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(भाग-21) वैराग्य का अर्थ,संसार की तरफ पीठ करके स्वयं के घर की ओर वापस होना!

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श्रीमद्-भगवद गीता के अनुसार वैराग्य का वास्तविक अर्थ क्या है? राग है संसार की यात्रा का मार्ग, संसार में यात्रा का मार्ग। वैराग्य है संसार की तरफ पीठ करके स्वयं के घर की ओर वापसी। राग यदि सुबह है, जब पक्षी घोंसलों को छोड़कर बाहर की यात्रा पर निकल जाते हैं, तो वैराग्य सांझ है, जब पक्षी अपने नीड़ में वापस लौट आते हैं।
श्रीमद् भगवत गीता में जहां पर वैराग्य की बात आती है तो सभी के‌ मन में एक ही ख्याल आता है कि साधु-सतों जैसा जीवन जीना। साधु संतों का जीवन और वैराग्य को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता है।

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यही कारण है कि आम इंसान वैराग्य की बात आते ही कहीं ना कहीं दुबक जाता है। आज हम इस लेख के माध्यम से वैराग्य की असली परिभाषा से आपको रूबरू करवाएंगे। श्रीमद्भागवत गीता से यह जानेंगे की अभ्यास एवं वैराग्य से सभी प्रकार की उपलब्धियां एवं सफलताएं आसानी से हासिल की जा सकती है। इसके पूर्व के लेख में हमने स्थिर बुद्धि पर चर्चा की थी स्थिर बुद्धि अभ्यास एवं वैराग्य का ही समग्र रूप है, तो आइए बिना देर किए अब अभ्यास एवं वैराग्य पर चर्चा शुरू करते हैं।

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अभ्यास यानी कि प्रैक्टिस का सामान्य अर्थ होता है कि किसी काम को लगातार करना। अभ्यास अर्थात प्रैक्टिस का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। लगातार किसी काम को करते रहने से वह आदत बन जाती है मनुष्य का मस्तिष्क कुछ इस तरह से काम करता है कि लगातार किसी काम को बार बार करते रहने से धीरे-धीरे मस्तिष्क उस चीज को ग्रहण कर लेता है एवं समय आने पर ऑटोमेटिक उस काम को कर देता है।

इसे एक लौकिक व्यावहारिक गतिविधि टाइपिंग कार्य के उदाहरण से समझा जा सकता है। पहली बार जब लोग टाइपिंग करना आरम्भ करते हैं तब वे एक मिनट में एक शब्द टाइप कर पाते हैं। किन्तु एक वर्ष टाइपिंग का अभ्यास करने के पश्चात उनकी उंगलियाँ टाइपराइटर के कुंजीपटल पर 80 शब्द प्रति मिनट की गति से दौड़ती हैं। यह दक्षता पूर्ण अभ्यास के माध्यम से आती है। कार्य के प्रति एकाग्रता कैसे बढ़ाए? श्रीमद्भागवत गीता के इन 2 श्लोकों से जानना जरुरी है

ज्योतिष के बारे में श्रीमद्भागवत गीता क्या कहती है?

कौन सा अभ्यास श्रेष्ठ है? अभ्यास यानी प्रैक्टिस को हमने समझा अब हम यह जानते हैं कि कौन सा अभ्यास मनुष्य के लिए श्रेष्ठतम रहता है। इसके पूर्व मनुष्य के मस्तिष्क के बारे में जानिए। वस्तुतः मनुष्य का मस्तिष्क तीन अलग-अलग भागों में विभक्त है एक भाग को चेतन मन, दूसरे भाग को अवचेतन मन एवं तीसरे भाग को अचेतन मन कहा जाता है। चेतन मन बाहरी दुनिया का आभास करवाता है बाहरी दुनिया से सीधे संपर्क में रहता है और अवचेतन मन वही करता है जो उसे चेतन मन करने का निर्देश देता है।

चेतन मन जिस चीज को गहराई से पकड़ता है अवचेतन मन उसे ही क्रियान्वित कर देता है। अचेतन मन एक स्टोर रूम की तरह रहता है। अब यदि मनुष्य अच्छे कार्यों को लगातार करता रहता है तो उसका अवचेतन मन उसी के अनुसार काम करना शुरू कर देता है। निरंतर अभ्यास के द्वारा अवचेतन मन उन अच्छे अच्छे कार्यों को पूरी तरह ग्रहण कर लेता है फिर ऑटोमेटिक रूप से वह कार्य होने लगते हैं।

अभ्यास क्यों जरूरी है
श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न करते हैं कि मन बहुत चंचल है लाख कोशिश करने के पश्चात भी मन नियंत्रित नहीं हो पाता है। “चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलव ढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥” अर्थात अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण मन अति चंचल, अशांत, हठी और बलवान है। मुझे वायु की अपेक्षा मन को वश में करना अत्यंत कठिन लगता है। मन को वश में करने के लिए अभ्यास जरूरी है।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि मनुष्य को अपने खान-पान, कार्य-कलापों, अमोद-प्रमोद और निद्रा को संतुलित रखना चाहिए। भगवान कहते हैं कि जिस प्रकार से वायु रहित स्थान पर रखे दीपक की ज्वाला में झिलमिलाहट नहीं होती। ठीक उसी प्रकार मन को स्थिर रखना चाहिए। वास्तव में मन को वश में करना कठिन है लेकिन अभ्यास और विरक्ति द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है। वैराग्य के विषय में जानने के पहले मन के बारे में जानिए।

“धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र समवेता युयुत्सव। मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सजंय।।” गीता के इस श्लोक का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक रहस्य यह है कि मन को नियंत्रित करना आवश्यक है

अर्जुन द्वारा व्यक्त की गयी अशांत मन की चर्चा हम सबके दुराग्रही (Abhyas or Vairagya kya hai) मन की दशा की ओर इंगित करती है। यह बेचैन रहता है क्योंकि यह एक विषय से दूसरे विषय की ओर अलग-अलग दिशाओं में भटकता रहता है। यह अशांत रहता है क्योंकि यह किसी की चेतना में घृणा, क्रोध, काम, लोभ, ईर्ष्या, चिन्ता, आसक्ति के रूप में उथल-पुथल उत्पन्न करता है।

यह शक्तिशाली है क्योंकि यह अपनी प्रबल धाराओं के साथ बुद्धि पर हावी हो जाता है और विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। मन हठी भी है क्योंकि जब मन में हानिकारक विचार आ जाते हैं तब फिर यह उन्हें मन से बाहर नहीं निकालता और निरन्तर बार-बार उनका तब तक चिन्तन करता है जब तक कि वे बुद्धि को भ्रमित न कर दें। इस प्रकार यहाँ मन के हानिकारक लक्षणों की गणना की गयी है।

अर्जुन भी स्वीकार करता है कि वायु की अपेक्षा मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है। यह एक सशक्त सादृश्य है कि कोई भी व्यक्ति आकाश में व्याप्त वायु शक्ति को नियंत्रित करने की सोच भी नहीं सकता।

इस श्लोक में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को भगवान कह कर सम्बोधित किया है। कृष्ण शब्द का अर्थ, “कर्षति योगिनां परमहंसानां चेतांसि इति कृष्णः” अर्थात “कृष्ण वह है जो मन को बलपूर्वक आकर्षित कर लेता है चाहे कोई दृढ़ मन वाला योगी और परमहंस ही क्यों न हो।” इस प्रकार से अर्जुन यह इंगित कर रहा है कि श्रीकृष्ण को उसके अस्थिर, अशांत, बलशाली और हठी मन को भी अपने आकर्षण में बाँध लेना चाहिए।

मन को नियंत्रित करना कठिन है, असंभव नहीं
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि “असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥” अर्थात भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि हे कुंती पुत्र महाबहू कुंती पुत्र मन के विषय में जो तुमने कहा वह सत्य है, मन को नियंत्रित करना वास्तव में कठिन है। किन्तु अभ्यास और विरक्ति द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

अर्जुन को महाबाहु के रूप में संबोधित कर श्रीकृष्ण अर्जुन के कथन की प्रतिक्रिया में कहते हैं-“हे बलिष्ठ भुजाओं वाले अर्जुन, तुमने युद्ध में महाबलशाली योद्धाओं को पराजित किया है तो क्या तुम मन को वश में नहीं कर सकते?” श्रीकृष्ण अर्जुन से यह कह कर इस समस्या को अस्वीकार नहीं करते- “हे अर्जुन तुम ऐसी व्यर्थ की चर्चा क्यों कर रहे हो? मन को सुगमता से नियंत्रित किया जा सकता है।” इसके विपरीत वे अर्जुन के इस कथन के साथ कि मन पर नियंत्रण प्राप्त करना कठिन है, अपनी सहमति प्रकट करते हैं।

यद्यपि संसार में बहुत-सी वस्तुओं को प्राप्त करना कठिन होता है तथापि हम निडर रहकर आगे बढ़ते हैं। नाविकों को ज्ञात होता है कि समुद्र में नाव चलाना जोखिम भरा कार्य है और भयानक तूफान आने की आशंका बनी रहती है। फिर भी वे इन जोखिमों को तट पर खड़े रहने का बड़ा कारण नहीं मानते। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि मन को वैराग्य और अभ्यास द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। अब वैराग्य के विषय में जानते हैं

सामान्य तौर पर वैराग्य का तात्पर्य संसार से विरक्त होने से लगाया जाता है। वैराग्य शब्द सुनते ही मन मस्तिष्क में भगवा कपड़ों में दिखाई देने वाले साधु संतों की छवि सामने आ जाती है। हालांकि यह वैराग्य का रूप नहीं है श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसक्ति एवं फल की इच्छा का त्याग करना ही वैराग्य है। संसार में रहते हुए सांसारिक कार्य करते हुए आसक्ति एवं फल की इच्छा नहीं करने वाला सच्चा योगी कहा गया है।

सचमुच वैराग्य सफलता की कुंजी है

हम देखते हैं कि मन अपनी आसक्ति के विषयों एवं पदार्थों की ओर आकर्षित होता है। इस दिशा की ओर बढ़ने से वह अतीत का चिन्तन करने का आदी हो जाता है। आसक्ति का उन्मूलन मन को अनावश्यक भटकने से रोकता है। अभ्यास एक ठोस और निरन्तर प्रयास है जिसका तात्पर्य पुरानी प्रवृत्तियों को परिवर्तित करना या नवीन विचार उत्पन्न करना है।

मनुष्य के लिए अभ्यास शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानवीय कर्मों और प्रयास के सब क्षेत्रों में अभ्यास पारंगतता और उत्कृष्टता के द्वार को खोलने की कुंजी है। ऋषि पतंजलि ने भी यही उपदेश दिया है “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधाः।। (पतंजली योगदर्शन-1.12)” अर्थात मन की व्याकुलता को निरन्तर अभ्यास और विरक्ति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

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