झूठ छल-कपट चुगलखोर विश्वासघाती आचरण के मनुष्य “वर्णसंकर”
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:
9822550220
प्राचीनतम वैदिक सनातन हिंदू धर्मशास्त्रों (विशेषकर गीता और मनुस्मृति) के संदर्भ में ‘वर्णसंकर’ का अर्थ केवल भिन्न जातियों का मिश्रण ही नहीं, बल्कि सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करके उत्पन्न अवांछित संतान या अनैतिक आचरण से है। श्रीमद्भगवद्गीता (1.41-42) में बताया गया है कि अनैतिक आचरण से उत्पन्न संतान वर्णसंकर दोष से कुल का नाश होता है और ऐसी संतान में कुल-धर्म या नैतिकता का अभाव होता है। पति के रहते हुए दूसरे पुरुषों के सहवास से उत्पन्न संतान अथवा वैश्या किस्म के आचरण वाली महिला से उत्पन्न हुई संतान वर्णसंकर कहलाती है.
वर्णसंकर की पहचान (गुण धर्म/लक्षण): शास्त्रों के अनुसार, वर्णसंकर संतान का चरित्र और पहचान निम्नलिखित लक्षणों से की जा सकती है:
जैसे ईर्श्यालू झूठा छली कपटी धूर्त चोर चुगलखोर चापलूसखोर बेईमान विश्वासघाती और भ्रष्टाचारी आचरण यही वर्णसंकर मनुष्य की पहचान बतलाई जाती है. इसके अलावा जिनके आचरण में अधार्मिकता व मर्यादा का अभाव अपने निज स्वार्थ साधने झूठी वनाबटी चुगली करने पट्टी पढाने और ब्रेनवाश करने वाले मनुष्य धार्मिक बुद्धि से रहित होते हैं और सामाजिक, पारिवारिक मर्यादाओं का पालन नहीं करते और कर्तव्य से विमुख रहते हैं ऐसे वर्णसंकर लोग अपने कुल-धर्म (पारिवारिक परंपराओं) का पालन नहीं करते, बल्कि उसके विरुद्ध कार्य करते हैं।
अनैतिकता: इनमें ईर्श्यालू झूठ, छल, कपट,बेईमानी कामचोर और विश्वासघात जैसे गुण होने की प्रबल संभावना होती है, क्योंकि वे अनैतिक तरीके से उत्पन्न हुए माने जाते हैं।
अस्थिर आचरण: मनुस्मृति के अनुसार, अनियंत्रित वासना से उत्पन्न होने के कारण, ये मानसिक उपद्रवी और अधर्मी स्वाभाव के हो सकते हैं।
कुलघातक: वे पितरों की श्राद्ध-तर्पण क्रियाओं का पालन नहीं करते, जिससे पितरों का पतन होता है।
अनैतिक स्वभाव: माना जाता है कि जो नीच कर्म या भिन्न वर्णों के अनुचित मेल से जन्म लेते हैं, वे नीच स्वभाव को धारण करते हैं।
संक्षेप में: वर्णसंकर की पहचान एक ऐसे व्यक्ति के रूप में की गई है जो परंपरा, नैतिकता और सामाजिक धर्म (संस्कार) को नष्ट करने वाला और छल-कपट में लिप्त होता है।
अनेक मर्दों से संभोग से पैदा हुई संतान को वर्णसंकर कहते है
पारंपरिक भारतीय शास्त्रों (जैसे महाभारत, भगवद गीता) के अनुसार ‘वर्णसंकर का अर्थ केवल एक स्त्री के कई पुरुषों से संबंध से नहीं, बल्कि विभिन्न वर्णों (जातियों) या सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करके उत्पन्न संतान से है।
वर्णसंकर का मूल अर्थ:
वर्णों का मिश्रण: जब उच्च वर्ण की स्त्री का निम्न वर्ण के पुरुष से, या भिन्न वर्णों के स्त्री-पुरुष का अनैतिक या गैर-पारंपरिक मिलन होता है, तो उससे जन्मी संतान को वर्णसंकर कहा जाता है।
अनैतिक संतान: शास्त्रों में इसे व्यभिचार (व्यभिचार से उत्पन्न) या बिना विवाह के, या शास्त्र सम्मत नियमों के बिना पैदा हुई संतान के रूप में भी परिभाषित किया गया है।
