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अमरकंटक मे आयोजित जैन मुनियों का चातुर्मास प्रारंभ 

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अमरकंटक मे आयोजित जैन मुनियों का चातुर्मास प्रारंभ

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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अमरकंटक । अमरकंटक में जैन तीर्थ का नाम श्री दिगंबर जैन सर्वोदय तीर्थ है. यह मंदिर मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित है और भगवान आदिनाथ को समर्पित है. यह मंदिर अमरकंटक में एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल है, जो नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के पास स्थित है. मंदिर में भगवान आदिनाथ की अष्टधातु से बनी प्रतिमा विराजमान है. इसे “सर्वोदय मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है. अमरकंटक, जिसे “तीर्थराज” भी कहा जाता है, एक प्रसिद्ध हिंदू और जैन तीर्थ स्थल है. यह विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं का मिलन बिंदु है, और यहीं से नर्मदा, सोन और जोहिला नदियाँ निकलती हैं.

इस दौरान, जैन संत वर्षा ऋतु के चार महीनों के लिए एक ही स्थान पर प्रवास करते हैं, जिससे जीवों की रक्षा हो सके और वे आध्यात्मिक साधना कर सकें।

अमरकंटक में चातुर्मास के दौरान, जैन मंदिरों और उपाश्रयों में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम और आध्यात्मिक गतिविधियाँ आयोजित की जाएँगी। यह समय जैन धर्मावलंबियों के लिए उपदेश सुनने, व्रत रखने, साधना करने और तपस्या करने का होता है।

चातुर्मास के दौरान, जैन संत यात्राएं रोक देते हैं और एक ही स्थान पर रहकर आध्यात्मिक साधना करते हैं। वे यम और नियम का पालन करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।

अमरकंटक में चातुर्मास का यह समय जैन समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जहाँ वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ाते हैं और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं।

 

अमरकंटक मे जैन मुनियों का चातुर्मास प्रारंभ है

जैन मुनियों का चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक, यानी चार महीनों की अवधि के दौरान मनाया जाता है। 2025 में, चातुर्मास 10 जुलाई से शुरू होकर 5 नवंबर तक चलेगा। इस दौरान, जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहकर धर्म-कर्म, तपस्या और प्रवचन आदि करते हैं।

चातुर्मास का जैन धर्म में विशेष महत्व है, क्योंकि इस दौरान सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है, और जैन धर्म अहिंसा पर आधारित होने के कारण, साधु-साध्वी एक स्थान पर रुककर जीवों की हिंसा से बचने का प्रयास करते हैं. यह समय जैन साधुओं के लिए आत्म-अनुशासन, तपस्या और आध्यात्मिक विकास का होता है।

चातुर्मास का महत्व:अहिंसा: चातुर्मास में जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहकर जीवों की हिंसा से बचने का प्रयास करते हैं. तपस्या: यह समय जैन साधुओं के लिए तपस्या, आत्म-नियंत्रण और आध्यात्मिक विकास का होता है.

धर्म-कर्म: चातुर्मास के दौरान, जैन साधु-साध्वी प्रवचन, धार्मिक क्रियाएं और अन्य धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं. सामाजिक जागरूकता: चातुर्मास के दौरान, जैन समुदाय के लोग भी धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं और सामाजिक कार्यों में संलग्न होते हैं.

चातुर्मास में क्या होता है: जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहते हैं. वे धार्मिक प्रवचन देते हैं और धार्मिक क्रियाएं करते हैं.वे तपस्या और आत्म अनुशासन का अभ्यास करते हैं.जैन समुदाय के लोग भी धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं.

 

*टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:* सह-संपादक रिपोर्ट

*मोहन कारेमोरे* : मुख्य संपादक
*संपर्क* : 9373112457
*विश्व भारत* : न्यूज पोर्टल
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