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(भाग:248) लंकाकाण्ड रामायण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और दशानन रावण के बीच घमासान युद्ध शुरु। राम लीला मंचन 

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भाग :248) लंकाकाण्ड रामायण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और दशानन रावण के बीच घमासान युद्ध शुरु। राम लीला मंचन

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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श्री लंकाकाण्ड में दशानन रावण और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के बीच घनघोर युद्ध शुरु हो गया है। हजारों असुर राक्षस सैनिक मारे जा रहे हैं। आकाश में हजारों चील और गीद्ध मंडराते नजर आ रहे हैं।

रावण ने अपने संबंधियों और पुत्रों को युद्ध करने भेजा, लेकिन राम जी और रावण के बीच अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया से युद्ध आरंभ होकर दशमी तिथि तक ही चला। कुल बत्तीस दिनों तक राम और रावण में युद्ध होता रहा, रावण ज्ञानी होने के साथ बहुत शक्तिशाली भी था। उसे मारना बहुत मुश्किल था।

लेकिन विभीषण ने प्रभु श्रीराम को बताया कि रावण को तभी मारा जा सकता है, जब उसकी नाभि पर प्रहार किया जाए। साथ ही विभीषण ने एक विशेष अस्त्र के बारे में भी बताया था। जिससे रावण को मारा जा सकता था। उसके बिना रावण को मारना असंभव था। जानते है क्या था वह अस्त्र और प्रभु श्री राम ने कैसे किया उसको प्राप्त हुआ है।

राम जी और रावण के मध्य चले युद्ध में दो प्रकार के धनुष की जिक्र मिलता है। एक जो प्रभु श्री राम का धनुष था, जिसे वह सदैव धारण करते थे। उसे कोदंड कहा जाता था, अर्थात् बांस का बना हुआ, यह धनुष बहुत आलौकिक था। इसे सिर्फ प्रभु श्रीराम धारण कर सकते थे। कहा जाता है कि इस धनुष से छोड़ा गया बाण अपने लक्ष्य को भेदकर ही वापस आता था। लेकिन राम जी सदैव अपने धनुष का उपयोग तभी करते थे, जब बहुत आवश्यक हो। परंतु रावण के वध इस धनुष से नहीं किया गया था। रावण के वध के लिए एक विशेष धनुष की आवश्यकता थी।

वह धनुष जिससे किया मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी ने किया रावण का वध किया था।

जब प्रभु श्री राम और रावण के बीच भीषण युद्ध होने लगा और रावण पर किसी अस्त्र का प्रभाव नहीं हो रहा था, रावण को मारना मुश्किल हो रहा था। तब विभीषण ने प्रभु श्री राम को बताया कि रावण को मारने के लिए एक विशेष अस्त्र की आवश्यकता है, नहीं तो यह युद्ध ऐसे ही चलता रहेगा। यह अस्त्र ब्रह्मा जी ने रावण को प्रदान किया है। जिसे महारानी मंदोदरी (रावण की पत्नी) के कक्ष में छिपाया गया है। लेकिन अब समस्या यह थी कि उस अस्त्र को प्राप्त कैसे किया जाए, तभी हनुमान जी ने ऐसे प्राप्त किया वह अस्त्र..

हनुमान जी ब्रह्मण के वेष धारण करके पहुंचे मंदोदरी के समक्ष(प्रतीकात्मक तस्वीर)

हनुमान जी ने वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण किया और महारानी मंदोदरी के समक्ष पहुंच गए। वे प्रसन्नता के साथ ब्राह्मणदेव के आदर सत्कार में लग गई। ब्राह्मण के वेश में आए हनुमान जी ने मंदोदरी से कहा कि विभिषण ने राम को उस विशेष दिव्यास्त्र के बारे में बता दिया है, जो आपके कक्ष में रखा है और जिससे रावण का वध किया जा सकता है। हनुमान जी ने कहा कि माते आपको वह अस्त्र कहीं छिपा देना चाहिए। मंदोदरी यब बात सुनकर घबरा गई, और वह तुरंत उस स्थान पर गई जहां पर अस्त्र छिपाकर रखा गया था। उस समय हनुमान जी ने अपना वेष धारण कर लिया और वे मंदोदरी से वह दिव्यास्त्र छीनकर आकाश मार्ग से वहां से चले गए।