अर्जुन का दृष्टिकोण (भगवद गीता):
गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन का यह भय था कि युद्ध के कारण कुल-परंपरा नष्ट हो जाएगी और स्त्रियां जब पथभ्रष्ट होंगी (अनेक पुरुष संबंध), तो वर्णसंकर संतान पैदा होगी, जो सामाजिक और नैतिक पतन का कारण बनेगी।
मुख्य बिंदु:
यह सामाजिक/पारंपरिक नियमों के विरुद्ध मिश्रण को दर्शाता है।
इसे अवांछित (Unwanted) या कुल-धर्म से गिरी हुई संतान माना जाता है।
यह सिर्फ “कई मर्दों” तक सीमित नहीं, बल्कि मुख्य रूप से जातियों के अनैतिक मिश्रण से जुड़ा है.ऐसे लोगों को दोगली नस्ल भी कहते है.कारण कि यदि जिस स्त्री का पति नपुंसक होता है परंतु संतान की आवश्यकता के लिए वह दूसरे पुरुष से सहवास करके संतान उत्पन्न उपलब्ध करा लेती हैं. वर्णसंकर कहलाते हैं.इसीलिये सनातन हिन्दू धर्म मे अपनी समाज को छोड़कर अन्य समाज से विवाह करना वर्जित माना गया है.
वर्णशंकर संबंधित ज्योतिष का मत
शरीर और मन यदि व्याधि ग्रस्त हो, तो कुल कुण्डलिनी शक्ति (पिण्ड) का प्रकाश लुप्त हो जाता है। सारी आध्यात्मिक शक्तियों का पतन हो जाता है। वे क्षीण होते-होते लोप हो जाती हैं..
वर्णसंकरता का प्रवाह सभ्यता के साथ कई बार अनजाने में संस्कृति भी बदल जाती है। एक झूठ को सौ बार बोलो तो सत्य बन जाता है। किसी युग का त्याज्य शब्द आज प्रचलन में आ रहा है। क्यों? कोई नहीं जानता। सही पूछो तो गीता की बातें तो सब करते हैं, किन्तु कोई उसका अनुसरण करने की कहां सोचता है। सभ्यता की दृष्टि से आर्य सभ्यता उच्च श्रेणी की प्रमाणित हुई है। कई परम्पराओं की परीक्षा भिन्न-भिन्न देशों के वैज्ञानिक भी करते रहे हैं। उदाहरण के लिए बीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में पश्चिमी देशों के डॉ. हेस, शिकागो के डॉ. अर्नस्ट अलबर्ट, एलेग जेण्ट वीरेर, डॉ. ओसिलो आदि ने वर्णव्यवस्था की वैज्ञानिक व्याख्या का पूर्ण परीक्षण किया।
इन यन्त्रों से वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया कि प्राणीमात्र के रक्त में चार प्रकार के विभाग पाए जाते हैं। जिनको आज ब्लड ग्रुप A-B-AB-O कहा जाता है। इनकी परीक्षा से सभी प्राणियों की (मानव सहित) प्रकृति, रुचि, व्यवहार आदि का पता लगाया जा सकता है। यह भी निश्चय किया जा सकता है कि यह किसकी सन्तान है।
अदालतों में इन यन्त्रों का विशेष उपयोग होता है। निष्कर्ष यह है कि भिन्न-भिन्न रक्तों के सम्मिश्रण से जो एक शरीर पैदा होगा, भारतीय संस्कृति के शब्दों में वह वर्णसंकर होगा। उसमें माता-पिता के सभी दोष होंगे, गुण नहीं होंगे। प्राय: ऐसी संतति उन्मत्त, विक्षिप्त या दुष्ट प्रकृति की होगी। पूर्वकाल में मनु ने लिखा था-
*पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा।*
*न कथंचन दुर्योनि: प्रकृतिं स्वां नियच्छति।।* (10.59)
अर्थात्-वर्णसंकर में माता या पिता के या दोनों के दुष्ट स्वभाव की अनुवृत्ति होती है। वह अपनी आदत को नियम में नहीं ला सकता।
शरीर ब्रह्माण्ड : हर प्राणी का आत्मा ईश्वर समान
