैत्य ने रूप बदलकर हनुमानजी को रोकने का प्रयास किया, लेकिन हनुमानजी उसे पहचान गए और उसका वध कर दिया। इसके बाद हनुमानजी तुरंत औषधि वाले पर्वत पर पहुंच गए, लेकिन औषधि पहचान न पाने के कारण उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और आकाश मार्ग से उड़ चले। अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत को लगा कि कोई राक्षस पहाड़ उठा कर ले जा रहा है। यह सोचकर उन्होंने हनुमानजी पर बाण चला दिया।

हनुमानजी श्रीराम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमानजी के मुख से पूरी बात जानकर भरत को बहुत दु:ख हुआ। इसके बाद हनुमानजी पुन: श्रीराम के पास आने के लिए उड़ चले। कुछ ही देर में हनुमान श्रीराम के पास आ गए। उन्हें देखते ही वानरों में हर्ष छा गया। सुषेण वैद्य ने औषधि पहचान कर तुरंत लक्ष्मण का उपचार किया, जिससे वे पुन: स्वस्थ हो गए।

श्रीलंका में स्थित है संजीवनी बूटी वाला पर्वत

जहां वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार हनुमान जी पर्वत को पुनः यथास्थान रख आए थे वही तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार हनुमान जी पर्वत को वापस नहीं रख कर आए थे, उन्होंने उस पर्वत को वही लंका में ही छोड़ दिया था। श्रीलंका के सुदूर इलाके में श्रीपद नाम का एक पहाड़ है।

मान्यता है कि यह वही पर्वत है, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटी के लिए उठाकर लंका ले गए थे। इस पर्वत को एडम्स पीक भी कहते हैं। यह पर्वत लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्रीलंकाई लोग इसे रहुमाशाला कांडा कहते हैं। ३० लाख बार वृक्ष योनि में जन्म होता है । इस योनि में सर्वाधिक कष्ट होता है ।धूप ताप,आँधी, वर्षा आदि में बहुत शाखा तक टूट जाती हैं ।शीतकाल में पतझड में सारे पत्ता पत्ता तक झड़ जाता हैl रस, रूप,स्पर्श ,गंध होता है पर वाक नही होती, स्थावर है जंगम नहीं।🌷

उसके बाद जलचर प्राणियों के रूप में ९ लाख बार जन्म होता है । हाथ और पैरों से रहित देह और मस्तक। सड़ा गला मांस ही खाने को मिलता है ।🌷

एक दूसरे का मास खाकर जीवन रक्षा करते हैं ।रस, रूप,स्पर्श,गंध होता है,वाक नहीं होती। स्थावर से जंगम हो जाते हैं।🌷

उसके बाद कृमि योनि में १० लाख बार जन्म होता है।

🍀और उसके उपरांत ११ लाख बार पक्षी योनि में जन्म होता है। वृक्ष ही आश्रय स्थान होते हैं ।जोंक, कीड़-मकोड़े, सड़ा गला जो कुछ भी मिल जाय, वही खाकर उदरपूर्ति करना।स्वयं भूखे रह कर संतान को खिलाते हैं और जब संतान उडना सीख जाती है तब पीछे मुडकर भी नहीं देखती । काक और शकुनि का जन्म दीर्घायु होता है ।रस, रूप,स्पर्श,गंध होता है। वाक नहीं प्राप्त होती ,खेचर हो जाते हैं।🍀

💐उसके बाद २० लाख बार पशु योनि,वहाँ भी अनेक प्रकार के कष्ट मिलते हैं ।अपने से बडे हिंसक और बलवान् पशु सदा ही पीडा पहुँचाते रहते हैं ।भय के कारण पर्वत कन्दराओं में छुपकर रहना। एक दूसरे को मारकर खा जाना । कोई केवल घास खाकर ही जीते हैं । किन्ही को हल खीचना, गाडी खीचना आदि कष्ट साध्य कार्य करने पडते हैं । रोग शोक आदि होने पर कुछ बता भी नहीं सकते।सदा मल मूत्रादि में ही रहना पडता है ।💐

🙏गौ का शरीर समस्त पशु योनियों में श्रेष्ठ एवं अंतिम माना गया है ।🙏

💎उसके बाद वैदिक धर्मशून्य अधम कुल में ,पाप कर्म करना एवं मदिरा आदि निकृष्ट और निषिद्ध वस्तुओं का सेवन ही सर्वोपरि है

🌺और सबसे अंत में ब्राह्मणकुल में जन्म मिलता है ।यह जन्म एक ही बार मिलता है ।जो ब्रह्मज्ञान सम्पन्न है वही ब्राह्मण है।अपने उद्धार के लिए वह आत्मज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है ।यदि इस दुर्लभ जन्म में भी ज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता तो पुनः चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है ।शास्त्र शरणागति के अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं है।

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