पराक्रम-वर्णन, विभीषण-तिरस्कार, विभीषण का राम के पास गमन, विभीषण-शरणागति, समुद्र के प्रति क्रोध, नलादि की सहायता से सेतुबन्धन, शुक-सारण-प्रसंग, सरमावृत्तान्त, रावण-अंगद-संवाद, मेघनाद-पराजय, कुम्भकर्ण आदि राक्षसों का राम के साथ युद्ध-वर्णन, कुम्भकर्णादि राक्षसों का वध, मेघनाद वध, राम-रावण युद्ध, रावण वध, मंदोदरी विलाप, विभीषण का शोक, राम के द्वारा विभीषण का राज्याभिषेक, लंका से सीता का आनयन, सीता की शुद्धि हेतु अग्नि-प्रवेश, हनुमान, सुग्रीव, अंगद आदि के साथ राम, लक्ष्मण तथा सीता का अयोध्या प्रत्यावर्तन, राम का राज्याभिषेक तथा भरत का युवराज पद पर आसीन होना, सुग्रीवादि वानरों का किष्किन्धा तथा विभीषण का लंका को लौटना, रामराज्य वर्णन और रामायण पाठ श्रवणफल कथन आदि का निरूपण किया गया है।

 

इस काण्ड में 128 सर्ग तथा सबसे अधिक 5,692 श्लोक प्राप्त होते हैं। शत्रु के जय, उत्साह और लोकापवाद के दोष से मुक्त होने के लिए युद्ध काण्ड का पाठ करना चाहिए। इसे बृहद्धर्मपुराण में लंका काण्ड भी कहा गया है।

 

शत्रोर्जये समुत्साहे जनवादे विगर्हिते।

लंकाकाण्डं पठेत् किं वा श्रृणुयात् स सुखी

नारद जी कहते हैं- तदनन्तर श्रीरामचन्द्र जी के आदेश से अंगद रावण के पास गये और बोले- “रावण! तुम जनक कुमारी सीता को ले जाकर शीघ्र ही श्रीरामचन्द्र जी को सौंप दो। अन्यथा मारे जाओगे।” यह सुनकर रावण उन्हें मारने को तैयार हो गया। अंगद राक्षसों को मार-पीटकर लौट आये और श्रीरामचन्द्र जी से बोले- “भगवन! रावण केवल युद्ध करना चाहता है।” अंगद की बात सुनकर श्रीराम ने वानरों की सेना साथ ले युद्ध के लिये लंका में प्रवेश किया।

 

वानरों तथा राक्षसों का युद्ध

हनुमान, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान, नल, नील, तार, अंगद, धूम्र, सुषेण, केसरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन, गवाक्ष, दधिमुख, गवय और गन्धमादन- ये सब तो वहाँ आये ही, अन्य भी बहुत-से वानर आ पहुँचे। इन असंख्य वानरों सहित (कपिराज) सुग्रीव भी युद्ध के लिये उपस्थित थे। फिर तो राक्षसों और वानरों में घमासान युद्ध छिड़ गया। राक्षस वानरों को बाण, शक्ति और गदा आदि के द्वारा मारने लगे और वानर रख, दाँत, एवं शिला आदि के द्वारा राक्षसों का संहार करने लगे। राक्षसों की हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से युक्त चतुरंगिणी सेना नष्ट-भ्रष्ट हो गयी। हनुमान ने पर्वत शिखर से अपने वैरी धूम्राक्ष का वध कर डाला। नील ने भी युद्ध के लिये सामने आये हुए अकम्पन और प्रहस्त को मौत के घाट उतार दिया।

