भाग:221) प्राकृतिक परमात्म ईश्वर की असीम कृपा से इस देहधारी जीव को मनुष्य योनि की प्राप्त होती है।
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट
ईश्वर की कृपा से ही मिलती है मनुष्य योनि’
बाराबंकी : जब जीव पर ईश्वर की असीम कृपा होती है तभी जीव को मनुष्य योनि प्राप्त होती है। मनुष्य मानव जीवन के सहारे अपने पिछले वर्तमान व भविष्य को ठीक कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। मानव अपने कर्मों से नर से निशाचर तथा मानव से महामानव व देवमानव बन सकता है।
यह बात भिटरिया दरियाबाद रोड स्थित कत्यानी प्रसाद मिश्र के आवास पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन हरिद्वार से पधारे पथिक जी के शिष्य स्वामी अक्षयानंद जी महराज ने कही। उन्होंने कहा कि मानव योनि अकेली ऐसी योनि है जिसमें मनुष्य अपने शरीर के विभिन्न अंगों से परमार्थ करके अपना मानव जीवन धन्य बना सकता है। स्वामी जी ने कहा कि गृहस्थ जीवन मनुष्य योनि का सर्वोत्तम आश्रम माना गया है। गृहस्थ द्वारा किए जाने वाले दैनिक कार्य ही उसकी पूजा होते हैं। तमाम कर्मों, कर्तव्यों एवं झंझावतों के मध्य ईश्वर की मौजूदगी का अहसास होना ही भक्ति है। यही कारण है कि मनुष्य योनि पाने के लिए देवता भी तरसते हैं और किसान को अन्नदाता, अन्नपूर्णा भगवान भी कहा जाता है। भगवान ने मनुष्य योनि परमार्थ करने के लिए बनाया है। सत्संग व भागवत कथा बड़ी भाग्य से प्राप्त होते हैं। जिनके कई जन्मों के भाग्य उदय होते हैं तभी यह अवसर मिल पाता है। कथावाचक ने कहा कि भागवत कथा पापी को भी मोक्ष प्रदान करने वाली होती है। भागवत कथा इंसान को इंसानियत की राह पर चलकर मानव जीवन को सार्थक करने की राह दिखाती है। कथा सुनने का फल तभी मिलता है जबकि कथा को इतने ध्यान से सुना जाए कि अपनी सुध-बुध ही न रह जाए। कुछ लोग कथा सुनने नहीं बल्कि अपनी कथा कहने आते हैं और कथावाचक के साथ ही वह भी अपनी कथा किया करते हैं। कुछ लोग कथा सुनने नहीं बल्कि सोने आते हैं और जब कथा शुरू होती है तब उन्हें गहरी नींद आ जाती है। इसीलिए श्रोता तीन तरह के बताए गए हैं। एक को श्रोता तो दूसरे की सोता तथा सरौता कहते हैं। सोता और सरौता को कथा का कोई लाभ नहीं मिलता है।
*”मनुष्यों को ईश्वर ने 5 विशेष सुविधाएं दी हैं, जो अन्य प्राणियों को या तो नहीं दी, या बहुत कम मात्रा में दी हैं। वे 5 सुविधाएं हैं बुद्धि, भाषा, दो हाथ, कर्म करने की स्वतंत्रता, और चार वेदों का ज्ञान।”* यह सब अपने अपने कर्मों का फल है। क्योंकि ईश्वर न्याय कारी है। वह कभी भी किसी व्यक्ति पर अन्याय नहीं करता।
ईश्वर से प्राप्त हुई इन 5 सुविधाओं का सदुपयोग भी किया जा सकता है, और दुरुपयोग भी। *”संसार में कुछ मनुष्य अच्छे होते हैं, और कुछ बुरे। अच्छे मनुष्य इन सुविधाओं का सदुपयोग करते हैं। इससे वे स्वयं भी सुखी रहते हैं और दूसरों को भी सुख देते हैं। बुरे मनुष्य इन सुविधाओं का दुरुपयोग करते हैं। इससे वे स्वयं भी दुखी रहते हैं, और दूसरों को भी दुख देते हैं।”*
