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(भाग:264) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रजी द्धारा छोडा गया अश्वमेध यज्ञ का घोडा को लव-कुश ने पकडा

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भाग:264) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रजी द्धारा छोडा गया अश्वमेध यज्ञ का घोडा को लव-कुश ने पकडा

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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इसके बाद प्रभु श्री राम ने अयोध्या का राज्य संभालने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया और घोड़े के गले में लिखा गया कि इस घोड़े को कोई पकड़े अगर कोई घोड़े को पकड़ेगा तो उसे युद्ध करना होगा। उन दिनों बीर बालक लव-कुश इस स्थान पर आकर खेलते थे और युद्ध अभ्यास करते थे। जब उन्होंने यज्ञ का घोड़ा देखा तो उसे पकड़कर बांध लिया।

त्रेता युग के समय राम तलाई मंदिर में लव कुश ने प्रभु श्री राम जी के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा को पकडकर बांधा था।

कहा जाता है कि जीटी रोड स्थित रामतलाई मंदिर प्रभु श्री रामकालीन के समय त्रेता युग का है। इस मंदिर के बारे में वहां के पंडित घनश्याम सरूप ने बताया कि प्रभु श्री राम ने बनवास के बाद जब माता सीता का त्याग करके वन में भेजा तो वह रामतीर्थ स्थित महाऋषि भगवान वाल्मीकि जी के आश्रम में गईं और वहां पर लव-कुश बालकों ने जन्म लिया। इसके बाद प्रभु श्री राम ने अयोध्या का राज्य संभालने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया और घोड़े के गले में लिखा गया कि इस घोड़े को कोई पकड़े अगर कोई घोड़े को पकड़ेगा तो उसे युद्ध करना होगा। उन दिनों बीर बालक लव-कुश इस स्थान पर आकर खेलते थे और युद्ध अभ्यास करते थे। जब उन्होंने यज्ञ का घोड़ा देखा तो उसे पकड़कर बांध लिया। घोड़े के पीछे आए सैनिकों ने दोनों बालकों को घोड़े को छोड़ने के लिए कहा।

 

परंतु वह नहीं माने और घोड़े को अपने साथ रामतीर्थ स्थित आश्रम में ले गए। सैनिक ने इसकी जानकारी लक्ष्मण जी और हनुमान जी को दी। लक्ष्मण ने भी घोड़े को छोड़ने के लिए लवकुश को कहा, पर वे नहीं माने।

 

रामायण के पात्र लव व कुश भगवान श्रीराम व माता सीता के पुत्र थे जिनका जन्म महर्षि वाल्मीकि आश्रम में हुआ था। चूँकि ना वे अपने पिता भगवान श्रीराम के बारें में जानते थे कि अपनी माता सीता का असली नाम इसलिये श्रीराम उनके लिए केवल अयोध्या के राजा था। जब वे बड़े हो गए तब एक दिन उनकी माता सीता एक पूजा के लिए आश्रम से बाहर गयी थी। उनके गुरु वाल्मीकि जी भी आश्रम की सुरक्षा का भार लव कुश को सौंपकर (Luv उनकी माता के साथ गये थे।

उसी समय भगवान श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा चारों दिशाओं के राज्यों के चक्कर लगाकर वापस अयोध्या आ रहा था किंतु मार्ग में वाल्मीकि आश्रम भी पड़ता था। जब लव व कुश ने उस घोड़े को देखा तो उन्होंने उसे पकड़कर श्रीराम के राज्य को चुनौती दी थी लेकिन यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ना तो लव कुश किसी राज्य के राजा थे व ना ही उनकी भगवान श्रीराम से किसी प्रकार की दुश्मनी तो फिर उन्होंने यज्ञ का घोड़ा क्यों पकड़ा था। इसके दो मुख्य कारण जानना चाहते थे

 

 

लव कुश के द्वारा अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा पकड़ने के कारण जाना।

हालाँकि लव कुश अपनी माता का असली जीवन परिचय नही जानते थे लेकिन उन्हें अपने कुल का पता था। वे क्षत्रिय कुल से आते थे व क्षत्रियों का धर्म होता है शत्रु की चुनौती को स्वीकार करना व धर्म, देश व समाज की रक्षा करना। जब उन्होंने भगवान श्रीराम के अश्वमेघ घोड़े को देखा तो उस पर चुनौती लिखी हुई थी कि यह घोड़ा श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ का है व यह जहाँ-जहाँ से भी गुजरेगा वहां का राज्य श्रीराम के अधीन माना जायेगा। यदि किसी ने इस घोड़े को रोकने की चेष्टा की तो उसे श्रीराम की सेना से युद्ध करना होगा।

 

लव व कुश को इस चुनौती में अहंकार की झलक दिखी व साथ ही क्षत्रिय धर्म के अनुसार उन्हें युद्ध की चुनौती को स्वीकार करना चाहिए था। हालाँकि उनके पास सेना नही थी लेकिन कुछ दिन पहले ही महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें दैवीय अस्त्र प्रदान किये थे जो बहुत शक्तिशाली व दिव्य थे। इसी के बल पर उन्होंने श्रीराम की चुनौती को स्वीकार करते हुए यह घोड़ा पकड़ लिया।

