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भाग:267) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का भगवान विष्णु रुप में विलीन होकर साकेत-वैकुण्ठ धाम गमन

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भाग:267) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का भगवान विष्णु रुप में विलीन होकर साकेत-वैकुण्ठ धाम गमन

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साकेत धाम यानी वैकुण्ठ लोक गमन के समय उनकी उम्र कितनी थी? अर्थात दरअसल में वो करीब 112 दिव्य वर्षों तक जीवित रहे। श्रीराम और माता सीता के विषय मे वाल्मीकि रामायण मे कहा गया है कि देवी सीता श्रीराम से 7 वर्ष 1 माह छोटी थी। और मृत्यु के समय रावण की आयु 40,000 वर्ष थी।

भगवान विष्णु के गुप्त रूप से तपस्या करने के कारण इस स्थान का नाम गुप्तहरि तीर्थ पड़ा। वर्तमान समय में इसी को गुप्तार घाट कहते हैं। त्रेतायुग में भगवान राम यहीं से अपने बैकुंठ लोक प्रधारे थे। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को अयोध्या नगरी बहुत प्रिय है और यह उनकी पहली पुरी भी मानी जाती है।अयोध्या में श्रीराम से पहले आए थे यहां भगवान विष्णु, वर्षों तक की थी तपस्या, इसलिए कहते हैं इसे बैकुंठ लोक

 

अयोध्या में श्रीराम से पहले आए थे यहां भगवान विष्णु, वर्षों तक की थी तपस्या, इसलिए कहते

अयोध्या धाम आना प्रत्येक राम भक्त का सपना है। बड़े भाग्य से इस भूमि के दर्शन होते हैं। भगवान राम से पहले यहां श्री विष्णु सतयुग में जगत कल्याण के उद्देश से तपस्या करने आए थे। अयोध्या की इस जगह को भगवान नारायण का निवास स्थान बैकुंठ भी कह जाता है। यहां दर्शन मात्र से मिल जाता है

अयोध्या नाम सुनते ही आपके मन में प्रभु श्री राम का चिंतन आरंभ हो जाता होगा। आप सब अयोध्या को भगवान राम की जन्मस्थली के रूप में तो जानते ही हैं। लेकिन क्या आपको पता है त्रेतायुग से पहले यह भगवान विष्णु की तपोस्थली भी रह चुकी है। त्रेतायुग में भगवन राम ने अयोध्या धाम में जन्म लिया था और रामायण के अनुसार उन्होंने रावण का संहार करने के बाद यहां 11 हजार वर्षों तक राज किया था। उसके बाद वह अपने बैकुंठ धाम पधारे थे।

यह रामकथा तो आप सभी जानते हैं पर क्या आपको पता है कि भगवान राम के जन्म लेने से पहले सतयुग में साक्षात विष्णु भगवान ने अयोध्या को अपनी तपोस्थली के रूप में चुना था। अयोध्या में वो जगह कहां पर है और क्यों भगवान विष्णु ने वर्षों तक किया था अयोध्या में तप, आइए जानते हैं इस जगह के पौराणिक महत्व के बारे में।

 

सतयुग में भगवान विष्णु जब आए थे अयोध्या

स्कंद पुराण के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों में भयंकर युद्ध हो रहा था। दानवों ने संसार में हाहाकार मचा दिया था। तब देवता भगवान विष्णु के पास सहायता लेने के लिए पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा कि आप चिंता न करें। मैं असुरों के प्रकोप को कम करने के लिए आपकी मदद करुंगा। इतना कहते ही भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए और गुप्त रूप से अयोध्या नगरी के गुप्तहरी तीर्थ में आकर वर्षों तक तपस्या करने लगे। उनके तप से जो तेज प्रकट हुआ वह उन्होंने देवताओं को प्रदान किया और उस तेज से असुरों का संहार हुआ।

 

कहते हैं पृथ्वी का बैकुंठ

गोप्रतार समं तीर्थं न भूतो न भविष्यति।

 

अर्थ- गुप्तहरि तीर्थ के समान न कोई तीर्थ था और न ही भविष्य में होगा।

 

भगवान विष्णु के गुप्त रूप से तपस्या करने के कारण इस स्थान का नाम गुप्तहरि तीर्थ पड़ा। वर्तमान समय में इसी को गुप्तार घाट कहते हैं। त्रेतायुग में भगवान राम यहीं से अपने बैकुंठ लोक प्रधारे थे। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को अयोध्या नगरी बहुत प्रिय है और यह उनकी पहली पुरी भी मानी जाती है। अयोध्या के गुप्तार घाट को भगवान विष्णु का निवास स्थान भी कहा गया हैं। इस बात का विस्तार पूर्वक वर्णन स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महात्म में मिलता है।

 

भगवान विष्णु का अति प्राचीन मंदिर ( गुप्तहरि मंदिर)

 

गुप्तार घाट में स्नान-दान एवं दर्शन करने से जन्म-जन्मांतर के पाप से प्राणी मुक्त हो जाता है। घाट पर जो एक बार सरयू जल में स्नान कर लेता है फिर उसे यमलोक की यातना नहीं सहनी पड़ती है और अंत में उसे बैकुंठ लोक प्राप्त होता है। जिस जगह पर भगवान विष्णु ने तप्सया की थी वहां गुप्तहरी नाम से प्रसिद्ध वर्षों पुराना एक मंदिर है। मंदिर के अंदर अत्यंत दुर्लभ शालिग्राम भगवान विराजमान हैं। वहां आपको गुप्तहरि भगवान के भी दर्शन होंगे। मंदिर राम जन्मभूमि से मात्र 6-7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जो भक्त अयोध्या दर्शन के लिए आते हैं वह गुप्तार घाट अवश्य आते हैं। यह एक मात्र ऐसा भगवान विष्णु जी का मंदिर है जहां आने मात्र से हरि कृपा प्राप्त हो जाती है।

यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।

 

जिस तरह दुनिया में आने वाला हर इंसान अपने जन्म से पहले ही अपनी मृत्यु की तारीख यम लोक में निश्चित करके आता है। उसी तरह इंसान रूप में जन्म लेने वाले भगवान के अवतारों का भी इस धरती पर एक निश्चित समय था, वो समय समाप्त होने के बाद उन्हें भी मृत्यु का वरण करके अपने लोक वापस लौटना पड़ा था।हम अब तक आप सब को भगवान श्रीकृष्ण और भगवान लक्ष्मण का अंतिम या यूँ कहे की उनके स्वलोक गमन की कहानी बता चुके है।

आज हम जानेंगे की भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक गए। भगवान श्री राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके प्रिय भक्त हनुमान थे। क्योंकि हनुमान के होते हुए यम की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो राम के पास पहुँच चुके। पर स्वयं श्री राम से इसका हल निकाला। आइये जानते है कैसे श्री राम ने इस समस्या का हल निकाला।

एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था।

यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया।

वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए।

वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”।

हनुमान जान गए कि उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

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