श्रीराम और लक्ष्मण यद्यपि इन्द्रजित के नागास्त्र से बंध गये थे, तथापि गरुड़ की दृष्टि पड़ते ही उससे मुक्त हो गये। तत्पश्चात् उन दोनों भाइयों ने बाणों से राक्षसी सेना का संहार आरम्भ किया। श्रीराम ने रावण को युद्ध में अपने बाणों की मार से जर्जरित कर डाला। इससे दु:खित होकर रावण ने कुम्भकर्ण को सोते से जगाया। जागने पर कुम्भकर्ण ने हज़ार घड़े मदिरा पीकर कितने ही भैंस आदि पशुओं का भक्षण किया। फिर रावण से कुम्भकर्ण बोला- “सीता का हरण करके तुमने पाप किया है। तुम मेरे बड़े भाई हो, इसलिये तुम्हारे कहने से युद्ध करने जाता हूँ। मैं वानरों सहित राम को मार डालूँगा।” ऐसा कहकर कुम्भकर्ण ने समस्त वानरों को कुचलना आरम्भ किया। एक बार उसने सुग्रीव को पकड़ लिया, तब सुग्रीव ने उसकी नाक और कान काट लिये। नाक और कान से रहित होकर वह वानरों का भक्षण करने लगा। यह देख श्रीरामचन्द्र ने अपने बाणों से कुम्भकर्ण की दोनों भुजाएँ काट डालीं। इसके बाद उसके दोनों पैर तथा मस्तक काट कर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। तदनन्तर कुम्भ, निकुम्भ, राक्षस मकराक्ष, महोदर, महापार्श्व, देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय युद्ध में कूद पड़े। तब इनको तथा और भी बहुत-से युद्ध परायण राक्षसों को श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण एवं वानरों ने पृथ्वी पर सुला दिया।

 

मेघनाद का वध

तत्पश्चात् मेघनाद (इन्द्रजित) ने माया से युद्ध करते हुए वरदान में प्राप्त हुए नागपाश द्वारा राम और लक्ष्मण को बाँध लिया। उस समय हनुमान के द्वारा लाये हुए पर्वत पर उगी हुई ‘विशल्या’ नाम की ओषधि से श्रीराम और लक्ष्मण के घाव अच्छे हुए। उनके शरीर से बाण निकाल दिये गये। हनुमान पर्वत को जहाँ से लाये थे, वहीं उसे पुन: रख आये। मेघनाद निकुम्भिला देवी के मन्दिर में होम आदि करने लगा। उस समय लक्ष्मण ने अपने बाणों से इन्द्र को भी परास्त कर देने वाले उस वीर को युद्ध में मार गिराया। पुत्र की मृत्यु का समाचार पाकर रावण शोक से संतप्त हो उठा और सीता को मार डालने के लिये उद्यत हो उठा; किंतु अविन्ध्य के मना करने से वह मान गया और रथ पर बैठकर सेना सहित युद्ध भूमि में गया। तब इन्द्र के आदेश से मातलि ने आकर श्रीरघुनाथ जी को भी देवराज इन्द्र के रथ पर बिठाया।

रामचरितमानस में प्रगतिशील काव्य सृजन के भी गुण हैं। भारत में भिन्न भिन्न विषयों पर अनेक ग्रंथ प्राचीनकाल से ही लिखे जा रहे हैं। लेकिन जीवन के सभी पहलुओं को समेटते हुए तुलसी की रामकथा सामान्य जनों में भी लोकप्रिय है। पुरोहित का काम राष्ट्रजागरण है। वेदों में कहा गया है – राष्ट्रे जाग्रयाम, वयं पुरोहितः। रामचरितमानस में आदर्श राज समाज के स्वप्न हैं। रामकथा में आदर्श राज्य की कल्पना भी है। राज्य के अनेक मॉडल बताए जाते हैं। मार्क्सवादी राज्य का मॉडल अलग है। समाजवादी राज्य की कल्पना भी अलग है। राज्य का एक मॉडल इस्लामी भी था। यह साम्प्रदायिक था। गैर मुस्लिमों के साथ भेदभाव वाला था। लेकिन रामराज्य की बात दूसरी है। संप्रति कुछ राजनेता मध्यकाल की सुंदर रचना रामचरितमानस पर घटिया ढंग से आक्रामक हैं। वह समाजवाद की बात करते हैं। वह रामचरितमानस उत्तरकाण्ड में वर्णित रामराज्य का अध्ययन नहीं करते। रामराज्य में भेदभाव नहीं है। रामराज्य में परस्पर प्रेम है। तुलसी लिखते हैं, ‘‘बयरु न कर काहू सन कोई/राम प्रताप विषमता खोई।‘‘ रामराज्य में गैर बराबरी नहीं है। समता के भाव में सब प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं।