उन विद्वानों ने यह भी सिद्ध कर दिया कि रक्त के इन चार भेदों के उपभेद भी बहुत हैं। देशों के अनुसार भी इनके प्रभाव में अन्तर आ जाता है। उन एक ही उपभेद वाले रक्तों का परस्पर सम्बन्ध होने से सन्तति या तो होगी ही नहीं या शीघ्र विच्छिन्न हो जाएगी। सन्तति यदि आगे चली तो विकृत मस्तिष्क की होगी।
विवाह सम्बन्ध से (भारतीय परम्परा से) स्त्री की मन-प्राण आदि की एकता सम्पादित की जाती है। अत: सन्तान गुणवती होती है। इस दृष्टि से हमारी वर्ण व्यवस्था में दोष का स्थान नहीं था। केवल निकृष्ट वर्णसंकर को ही अस्पृश्य माना गया था।
महाभारत युद्ध के दौरान कितने योद्धा-वीर आदि काम आ चुके थे, हजारों हजार! तब देश में लुटेरों ने ही स्त्रियों को शिकार बनाया। वर्णसंकर ही सर्वत्र छा गए। क्या देश की गुलामी का श्रेय इस अवस्था को दिया जाए तो सही नहीं होगा? आज शिक्षा और नौकरी की नई व्यवस्था ने विश्व को पुन: उधर ही धकेलना शुरू कर दिया।
शरीर ही ब्रह्माण्ड : आसक्त मन बाहर भागता है
जबकि गीता में इस विषय पर जो कहा है, उसे भी देख लेना अनुचित नहीं होगा-
*अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।*
*स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्कर:।। (गीता 1.41)*
*दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै:।*
*उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता:।। (गीता* 1.43)
वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। वर्णसंकर का दिया हुआ पिण्ड या जल पितरों को प्राप्त नहीं होता। (1.42) । पं. गिरिधर शर्मा ने गीता व्याख्यान माला में लिखा है कि पुरुष बीज है, स्त्री धरती है। जहां पिता का बीज प्रभावी हो और माता का वर्ण तदनुरूप नहीं हो तो वे ‘अनुलोम संकर’ कहलाते हैं।
बीज की प्रधानता से उन्हें ज्यादा दूषित नहीं माना जाता। जहां माता का वर्ण प्रभावी हो, पिता का बीज निकृष्ट हो, वे ‘प्रतिलोम संकर’ कहे जाते हैं। यहां बीज निकृष्ट होने से संतति में विशेष दोष आते हैं। संसर्ग दोष को विज्ञान भी मानता है। रोगी के साथ संसर्ग के लिए डाक्टर भी मना करते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में माता-पिता के गुण संतान में नहीं आते।
पशु : मानव से अधिक मर्यादित
हमारे ऋषियों ने शरीर दोष के आगे परीक्षण करके अन्त:करण के दोषों का भी संक्रमण माना है। बेमेल अथवा निकृष्ट संसर्ग से उन कुलों को भी कोई लाभ होने वाला नहीं। क्योंकि सन्तति में कोई गुण नहीं आ रहा। उनके अन्त:करण में तामस भाव आ जाएंगे। पूर्वजों के दोष का फल सन्तानें भी भोगती हैं।
कुल क्रमागत (हेरिडिटरी) रोग प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। स्थूल रोगों का संक्रमण तो प्रत्यक्ष है, एवं सूक्ष्म रजोगुण, तमोगुण का संक्रमण भी प्रकृतिसिद्ध है। रक्तशुद्धि के उद्देश्य से, अपने को अपवित्रता से बचाने को ये उपाय प्रवृत्त हुए। इतिहास साक्षी है कि अर्जुन की ये शंकाएं आगे चलकर बिल्कुल सत्य साबित हुईं।
योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी ने लिखा है कि आध्यात्मिक दृष्टि से हम विषय भोग ही करें या साधन-भजन ही करें, दोनों अवस्थाओं में सप्तदश (सत्रह) अवयवात्मक सूक्ष्म देह यानी दस इन्द्रियां, पांच प्राण, मन और बुद्धि के बिना कुछ होने का नहीं। इन सबकी सामूहिक शक्ति को कुल कहते हैं। मेरुदण्ड कुलवृक्ष है। कुल शक्ति के नष्ट हो जाने पर जीव के प्राण, मन और इन्द्रियां सभी अधर्म के द्वारा अभिभूत (पीडि़त) हो जाते हैं। दुर्बल होकर जिसकी जो भी शक्ति है, वह नष्टप्राय: हो जाती है।
इन सब असंयमों के फलस्वरूप उनकी सन्तानें भी भ्रष्ट बुद्धि लेकर जन्म ग्रहण करती हैं। उनसे कोई अधर्म किए बिना बाकी नहीं रहता। अत: कुलधर्म की रक्षा अनिवार्य है। लाहिड़ी कहते हैं कि आजकल के समाज में वर्णसंकर को निन्दनीय नहीं समझा जाता। भविष्य में चलन और भी बढ़ सकता है।
नहीं तो कलियुग का पूर्ण प्रादुर्भाव कैसे होगा? आज खानपान की वस्तुओं का मिश्रण इतना दूषित हो गया है कि भयंकर दोष-रोग पैदा हो रहे हैं। तब शरीरादि धातुओं में यह संकरत्व महान अनिष्टकारी होगा ही। आजकल साधन में, वैराग्य में, भक्ति में, ज्ञान में, इस धर्म भ्रष्टकारी संकरत्व के प्रचार को देखकर स्तंभित हो जाते हैं।
शिक्षा के व्यभिचार से स्त्रियां पुरुष भाव वाली तथा पुरुष स्त्री भाव वाले होते जा रहे हैं। धर्मानुष्ठान के प्रति किसी में वैसी श्रद्धा नहीं रही। शरीर और मन यदि व्याधि ग्रस्त हो, तो कुल कुण्डलिनी शक्ति (पिण्ड) का प्रकाश लुप्त हो जाता है। सारी आध्यात्मिक शक्तियों का पतन हो जाता है। वे क्षीण होते-होते लोप हो जाती हैं। शरीर में भी अग्नि-वायु-आदित्य
शरीर ही ब्रह्माण्ड – दाम्पत्य और जीवन
अत: इसको शीघ्र नष्ट करने के लिए शास्त्रों में अनेक उपचार भी दिए हैं। पिण्डोदक क्रिया के बिना यह देह नष्ट नहीं होता। कुण्डलिनी शक्ति का नाम ही पिण्ड है। यह क्रिया पुत्र द्वारा ही उपकारी होती है। वर्णसंकर संतान द्वारा नहीं होती। क्योंकि संकरत्व से लोग अपना वैशिष्ट्य खोकर अधम बन जाते हैं।
मानवविहीन पशु साम्राज्य : सेरेनगेटी
हम जिसे कुल धर्म मानते हैं वह बाह्य-सामाजिक स्वरूप है। आत्मा में स्थिर स्थिति ही कुल धर्म है। बाहर तो धर्म के अनेक रूप भी हो जाते हैं-संसारधर्म, जीवधर्म, लोकधर्म, समाजधर्म आदि। अत: आध्यात्मिक दृष्टि से तो इनको कुलघातक ही कहा है। केवल योगी को ही कुलीन या कुल समन्वित कहते हैं। योगी प्राणों को सुषुम्ना में स्थिर करके मन को स्थिर कर लेते हैं। यही स्थिर अवस्था है।
अर्जुन ने जो कुलधर्म कहा, वह बाह्य दृष्टि से ही था। अत: उसके संदेह बने रहे थे। प्रकृति में-‘शरीर ही ब्रह्माण्ड: मैं यज्ञ का
शरीर आकृति का नाम है। इसको अहंकृति और प्रकृति चलाते हैं। अहंकृति सूर्य से तथा प्रकृति चन्द्रमा से निष्पन्न होती है। दोनों ही चैतन्य से संचालित रहते हैं। सूर्य तो जगत का आत्मा ही है। चन्द्रमा का पति रूप है। चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। अहंकृति-प्रकृति दोनों ही सूक्ष्म भाव में कार्य करते हैं। आकृति में स्वतंत्र चिन्तन नहीं है। भूगोल आकृति को प्रभावित करता है। स्थानीय अन्न से ही शरीर का निर्माण होता है। अत: शरीर अन्न की सन्तान ही है।
