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जानिए प्राचीन वैदिक मेघविज्ञान बनाम भारतीय मान्सून विज्ञान की मंहिमा का वर्णन

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🎁ऋग्वेद ने मेघों के साथ धरती के रिश्तों को बड़े ही आत्मीयता के भाव से जोड़ा है। ‘पर्जन्य’ पिता है तो धरती माता है। पर्जन्य पिता का अमृत रस है। इस रस को धरती माता ब्रह्मांड के चराचर जगत् के संवर्धन हेतु धारण करती है। आकाागंंगा से मेघों द्धारा जब वर्षा का अमृत रस गिरता है तो धरती माता खुशी से गद्गद् हो जाती है क्योंकि उसकी बंजर भूमि में संतति के अंकुर जो फूटने वाले हैं। तभी वह शस्य श्यामला बनकर अपने मातृत्व धर्म का निर्वहन कर पाएगी और अपने पुत्रों की भी पालना कर सकेगी।🎁

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विित 7 फरवरी,2013 को रामजस कालेज, ‘संस्कृत परिषद्’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में संस्कृत’ के अंतर्गत ‘प्राचीन भारत में जलवायु विज्ञान’ पर वार्त्ता तथा कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर छात्रों को चार्टों के माध्यम से भारतीय मेघविज्ञान के संबंध में विशेष जानकारी भी दी गई। उसी अवसर पर दिए गए मेरे वक्तव्य से सम्बद्ध ‘भारतीय जलविज्ञान’ पर मेरा विशेष लेख “प्राचीन भारत में मेघविज्ञान”)
प्राचीन भारतीय मेघविज्ञान का इतिहास भी अन्य विज्ञानों की भांति वेदों से प्रारम्भ होता है। वैदिक संहिताओं के काल में इस मेघवैज्ञानिक मान्यता का ज्ञान हो चुका था कि पृथिवी या समुद्र का जो जल सूर्य द्वारा तप्त होकर वाष्प के रूप में ऊपर अन्तरिक्ष में जाता है वही जल मेघों के रूप में नीचे पृथिवी में बरसता है। आधुनिक जलविज्ञान इस वाष्पीकरण और जलवृष्टि की प्रक्रिया को ‘हाइड्रोलौजिकल साइकल’ अर्थात् ‘जलचक्र’ की संज्ञा प्रदान करता है-

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“समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः।
भूमि पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः।।”
– ऋग्वेद, 1.164.51
वैदिक मंत्रों में ब्रह्माण्ड के इस ‘जलचक्र’ को सम्पादित करने वाले सूर्य देव का विशेष आभार प्रकट किया गया है क्योंकि निरन्तर रूप से जलों के केन्द्र में रहकर वाष्पीकरण करने,वृष्टि के सहायक वृक्ष-वनस्पतियों को पुष्ट बनाने तथा जल की वर्षा करके पृथिवी को शस्य श्यामला बनाने में सूर्य की ही अहम भूमिका रहती है –

“दिव्यं सुपर्णं वायसं बृहन्तमपां गर्भं दर्शतमोषधीनाम्।
अभीपतो वृष्टिभिस्तर्पयन्तं सरस्वन्तमवसे जोहवीमि।।”
– ऋग्वेद, 1.164.52

हमारा देश कृषिप्रधान देश है | सिंचाई के सीमित साधनों के कारण ज़्यादातर कृषि बारिश पर ही निर्भर रहती है | यही कारण है कि वर्षा को जीवन का आधार माना गया है। इसका एक निश्चित मात्रा से कम या अधिक होना देश के पूरे अर्थतन्त्र को ध्वस्त कर देता है। ऋग्वेद के ‘पर्जन्य सूक्त’ में वर्णन मिलता हैं कि वर्षा के बिना जीवन असंभव है। ‘पर्जन्य’ अर्थात् मेघ को जीव जगत् का सर्वस्व बताया गया है (ऋ. 7.101.2) इसलिए ‘पर्जन्य’ देवता से वर्षा के लिए गर्भधारण हेतु प्रार्थना की गई है। भारतीय जलवायुविज्ञान में इसे ‘वृष्टिगर्भ’ कहते हैं जिसकी चर्चा हम विस्तार से आगे करेंगे। यहां हम मेघविज्ञान तथा वृष्टिविज्ञान की चर्चा इसलिए कर रहे हैं ताकि भारतीय जलविज्ञान के ‘हाइड्रोलौजिकल साइकल’ यानी ‘जलचक्र’ की अवधारणा से आधुनिक जलविज्ञानी भी अवगत हो सकें। ऋग्वेद के अनुसार ‘पर्जन्य’ देव यानी बादल जलों के उत्पादक और संवर्धक हैं और वनस्पतियों और औषधियों की उत्पत्ति तथा संवृद्धि इन्हीं पर्जन्य देवों की अनुकंपा से ही होती है।
दरअसल,ऋग्वेद ने मेघों के साथ धरती के रिश्तों को बड़े ही आत्मीयता के भाव से जोड़ा है। ‘पर्जन्य’ पिता है तो धरती माता है। पर्जन्य पिता का अमृत रस है। इस रस को धरती माता ब्रह्मांड के चराचर जगत् के संवर्धन हेतु धारण करती है। मेघों से जब वर्षा का अमृत रस गिरता है तो धरती माता खुशी से गद्गद् होती है क्योंकि उसकी बंजर भूमि में संतति के अंकुर जो फूटने वाले हैं।तभी वह शस्य श्यामला बनकर अपने मातृत्व धर्म का निर्वहन कर पाएगी और अपने पुत्रों की भी पालना कर सकेगी। ऋग्वेद के अनुसार स्वेच्छा से रूप धारण करने वाले ‘पर्जन्य’ देवों का वर्षा विहीन एक रूप प्रसव न करने वाली गौ के समान कहा गया है तो दूसरा रूप प्रसूता गौ जैसा है जिनसे वर्षा होती है। पिता स्वरूप ‘पर्जन्य’ का पोषण कारक पय (जल) पृथ्वी माता धारण करती है। उसी से पिता (पर्जन्य) तथा पुत्र (जीवधारी मनुष्य और किसान) दोनों पुष्ट होते हैं –

