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(भाग:273) चित्रकूट तीर्थ के कण-कण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम होने के मिले है प्रमाण

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भाग:273) चित्रकूट तीर्थ के कण-कण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम होने के मिले है प्रमाण

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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चित्रकूट । जानकी चरण मंदिर के पास निकले पत्थरों में लिखा मिला राम व जानकी चरण मंदिर के पास जेसीबी से खोदाई में कई पत्थर निकले हैं। पुजारी ने पत्थरों में राम नाम व ऊं लिखा होने की बात कहकर कई पत्थर अपने मंदिर में रख लिए।

पंजाबी भगवान आश्रम के नीचे जानकी चरण मंदिर के पास जेसीबी से खोदाई में कई पत्थर निकले हैं। इनमें बनीं आकृति में कुछ लिखा है। जिनमें फलाहारी आश्रम के महंत व मंदिर के पुजारी ने दावा किया कि उसमें राम व ऊं लिखा है। चित्रकूट यूपी एमपी क्षेत्र के सभी तीर्थ स्थलों व बस्ती के पास से सीवर लाइन बनाने का काम जारी है। मप्र सरकार के इस विशेष निधि से चल रहे निर्माण का काम जनक एन पंचाल एंड ज्वाय बिल्डर्स करा रही है।

जानकी चरण मंदिर के पुजारी ओंकार दास ने बताया कि निर्माण एजेंसी के कर्मचारी दो जेसीबी लेकर मंदिर के किनारे से सीवर लाइन डालने के लिए खोदाई करने लगे। कुछ देर बाद दोनों जेसीबी स्वत: बंद हो गई। मुख्य मार्ग तक अन्य वाहन से घसीटकर जेसीबी को लाए तो बाद में वह स्टार्ट हो गई। साइट इंचार्ज मिथलेश पटेल ने बताया कि दोनों चालकों के अनुसार उन्हें कंपन महसूस हो रहा है।

खुदाई के दौरान पत्थरों में मशीन फंस रही थी। कुछ पत्थर टूटकर बाहर निकले। इन पत्थरों को गौर से देखने पर कुछ लिखा महसूस हुआ। मंदिर के पुजारी ने पत्थरों में राम नाम व ऊं लिखा होने की बात कहकर कई पत्थर अपने मंदिर में रख लिए। इसके बाद खोदाई का काम बंद हो गया है। फलाहारी आश्रम के महंत रामप्यारे दास महाराज भी मौके पर पहुंचे और कई पत्थर लेकर आए।

उन्होंने कहा कि यह इस बात का प्रमाण है कि चित्रकूट में भगवान साढ़े 11 साल रहे और यहां के कण कण में राम व्याप्त हैं। यह भी दावा किया कि वह पत्थर लेकर मप्र के मुख्यमंत्री मोहन यादव से मिलेंगे ताकि इस स्थान का संरक्षण हो सके। मौके पर मौजूद श्रद्धालु विवेक अग्रवाल ने कहा कि उन्होंने भी यह चमत्कार देखा है।

कुछ दिन पूर्व यूनेस्को की टीम आई थी जिसने दावा किया था कि हजारों साल पहले यहां मानव जीवन के अंश हैं। इसे संरक्षण की जरूरत है। इस संबंध में नगर पंचायत चित्रकूट के अधिशासी अधिकारी विशाल सिंह ने बताया कि उन्हें भी कुछ जानकारी मिली है। सीवर लाइन डालने वालों को बुलाकर पूछताछ की गई है। जल्द ही पूरी टीम मौके पर जाकर तथ्य जुटाएगी

चित्रकूट धाम का महत्व और महिमा

चित्रकूट धाम भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। चित्रकूट की महिमा का वखाण भारत के प्रकाण्ड विद्मानो ने अपनी रचनाओं और व्याख्याओं में हमेशा किया है। जिनमे की आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि, महर्षि व्यास, महाकवि कालिदास, संस्कृत नाटककार भवभूति, संतकवि तुलसी,मुस्लिम कवि रहीम, यहाँ तक की भगवान राम ने भी इस भूमि को बनवास के दौरान अपने रहने के लिए चुना और साधू संतो की इस आदि सरजमीं को महत्व दिया है। चित्रकूट धाम सदियों से ही ऋषि-मुनियों की तपस्थली रहा है। इस स्थान पर ही ऋषि अत्रि और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। तथा ब्रह्मा,विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था।