तुलसी लिखते हैं, ‘‘अल्पमृत्यु नहि कउनू पीरा/सब सुंदर सब बिरुज शरीरा।‘‘ रामराज्य में अल्पमृत्यु नहीं। कोई पीड़ा नहीं। सब स्वस्थ हैं और निरोग हैं। तुलसी लिखते हैं कि, “रामराज्य में वृक्ष फूलों से भरे पूरे रहते हैं। लगातार फूल देते हैं। हाथी और सिंह तथा सभी पशु पक्षी परस्पर बैरभाव भुलाकर प्रेम से रहते हैं। – फूलहि फलहि सदा तरु कानन/खग मृग सहज बैरु बिसराई/सबहि परस्पर प्रीति बढ़ाई।‘‘ तुलसी का रामराज्य लोकमंगल से जुड़ा हुआ है। समुद्र मर्यादा में रहते हैं। सरोवर कमल से परिपूर्ण रहते हैं। वृक्ष इच्छा करने से ही मधुरस होते हैं। – लता विटप मांगे मधु चावहि। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनी आवश्यकता होती है।“ तुलसी के रामराज्य में ‘ग्लोबल वार्मिंग‘ नहीं है। मेघ इच्छानुसार वर्षा करते हैं। – मांगे वारिधि देहि जल रामचंद्र के राज। रामराज्य अद्भुत है। गाँधी जी रामराज्य पर मोहित थे। तुलसीदास के राम मनुष्य के साथ ईश्वर भी हैं। वे मनुष्य रूप में लीला करते हैं। वे आदर्श पुत्र हैं, आदर्श भाई हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। विजय के बाद लंका में अपना राज्य नहीं चलाते। रावण के भाई विभीषण को ही राजा बनाते हैं। राम और राम का चरित्र विश्वव्यापी है।

 

श्रीराम भारत के मन का उल्लास है। विज्ञान धन है। वे तेज हैं। आशा हैं। प्राण हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी बहुपठित विद्वान राजनेता थे। उन्होंने तमिल भाषा में “तिरुगमन रामायण“ लिखी। इसका अनुवाद उनकी पुत्री और गाँधी जी की पुत्रवधु लक्ष्मी देवदास गाँधी ने किया। राजाजी ने भूमिका में लिखा, ‘‘सियाराम हनुमान और भारत को छोड़ कर हमारी कोई गति नहीं। उनकी कथा हमारे पूर्वजों की धरोहर है। हम आज उसी के आधार पर जीवित हैं।‘‘ (हिंदी अनुवाद पृष्ठ 7) ‘‘यहाँ हम इसी आधार पर जीवित हैं‘‘ वाक्य महत्वपूर्ण है। “इसी आधार का“ अर्थ भारत की संस्कृति है। राम इस संस्कृति के महानायक हैं। इसलिए राम भारत का मन हैं। मर्यादा और आदर्श हैं। दुनिया की श्रेष्ठतम राजव्यवस्था का आदर्श रामराज्य है।

 

भारत का राष्ट्र जीवन अखण्ड रामायण है। राम भारतीय संस्कृति का जीवमान आदर्श हैं। रामकथा दुनिया की श्रेष्ठतम काव्यरचना है। श्रीराम भारत का धीरज और मर्यादा हैं। राष्ट्र का पौरुष और पराक्रम हैं। वह गाने योग्य गाथा हैं। रसपरिपूर्ण काव्य हैं। आनंदमगन करने वाले गीत भी हैं। भारत और भारतीय संस्कृति के अणु परमाणु में राम रमते हैं। दुनिया के किसी भी देश में रामकथा जैसी लोकव्यापी काव्य रचना नहीं है। ऐसी रामकथा और श्रीरामचरितमानस पर टिप्पणी करने वाले रामचरितमानस का भाव और अर्थ जानते हुए भी सस्ते प्रचार के लिए निंदित कर्म करते हैं।