“स्तरीरु त्वद्भवति सूत उ त्वद्यथावशं तन्वं चक्रे एषः
पितुः पयः प्रति गृभ्णाति माता तेन पिता वर्धते तेन पुत्रः ॥” – ऋग्वेद, 7.101.3

भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है कि-
“अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः |
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||”
-भगवद्गीता,3.14

अर्थात् सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, पर्जन्य से अन्न उत्पन्न होता है। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से होती है और यज्ञ की उत्पत्ति नियत-कर्म करने से होती है।
🔥मेघों के विविध स्वेच्छाचारी रूप🔥
भारतीय प्रायद्वीप में जून-जुलाई के महीनों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून समुद्र की ओर से सक्रिय होता हुआ हिमालय पर्वत की ओर गतिशील रहता है। मेघों की इस वार्षिक यात्रा में स्थानीय तथा भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रकट होने वाले नाना प्रकार के मेघ आकाश में दिखाई देते हैं‚ उनमें से कुछ ऐसे मेघ होते हैं जो गरजते हैं, किंतु बरसते नहीं। कुछ काले रंग के होते हैं तो कुछ कपासी वर्ण के। भूरे‚ लाल और केसरी रंग के मेघ भी कभी कभी आकाश में दिखाई देते हैं। वराहमिहिर की ‘वृहत्संहिता’ और ‘मेघमाला’ आदि प्राचीन ग्रंथों में इन नाना प्रकार के मेघों का विस्तार से वर्णन किया गया है। कालिदास का ‘मेघदूत’ मेघविज्ञान का अद्भुत ग्रंथ है। मैने ‘मेघदूत में मानसूनविज्ञान’ नामक एक शोधलेख में यह प्रतिपादित किया है कि यक्ष द्वारा मेघ के माध्यम से विरहिणी यक्षिणी को संदेश भेजने का कथानक असल में भारतीय प्रायद्वीप में कालिदास कालीन मेघों की हिमालय यात्रा का मार्ग है। आषाढमास में गतिशील दक्षिण-पश्चिमी मानसूनों की उस भौगोलिक यात्रा का मार्ग रामटेक की पर्वत मालाओं से प्रारम्भ होता हुआ कैलास मानसरोवर में स्थित अलका नगरी में विराम लेता है। हिमालय प्रकृति की गोद में रचे-बसे महाकवि कालिदास के अनुसार मेघ कोई जड़ पदार्थ नहीं बल्कि उसे विभिन्न रूपों को धारण करने वाला इंद्र का ‘प्रकृति-पुरुष’ कहा गया है-

‘जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः’
– पूर्वमेघ, 6
कालिदास विज्ञानवादियों की उस मानसिकता से भी भलीभांति परिचित थे जो मेघ को महज धुएँ, पानी, धूप और हवा का संघात मानती थी और ऐसे जड पदार्थ में इन्द्रियों वाले प्राणी द्वारा ग्राह्य संदेश को पहुंचाने की क्षमता भला कहां हो सकती है ॽ मगर कालिदास ने मेघ की ऐसी जडवादी व्याख्ख्या करने वाले वैज्ञानिकों को ‘प्रकृति कृपण’ की संज्ञा दी है –
“धूमज्योति: सलिलमरुतां संन्निपात: क्व मेघ:
संदेशार्था: क्व पटुकरणै: प्राणिभि: प्रापणीया:।
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु।।”
– पूर्वमेघ,6
आकाश में तरह-तरह के रूप धारण करना, पिछले भाग से झुक कर नदियों का जलपान करना, बरसने के बाद द्रुत गति से भागना, दयालु स्वभाव के कारण कृषक जनों के प्रति आद्र होना, संतप्तों को राहत प्रदान करना इत्यादि मेघ की विशेषताओं का हवाला देते हुए कालिदास ने उन मौसम वैज्ञानिकों के सामने तर्क पेश किए हैं कि उनका मेघ चैतन्य पुरुष के सभी गुणों से सम्पन्न है। पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह मेघ जहां भी जाता है मार्गपथ में कृषिफल की अपार संभावनाएं उससे जुड़ी हुई हैं। उमंग से ग्राम-बधूटियाँ प्रेम से गीले अपने नेत्रों में उसे समा लेती हैं। और मेघ भी प्रेम में दिवाना होते हुए माल क्षेत्र के ऊपर इस प्रकार उमड़- घुमड़ कर बरसता है कि हल से तत्काल खुरची हुई धरती गन्धवती हो उठती है। परोपकारी मेघ तब भी ठहरता नहीं है। कुछ देर बाद पुनः लघुगति से: उत्तर की ओर चल पड़ता है-

“त्वाय्यायत्तंकृषिफलमिति भ्रूविलासानभिज्ञै:
प्रीतिस्निग्धैरर्जनपदवधूलोचनै: पीयमान:।
सद्य:सीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारुह्य मालं
किंचित्प:श्चा्द् व्रज लघुगतिर्भूय एवोत्तरेण।।”
– पूर्वमेघ, 16

आगामी लेख में पढिए –
भारतीय ऋतुविज्ञान में चार प्रकार के मेघ –
परोपकारी मेघ ‘पुष्करावर्तक’
विनाशकारी मेघ ‘द्रोण-संवर्तक’

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