यह भी मान्यता है। की ‘भगवान राम ने अपने वनवास के प्रारंभिक साढ़े ग्यारह वर्ष चित्रकूट में व्यतित किए थे। इसी से यह हिंदू समाज के लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। चित्रकुट को इसलिए भी गौरव प्राप्त है। कि इसी तीर्थ में भक्तराज हनुमान की सहायता से भक्त शिरोमणि तुलसीदास को प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए। चित्रकूट एक ऐसी तपस्थली जहां की मिटृी योगियों, ऋषियों और श्रद्वालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती रही है।लोग धर्म की इस नगरी में आकर अपने आपको धन्य मानते है। यहां हर माह की अमावस्या को देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होती है। पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की तपोभूमि है चित्रकूट, जानिए क्यों खास है यहां ‘कामदगिरि पर्वत, क्या है पौराणिक कहानी

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट अनादि काल से वाल्मीकि समेत तमाम महान ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है। त्रेता युग में जब अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले थे। तब उन्होंने आदि ऋषि वाल्मीकि की प्रेरणा से तप और साधना के लिए चित्रकूट आए थे। भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ पावन चित्रकूटगिरी पर अपने वनवास का साढे़ 11 वर्ष व्यतीत किया था।

चित्रकूट: हिंदू धर्म में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का विषेश महत्व है। सनातन धर्म के पौराणिक ग्रन्थों में उनके प्रताप और यश की तमाम कहानियां चर्चित हैं। ऐसी ही मान्यताओं के मुताबिक भगवान राम ने चित्रकूट में भी अपने बनवास के दौरान साढ़े 11 वर्ष का समय बिताया था, जहां उनके साथ माता सीता और अनुज लखन साथ थे। कहा जाता है कि पर्वतराज सुमेरू के शिखर कहे जाने वाले चित्रकूट गिरि को कामदगिरि होने का वरदान भगवान राम ने दिया था। तभी से विश्व के इस अलौकिक पर्वत के दर्शन मात्र से आस्थावानों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। प्रतिवर्ष देश भर से करीब दो करोड से अधिक श्रद्धालु चित्रकूट पहुंच यहां मां मंदाकिनी में आस्था की डुबकी लगाने के बाद कामदगिरि पर्वत की पंचकोसीय परिक्रमा लगाते है। इस पौराणिक तीर्थ की महिमा का बखान स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘कामद भे गिरि रामप्रसादा,अवलोकत है

भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट अनादि काल से वाल्मीकि समेत तमाम महान ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है। त्रेता युग में जब अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले थे। तब उन्होंने आदि ऋषि वाल्मीकि की प्रेरणा से तप और साधना के लिए चित्रकूट आए थे। भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ पावन चित्रकूटगिरी पर अपने वनवास का साढे़ 11 वर्ष व्यतीत किया था।

विश्व के विलक्षण पर्वत कामदगिरि की महिमा का बखान करते हुए कामदगिरि प्रमुख द्वार के महंत मदन गोपाल दास महाराज बताते हैं, कि चित्रकूट का कामदगिरि पर्वत विश्व का वह पावन धाम हैं। ऐसी मान्यता है कि प्रभु राम पत्नी और अनुज लक्ष्मण के साथ नित्य निवास करते हैं। इसी पर्वत पर तप और साधना कर प्रभु राम ने आसुरी ताकतों से लड़ने की दिव्य शक्तियां प्राप्त की थीं। कहा जाता है कि जब भगवान राम चित्रकूट को छोड़कर जाने लगे तो चित्रकूट गिरी ने भगवान राम से याचना कि, हे प्रभु आपने इतने वर्षों तक यहां वास किया, जिससे ये जगह पावन हो गई। लेकिन आपके जाने के बाद मुझे कौन पूछेगा। तब प्रभु राम ने चित्रकूटगिरि को वरदान दिया कि अब आप कामद हो जाएंगे। यानि ईच्छाओं (मनोकामनाओं) की पूर्ति करने वाले हो जाएंगे। जो भी आपकी शरण में आयेगा उसके सारे विशाद नष्ट होने के साथ-साथ सारी मनोकामना पूर्ण हो जाएंगी, और उस पर सदैव राम की कृपा बनी रहेगी। जैसे प्रभु राम ने चित्रकूट गिरि को अपनी कृपा का पात्र बनाया कामदगिरी पर्वत कामतानाथ बन गये। इस अलौकिक पर्वत की महिमा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में भी की हैं। उन्होंने लिखा है ‘कामदगिरि भे रामप्रसादा, अवलोकत अप हरत विषादा’। यानी जो भी इस पर्वत के दर्शन करेगा उसके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।