 

रामचरितमानस में भारतीय चिंतन के अद्भुत प्रसंग हैं। उत्तरकाण्ड दर्शन से भरा पूरा है। सामान्यतया ज्ञान और भक्ति को अलग अलग माना जाता है। वस्तुतः दोनों एक हैं। तुलसीदास ने उत्तरकाण्ड में लिखा है, ‘‘भगतिहि ज्ञानहिं नहिं कछु भेदा – ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं है।‘‘ आगे लिखते हैं, “ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान यह सब पुरुष हैं। श्रीराम भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं। ज्ञान और भक्ति का अंतर अकथ है, ‘‘सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।‘‘ ज्ञानदीप का प्रसंग बार बार पढ़े जाने योग्य है। जीव ईश्वर अंश है। वह अविनाशी चेतन निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है। माया के वशीभूत होकर वह बंधा हुआ है। जड़ और चेतन में ग्रंथि है। यह गाँठ खुलती नहीं है। कभी कभी ईश्वर कृपा से यह संयोग बनता है और ग्रंथि खुल जाती है। लिखते हैं, “सात्विक श्रद्धा सुंदर गाय है। वह धर्मरुपी हरी घास खाती है। इस गाय से धर्ममय दूध दुह कर निष्कामभावरुपी अग्नि में पकाएं। फिर संतोष रुपी वायु से ठंडा करें। फिर धैर्य और मन निग्रह से दही जमाएं। प्रसन्नता की मथानी से दही मथें। वैराग्यरूपी मक्खन निकालें। योग अग्नि से ईंधन जलाएं। सब कर्मों को योग अग्नि में भस्म करें। ज्ञानरुपी घी को बुद्धि से ठंडा करें। फिर सत्व, रज और तम से रुई बनाकर उसकी बाती बनाएं। इस प्रकार विज्ञानमय दीप जलाएं। यह दीपशिखा ज्ञानप्रकाशक है।“ तुलसीदास जी ने इस रूपक द्वारा ज्ञान की महत्ता का वर्णन किया है।

 

वैदिक साहित्य में ज्ञान को श्रेष्ठ माना गया है। वैदिक पूर्वजों ने ज्ञान के दो रूप बताए हैं। एक विद्या दूसरा अविद्या। अविद्या का अर्थ अज्ञान नहीं है। सांसारिक विषयों की समझदारी अविद्या है और परमतत्व का ज्ञान विद्या कहा गया है। यजुर्वेद में दोनों की साधना बताई गई है। अविद्या के ज्ञान से संसार के कष्ट दूर होते हैं और विद्या से परासांसारिक आध्यात्मिक आनंद मिलता है। रामचरितमानस के लंकाकाण्ड में विजयश्री प्राप्ति के लिए एक सुंदर रथ का प्रतीक है। राम रावण युद्ध शुरू होने को था। रावण रथ पर था राम पैदल थे। यह स्थिति देखकर विभीषण बड़े भावुक हुए। तुलसीदास ने लिखा, ‘‘रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।‘‘ विभीषण ने राम से कहा कि आपके पास न रथ है न कवच है। आप विजयश्री कैसे पाएंगे। श्रीराम ने कहा विजयश्री दिलाने वाला रथ दूसरा है। शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिये हैं। सत्य और शील की पताका उस रथ पर है। बल, विवेक और इन्द्रिय निग्रह उस रथ के घोड़े हैं। क्षमा की डोरी से यह घोड़े रथ से जुड़े हुए हैं। ईश्वर भक्ति सारथी है। वैराग्य ढाल है। संतोष तलवार है। मन तरकश है। नियम बाण हैं। विद्वानों की श्रद्धा कवच है। तुलसी लिखते हैं, ‘‘महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होई दृढ़, सुनहु सखा मति धीर। जिसके पास ऐसा रथ है, इस संसार में वही विजयश्री पाता है।

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