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जानिए बौद्ध धर्म में ॐ और स्वाहा: का उच्चारण की अवधारणा

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जानिए बौद्ध धर्म में ॐ और स्वाहा: का उच्चारण की अवधारणा

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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नई दिल्ली। बौध महासभा के अनुसार बौद्ध धर्म मंत्र-तंत्र परंपरा से शुरू हुई थी. बौद्ध तंत्रयान में मंत्रों की शुरुआत ॐ से और अंत स्वाहा से होता है. बौद्ध परंपरा में ॐ शब्द का प्रयोग लगभग सातवीं शताब्दी में शुरू हुआ था. ॐ के बारे में कुछ खास बातें बतलाने जारहे हैं.

ॐ को हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध धर्मों में पवित्र माना गया है.

ॐ शांति का प्रतीक है. ॐ तीन अक्षरों से मिलकर बना है, अ, उ और म. ॐ से कई मंत्रों की उत्पत्ति हुई है. ॐ ब्रह्म-आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है. ॐ का उच्चारण करने से मन शांत होता है और आत्मा से जुड़ाव बढ़ता है.

ॐ की उत्पत्ति शिव के मुखारविंद से हुई थी, ऐसा माना जाता है. ॐ को ब्रह्मांड का सार माना जाता है. ॐ को सार्वभौमिक ध्वनि माना जाता है. ॐ के ऊपर बिंदी तीनों गुणों से परे या तीनों में समानता की निर्गुणता की प्रतीक है. बौद्ध धर्म के मंत्रों में है ॐ उचारण की अवधारणा:बौद्ध तंत्रयान में मंत्रों की शुरुआत ओम व अंत होता है स्वाहा से, इसके जाप से बुद्धत्व की प्राप्ति छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ईशावास्य, कठोपनिषद में उसे परब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुंडकोपनिषद में कहा गया है,ऊं से ही ब्रम्ह जगत की उत्पत् हूई है.ऊं मित्येवं ध्यायथ आत्मानम, ओम इति ब्रह्म आदि

बौद्ध धर्म के मंत्रों में है ॐ उचारण की अवधारणा:बौद्ध तंत्रयान में मंत्रों की शुरुआत ओम व अंत होता है स्वाहा से, इसके जाप से बुद्धत्व की प्राप्ति होती है.

दरअसल में बौद्ध तंत्रयान में मंत्रों की शुरुआत ओम व अंत होता है स्वाहा से, इसके जाप से बुद्धत्व की प्राप्ति हूई हैं..

कालचक्र मैदान पर तीसरे दिन शनिवार को शीर्षस्थ बौद्ध आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा नागार्जुन के बोधिचित्त विवरण पर प्रवचन के दौरान 21 ताराओं की दीक्षा दी और मंत्र ॐ तारा तुत्तारा तुरे स्वाहा मंत्र का जाप हुआ। मंत्र में ओम शब्द वैदिक ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म में भी है। ओम मंत्र का अंग है व मंत्र मनन, चिंतन का द्योतक है। ओम की अवधारणा भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जो मंत्र साधना से जुड़ा है। उपनिषदों में ओम व ओंकार शब्दों की विशद व्याख्या है।

छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ईशावास्य, कठोपनिषद में उसे परब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुंडकोपनिषद में कहा गया है, ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम, ओम इति ब्रह्म आदि। मैत्रायणी उपनिषद में ओं और प्राण की एकता का योग कहा गया है। नारद पुराण के अनुसार, ओं का अकार, उकार और मकार क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र का प्रतीक और अर्धमात्रा निर्गुण परब्रह्म परमात्मा स्वरूप है। इसके उच्चारण से सकारात्मक ऊर्जा का संचरण होता है। बौद्ध तंत्र साहित्य हेवज्र तंत्र में ओम को बोधिचित्त भी कहा गया है। इसमें लगभग 20 मंत्रों का उल्लेख है, जो ओम से शुरू हुआ है। सभी मंत्रों की शुरुआत ओम से और अंत स्वाहा से हुआ है। इन मंत्रों की जप प्रक्रिया और सिद्धि वैदिक मंत्रों और उसकी जप प्रक्रिया की तरह ही है।

सातवीं सदी में बौद्ध ने स्वीकारा ओम बौद्ध साहित्य सुत्तपिटक में परित्राण सुत्त में ओंकार की चर्चा है। जैन परंपरा में णमोकार मंत्र के माध्यम से साधना की पहल हुई, पर विशुद्ध अहिंसक और संयमी धर्म होने के कारण ओं का अधिक विकास नहीं हुआ। ऐसा लगता है, बौद्ध धर्म में ओम की अवधारणा मंत्र-तंत्र परंपरा से शुरू हुआ है। बौद्ध परंपरा में ओम शब्द का प्रयोग लगभग सातवीं शताब्दी में तंत्रयान और वज्रयान के साथ शुरू हुई। बौद्ध तंत्र परंपरा की पहली साहित्य गुह्यसमाज तंत्र में मंत्र शब्द मनन अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

नागार्जुन ने की है व्याख्या नागार्जुन ने कहा है ओं आः हूं वर्णों को योगी मस्तक, ग्रीवा और हृदय में गुंजित करे। स्वर की प्रकृति प्रज्ञा है और व्यंजन की प्रकृति उपाय। ये तीनों निर्माणकाय, संभोग गाय और धर्मकाय के प्रतीक हैं। ओंकार साधना से बोधिचित्त और करुणा का उदय होता है। शून्यता का ज्ञान होता है। उन्होंने ओं को वैरोचन, आः अमिताभ और हूं को अक्षोभ्य मंत्र बताया है। ये सभी ध्यानी बुद्ध हैं, जिनकी पूजा होती है। बौद्ध तंत्र साधना में ओम मंत्र व उसके उसके उच्चारण को परमानंद माना जाता है। इसका संबंध मनन और चिंतन से है। आशा के शून्य होने पर जां मिलता है, वही परमानंद है मिलता है.

“ओम मणि पद्मे हुम् मंत्र कहने में आसान है फिर भी काफी शक्तिशाली है, क्योंकि इसमें संपूर्ण शिक्षण का सार शामिल है।

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