लव व कुश के गुरु वाल्मीकि जी शुरू से ही उन्हें अयोध्या नरेश श्रीराम की कथा को सुना रहे थे व उन्हें संगीत के माध्यम से सिखा भी रहे थे ताकि एक दिन वे अयोध्या में जाकर वह कथा सभी को सुना सके। इसी कथा में उन्होंने माता सीता के त्याग व वनगमन के बारें में भी बताया। वाल्मीकि जी ने माता सीता के ऊपर अयोध्या की प्रजा के द्वारा किये गए अन्याय को विस्तारपूर्वक लव व कुश को बताया था।

 

लव कुश के मन में इसी को लेकर भगवान श्रीराम के प्रति रोष था कि आखिर क्यों उन्होंने सब सत्य जानते हुए भी अयोध्या की प्रजा के सामने झुककर अन्याय का साथ दिया व माता सीता को वन में भेज दिया। वे ऐसे ही कुछ प्रश्न श्रीराम से पूछकर उनका उत्तर जानना चाहते थे। इसी आशा में की भगवान श्रीराम स्वयं अपने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को मुक्त करवाने उनके पास आयेंगे तो वे उनसे वही प्रश्न पूछेंगे, उन्होंने वह घोड़ा पकड़ लिया था।

 

तो लव-कुश के द्वारा श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को पकड़ने के पीछे यही दो मुख्य कारण थे जिसके माध्यम से वे अपने मन की जिज्ञासा को शांत करना चाहते थे

आखिर युद्ध में लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। इसके बाद हनुमान जी को भी लवकुश ने बांध लिया और सेना को मूर्छित कर दिया। इसका पता जब प्रभु श्री राम को चला तो वह बालकों को देखने खुद इस स्थान पर पहुंचे। उस समय इस स्थान पर छोटा सा तालाब था, उसमें स्नान करने के बाद श्री राम ने दोनों बालकों को युद्ध के लिए ललकारा। पिता-पुत्रों के बीच युद्ध हो और मर्यादा बनी रही। इसलिए महाऋषि भगवान वाल्मीकि जी माता सीता को लेकर इस स्थान पर पहुंचे और सारी बात बताई। प्रभु राम ने इसी तालाब में से जल लेकर लक्ष्मण और सारी सेना पर छिड़क कर मूर्छना से मुक्त करके हनुमान जी को छुड़ाया।

प्रभु श्री राम के इस स्थान पर आने से इस स्थान का नाम ‘मंदिर श्री रामतलाई’ पड़ा। मान्यता है कि अगर किसी महिला को संतान का सुख प्राप्त नहीं होता तो वह सच्चे मन से 40 दिन इस पवित्र सरोवर में आकर स्नान करे तो उन्हें संतान प्राप्त होती है। वहीं मंदिर में बने श्री हनुमान जी की मूर्ति पर अगर कोई भक्तजन सवा पांच मीटर सूती कपड़ा चढ़ाए तो उसकी हरेक मनोकामना पूर्ण होती है।

 

मंदिर कमेटी ने किया जीर्णोद्धार

 

पंडितघनश्याम के मुताबिक पहले तो मंदिर की देखभाल कम ही होती थी। परंतु बाद में श्री रामतलाई कमेटी बनी जिसमें कमेटी के प्रधान पप्पू अरोड़ा, चेयरमैन केवल महाजन, रमेश शर्मा, अश्विनी कुमार समेत कई सदस्य हैं। उनकी तरफ से सरोवर और मंदिर की साफ-सफाई भी करवाई गई। पंडित जी ने बताया कि आस-पास जंगल होने के कारण आज भी एक बड़ा अजगर यहां आता है। परंतु वह किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। वह कभी शिवालय के शिवलिंग तो कभी श्री हनुमान जी के मंदिर में देखा जाता है।

 

(1) जीटी रोड स्थित श्री राम तलाई मंदिर में सुशोभित माता काली जी की मूर्ति। (2) मंदिर में स्थित रामकालीन पवित्र सरोवर। (3) जीटी रोड स्थित श्री राम तलाई मंदिर का बाहरी दृश्य।

 

पंडित घनश्याम ने बताया कि दिवाली के दिनों में हजारों की संख्या में साधु-संत इस मंदिर में आकर ठहरते हैं। कमेटी की ओर से इनके लिए भंडारा भी लगाया जाता है। मंदिर में श्री राम परिवार के साथ-साथ, श्री लक्ष्मी नारायण, श्री राधा-कृष्ण, माता वैष्णो देवी, काली माता, शिवालय, श्री हनुमान जी, श्री गणेश की काली मूर्तियों सहित कई विग्रह हैं। श्री हनुमान जी मंदिर में अखंड ज्योति कई सालों से जलती रही है और श्री रामचरित्र मानस पाठ भी निरंतर चलता रहता है

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