जहां तक शरीर का सम्बन्ध है, वहां तक मानव अचेतन-जड़ भूतों की श्रेणी में आता है। जहां तक मन का सम्बन्ध है, वहां तक मानव चेतन-सेन्द्रिय-मन सहित सामान्य पशु आदि की श्रेणी में आता है। जहां तक बुद्धि का सम्बन्ध है, वहां तक चेतन-मन-बुद्धि युक्त विशेष पशु आदि की श्रेणी में आता है। आत्मस्वरूप की पूर्ण अभिव्यक्ति वाला मानव ही पूर्णता का अधिकारी है—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम् ॥ (कठो. 1.2.22)
मानव के आत्म स्वरूप से सम्बन्ध रखने वाले बौद्धिक-मानसिक-शारीरिक भाव जब जहां जैसी आवश्यकता हो वैसे परिवर्तनशील बने रहते हैं। इन तीनों आचरणों का- आत्मा से जुड़ा स्वरूप ही मानवता है। इन्हीं के लिए पुरुषार्थों की व्यवस्था की है। शरीर से अर्थ का, मन से काम का, बुद्धि से धर्म का तथा मोक्ष से आत्मा का सम्बन्ध है। आज के युग में- ‘अर्थ खा गया धर्म को, काम खा गया मोक्ष को।‘
सूक्ष्म शरीर का केन्द्र हृदय होता है। तीन अक्षर प्राणों से निर्मित हृदय—ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र प्राण- सभी प्राणियों में समान रूप से कार्य करता है। अव्यय (कारण शरीर) में संचित कर्म रहते हैं, सूक्ष्म शरीर प्रारब्ध कर्म पर कार्य संचालन करता है। सूक्ष्म शरीर एक ओर कारण से तथा दूसरी ओर स्थूल से जुड़ा रहता है। श्रुति कहती है—
*न सती सा नासती सा नोभयात्मा विरोधत:।*
*काचिद्विलक्षणा माया वस्तुभूता सनातनी।*
पुरुष के हृदय में प्रतिष्ठित रसबलात्मक तत्त्व ‘मन’ कहलाया—
*ईश्वर: सर्वभूतानां* *हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।* मनोमय पुरुष के अर्क रूप रश्मि भाव ही ‘काम’ कहलाते हैं। ये ही ‘एकोहं बहुस्याम्’ रूप में सृष्टि बीज बने। कामना मन का रेत है। इसी कारण पुरुष ‘कामरेत’ है। रस-बल ही कामना का वास्तविक रूप हैं। रस और बल दोनों ही केन्द्र में हैं, दोनों ही परिधि में हैं। ये दो तत्त्व ही हृदय के स्वरूप का निर्माण करते हैं। इसी में तीनों अक्षर प्राणों के अलावा दो अन्य कलाएं भी होती हैं—अग्नि और सोम। सम्पूर्ण पदार्थ अग्नि-सोम के तारतम्य से ही उत्पन्न होते हैं। स्पर्शरूप सोम से तथा उष्मारूप अग्नि से ही वर्ण और अक्षरों का भी उद्भव होता है।
सूर्य-चन्द्रमा का दाम्पत्य भाव ही सृष्टि का उपादान कारण है। आधे आकाश में सूर्य-दिन के स्वामी हैं। आधे आकाश में चन्द्रमा रात के स्वामी हैं। इनको ही मनु-श्रद्धा कहा जाता है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं- जैसे विधि और निषेध। दोनों से आध्यात्मिक संवत्सर यज्ञ पूर्ण होता है। अक्षर द्वारा क्षर का विस्तार ही (जानना) विज्ञान कहलाता है
शरीर ही ब्रह्माण्ड – दाम्पत्य और माया
पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा क्रान्तिवृत्त पर करती है। यही संवत्सर कहलाता है। इसमें सूर्य विष्वद्वृत्त वृत्त के दोनों ओर 24 अंश तक उपलब्ध रहता है। जिस ओर दिन रहता (सूर्य) है उस आधे सौर आकाश से पुरुष का तथा दूसरे चन्द्र शासित (रात्रि) आधे सौम्याकाश से स्त्री के स्वरूप का विकास होता है। इसी दाम्पत्य भाव से सृष्टि होती है। पुरुषो वै यज्ञ: कहा है।