*”जो अच्छे लोग हैं, वे इन 5 सुविधाओं का सदुपयोग करके अपनी भी रक्षा करते हैं, तथा परिवार समाज और राष्ट्र की रक्षा भी करते हैं। अन्य प्राणियों को भोजन चारा आदि देकर अनेक प्रकार से उनकी भी रक्षा करते हैं।”*
*”परंतु जो बुरे लोग हैं, वे इन सुविधाओं का दुरुपयोग करके दूसरों को मूर्ख बनाते हैं। उनका शोषण करते हैं। अवसर मिलते ही वे दूसरों को धोखा देते हैं, और उनसे सब प्रकार का लाभ लेकर अपनी स्वार्थ सिद्धि करते हैं।” ऐसे मनुष्य “वास्तव में मनुष्य नहीं” कहलाते, वे तो “राक्षस” कोटि में गिने जाते हैं।*
आप भी मनुष्य हैं। ईश्वर ने आपको भी ये 5 सुविधाएं दी हैं। *”इसलिए आप भी इन सब सुविधाओं का सदुपयोग करें। स्वयं सुख से जिएं और दूसरों को भी जीने दें।”*
*”जैसे कुत्ते नामक प्राणी में कुछ अच्छे गुण भी हैं, और कुछ कमियां भी हैं, जिनकी वजह से उसको ‘कुत्ता’ बोलकर अपमानित किया जाता है।”* परन्तु यदि आप उसकी कमियों पर ध्यान न देकर, उसमें विद्यमान गुणों पर ध्यान दें, तो उससे भी आप कुछ अच्छा गुण सीख सकते हैं।
कुत्ते में जो अच्छे गुण हैं, उनमें से एक गुण यह है, कि *”वह अपने मालिक का विश्वासपात्र अर्थात वफादार तो होता ही है। और यदि कोई बाहर का व्यक्ति भी अपने किसी मित्र के घर जाकर, उसके कुत्ते को चार पांच बार रोटी खिला दे, तो वह कुत्ता उसे भी पहचान लेता है, कि “यह व्यक्ति मेरे लिए हानिकारक नहीं है, बल्कि लाभदायक है।”* और तब उस कुत्ते में अच्छाई यह है, कि *”वह जीवन भर उस व्यक्ति को कभी नहीं काटता, जिसने चार पांच बार उस कुत्ते को खाना खिला दिया था। कुत्ते से यह अच्छाई तो सब मनुष्यों को सीखनी ही चाहिए।”*
जो अच्छे संस्कारी लोग हैं, वे तो इस गुण को धारण कर देते हैं। *”परन्तु जो बुरे मनुष्य हैं, वे 25 वर्ष तक दूसरे व्यक्ति का भोजन खा कर के भी, अवसर मिलते ही उसे काट खाते हैं, अर्थात उसे धोखा देते हैं।” “इस मामले में वे कुत्ते से भी गिरे हुए मनुष्य हैं।”*
ईश्वर ने मनुष्यों को जब बुद्धि आदि पांच अच्छी-अच्छी सुविधाएं दी हैं, तो उनका लाभ उठाते हुए ऐसे सोचना चाहिए, कि *”जब कुत्ते जैसा मामूली सा प्राणी भी यदि अपने मालिक का विश्वासपात्र या वफादार बनकर रह सकता है। तो मनुष्य तो कुत्ते से बहुत अधिक योग्य है। उसको तो भगवान ने पशुओं आदि से बहुत अधिक सुविधाएं दी हैं। उसे तो कुत्ते से बहुत अधिक विश्वास का पात्र या दूसरों का वफादार बनना चाहिए। तभी वह सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला सकता है, अन्यथा नहीं।”*
*”अतः सभी लोग दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करें। न्याय से व्यवहार करें। दूसरों का विश्वास जीतें। तभी वे वास्तव में सही अर्थों में मनुष्य कहलाएंगे और सुख से जीवन जी पाएंगे।
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