वहीं रामायणी कुटी के महंत रामहृदय दास, प्राचीन मुखार बिंद के प्रधान पुजारी भरत शरणदास महाराज और सुप्रसिद्ध भागवताचार्य और गायत्री शक्ति पीठ के व्यवस्थापक डॉ. रामनारायण त्रिपाठी तपोभूमि चित्रकूट की महिमा का बखान करते हुए कहते है कि चित्रकूट आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था का सर्वश्रेष्ठ केंद्र है। यह वह भूमि है, जहां पर ब्रह्म, विष्णु और महेश तीनों देव का निवास है। भगवान विष्णु ने भगवान राम रूप में यहां वनवास काटा था, तो ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए यहां यज्ञ किया था और उस यज्ञ से प्रगट हुआ शिवलिंग धर्मनगरी चित्रकूट के क्षेत्रपाल के रूप में आज भी विराजमान है श्रीराम

विश्व के करोडों हिंदुओं के आराध्य भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ कामदगिरि पर्वत पर निवास कर अपने वनवास काल का साढ़े ग्यारह वर्ष व्यतीत किया था। वनवास काल में राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ इतनी लंबी अवधि तक निवास किया था, कि चित्रकूट की कण-कण में राम, लक्ष्मण और सीता के चरण अंकित हो गये हैं। कामदगिरि पर्वत को लेकर प्रचलित किवदंती का उल्लेख करते हुए डॉ. राम नारायण त्रिपाठी बताते हैं कि वायु पुराण में चित्रकूट गिरि की महिमा का उल्लेख है। सुमेरू पर्वत के बढ़ते अहंकार को नष्ट करने के लिए वायु देवता उसके मस्तक को उडा कर चल दिये थे। किंतु उस शिखर पर चित्रकेतु ऋषि तप कर रहे थे। शाप के डर से वायु देवता पुनः उस शिखर को सुमेरू पर्वत में स्थापित करने के लिए चलने लगे। तभी ऋषिराज ने कहा कि मुझे इससे उपयुक्त स्थल पर ले चलो नहीं तो शाप दे दूंगा। संपूर्ण भूमंडल में वायु देवता उस शिखर हो लेकर घूमते रहे, जब इस भूखंड पर आये तो ऋषि ने कहा कि इस शिखर को यहीं स्थापित करों।

चित्रकेतु ऋषि के नाम से ही इस शिखर का नाम चित्रकूट गिरि पडा था। सुप्रसिद्ध भगवताचार्य आचार्य नवलेश दीक्षित बताते हैं कि, धनुषाकार कामदगिरि पर्वत के चार द्वार हैं। जिसमे उत्तरद्वार पर कुबेर, दक्षिणीद्वार पर धर्मराज, पूर्वी द्वार पर इंद्र और पश्चिमी द्वार पर वरूण देव द्वारपाल हैं। इसके अलावा कामदगिरि पर्वत के नीचे क्षीरसागर है। जिसके अंदर उठने वाले ज्वार-भाटा से कभी-कभार कामतानाथ भगवान के मुखार बिंद से दूध की धारा प्रवाहित होती है। विविध विशेषताओं के कारण ही कामदगिरि पर्वत के दर्शन और परिक्रमा के लिए प्रत्येक माह अमावस्या पर लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का जमावडा लगता है। दीपदान मेले में यह संख्या 40 से 50 लाख तक पहुंच जाती है।

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