अध्यात्म संस्था में संवत्सर का विष्वद् वृत्त ही मेरुदण्ड बनता है। पति-पत्नी जब आमने-सामने खड़े होते हैं तो, तब रीढ़ की हड्डी पूर्ण वृत्त बना देती है। दोनों की 24-24 पसलियां ही क्रान्तिवृत्त का 48 अंश का स्वरूप बनाते हैं। संवत्सर यज्ञ से प्रजा पैदा होती है। इस यज्ञ को इष्ट कामधुक् कहते हैं। गीता में कृष्ण कह रहे हैं कि प्रजापति ने प्रजाओं को कहा कि तुम लोग यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यज्ञ तुम्हें इच्छित भोग देने वाला हो—
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।। (3.10)
सूक्ष्म शरीर ही जीवन की गतिविधियों का मूल स्थान है। हृदय ही कामना का, ब्रह्म का, देव प्राणों का स्थान है। मन ही मूल अव्यय मन के आश्रय में सृष्टि की ओर अथवा मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। इसी में ईश्वर इच्छा एवं जीव की इच्छा पैदा होती है। दाम्पत्य भाव का केन्द्र सूक्ष्म शरीर ही है। स्थूल शरीर उपकरण रूप साधन होता है। पुरुष जीव के साथ पित्रांश भी रहता है। स्त्री का पित्रांश भी इसी के साथ रहता है। इसी से स्त्री का सम्बन्ध सात जन्मों का हो जाता है।
दाम्पत्य भाव चूंकि आत्मा का क्षेत्र है, अत: शरीर-मन-बुद्धि उसके उपकरण रूप अपरा प्रकृति के ही भाग रहते हैं। उनका आदान-प्रदान तो आत्मा से ही होता है। ये माया का भी क्षेत्र है। दाम्पत्य भाव जब सृष्टि साक्षी रहता है, तब शरीर, मन और बुद्धि से सम्बद्ध रहता है। क्षरण की दिशा में अग्रसर होता है। आत्म तत्त्व से रहित कर्म पशु के समान ही माना जाएगा। आत्मभाव से युक्त मानव अतिक्रमण नहीं करता। बुद्धि आग्नेयी है, मन सौम्य है। आग्नेयता पौरुष भाव तथा सौम्यता स्त्रैण भाव है। सोममयी श्रद्धा शक्तितत्त्व है। अग्निमय रुद्र-शिवतत्त्व है। जब दोनों अलग रहते हैं, तब दोनों ही अतिक्रमण करते हैं। अत: शक्ति व शक्तिमान का साहचर्य ही सृष्टि में कल्याणकारी माना गया है। ‘सहधर्मं चरताम्’ ही दाम्पत्य का आदर्श स्वरूप है।
दाम्पत्य भाव अक्षर सृष्टि में ही निष्पन्न होता है। इसके स्थूल कर्म शरीर में दिखाई पड़ते हैं। लेकिन प्रजा वृद्धि का मूल तो ब्रह्म है जो अव्यय में प्रतिष्ठित रहता है। यज्ञ के मध्य माया ही ब्रह्म को अक्षर से युक्त करती है। इसके अभाव में सृष्टि नहीं होती है। दम्पति इस ब्रह्म के लिए आश्रय (शरीर) का निर्माण करते हैं।
सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-
उपरोक्त समाचार सामान्य ज्ञान पर अधारित किसी की भावनाओ को आहत पंहुचाना हमारा उद्देश्य नहीं है.दरअसल मे अत्यधिक प्राचीनतम वैदिक सनातन धर्म शास्त्रों के आधार पर प्रकाशित कर सेवा में प्रस्तुत है.अधिक जानकारी के लिए आध्यात्मिक विशेष किसी पूज्य महामण्डलेश्वर महाराज के सानिध्य मे ज्ञानोपदेश प्राप्त कर सकते हैं.यह प्रसंग अच्छा लगे तो धन्यवाद जरुर देना और अच्छा ना लगे तो उचित मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ सधन्यवाद।
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