✍️टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट
श्रीमद्- भगवत गीता में न केवल हिन्दू धर्म के प्राचीन पहलू कर्मकाण्ड पर विश्वास का, वरन आत्म संयम पर आधारित समस्त प्राणीमात्र के जीवन में नीतिशास्त्र का विकास दृष्टि गोचर होता है। गीता में इस बात पर बल दिया गया है कि जगत की व्यापार अविच्छिन्न गति से चलता रहे साधु पुरुष आन्तरिक रूप से अलिप्त होते हुए भी वाह्य रूप में दूसरों के समान ही कार्यरत रहें। गीता में बताया गया है कि सफलता एवं असफलता में निस्वार्थ भाव से कार्य करने, निरंतर ध्यान प्रार्थना व भक्ति के द्वारा प्रगति का अधिकारी होता है। और अन्ततः अपने आप को सभी वस्तुओं में और सभी वस्तुओं को ईश्वर में देखता है। सांसारिक कार्यों के बीच यही समर्पित जीवन योग कहलाता है और ऐसे ही कर्मयोगी श्रेष्ठ कहलाते हैं।1 ऐसे ही योगी सृष्टि एवं ब्रह्म के रहस्य को समझने में समर्थ होते हैं।
गीता में रहस्यवाद संगत मत-
वस्तुतः जो परम कारण हमारा आधार है और जिस पर हमारे मन की प्रत्येक गतिविधि आधारित है। उसे परिव्याप्त करने अथवा उसका मापन करने के लिए हम तटस्थ नहीं हो सकते। मनुष्य के ज्ञान की यह मर्यादा वैज्ञानिक तथा दार्शनिक गवेषणाओं की सुपरिचित सीमा है। किसी भी सत्य का अवगाहन, प्रपंच की गवेषणा या किसी भी विशिष्टता का पर्याप्त गहराई तक परीक्षण के बाद अन्ततः अज्ञात का विशालखण्ड प्राप्त हो ही जाता है। तत्पश्चात् उन्नति बाधित हो जाती है। यही मर्यादा रहित अज्ञात धर्म धर्मग्रन्थों और ऋषि मुनियों की वाणी तथा कार्यों का विषय होता है। उनकी पद्धति वही नहीं है जो वस्तु के सम्बन्ध में विज्ञान की होती है। भिन्नता होते हुए भी वही एक मात्र संभव पद्धति भी है? सामान्यतः प्रश्न उठता है कि अज्ञात की चिन्ता क्यों की जाय? इसका क्या उपयोग है?
उल्लेखनीय है कि ज्ञान के अभाव मे ंरहस्य को समझना कठिन है श्रीमद्भगवद् गीता में कहा गया है कि ज्ञान के अभाव में अज्ञात की वास्तविकता का निषेध नहीं किया जा सकता है। मानवीय दृष्टि के सामने आने वाली शून्यता वस्तुतः शून्यता नहीं है, अपितु वह अत्यन्त महत्वपूर्ण वास्तविकता से परिपूर्ण है। यह बात अलग है कि हम उसमें गहरे नहीं उतर सकते हैं। उसका विश्लेषण नहीं कर सकते या समझ नहीं पाते2 गीता में इसी प्रकार के रहस्यमय वर्णन प्राप्त होते हैं। इसीलिए बाल गंगाधर तिलक ने कहा कि
सन्तों की उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी। जानू उसका भेद भला क्या मैं अज्ञानी3
गीता में अर्जुन का मोह भ्रम भी विकट है। यथार्थ ज्ञान को अनात्म सम्बन्धों से उत्पन्न समस्त बंधनों को छिन्न कर देता है। पर अर्जुन जिससे ज्ञान समझ रहा था वह उसके पाशों को और भी सुदृढ़ बना देता है तभी तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रज्ञावादाश्च भाषसे अर्थात तू प्रज्ञावादों को बोल रहा है।4 प्रज्ञावाद का लक्षण है कि मुंह से तो बड़ी-बड़ी बात कहेंगे, पर हमारे कार्य उनके अनुरूप नहीं होंगे कथनी और करनी का अन्तर प्रज्ञावाद का विशिष्ट लक्षण है। शंकराचार्य भी पंडित शब्द का भाष्य करते हैं कि- पण्डा आत्म विषया बुद्धिः येषां तेहि पंण्डिताः अर्थात आत्म विषयक बुद्धि का नाम पण्डा है6 और वह बुद्धि जिसमें हो वह पंडित है दूसरे शब्दों जो आत्म मति ज्ञानी जन हैं वे न तो शरीर के लिए शोक करते हैं न आत्मा के लिए आत्मा और शरीर की भिन्नता का वास्तविक ज्ञान प्रदान करने वाले ज्ञान की महिमा को उपेक्षित नहीं किया जा सकता।
रहस्यवाद के अनुसार भी प्रत्येक वस्तु एकरूपता से परिपूर्ण है। संसार की प्रत्येक वस्तु सामंजस्य की द्योतक है। डाॅ. दुर्गादत्त पांडे के अनुसार रहस्यवाद का सम्बन्ध संतों के रहस्यात्मक अनुभव से है जो सांसारिक अनुभव से भिन्न है।7 भाषा में व्यक्त न होने के कारण यह नहीं कहा जा सकता है कि रहस्यानुभूति आत्मनिष्ठ है, अपितु रहस्यानुभव ईश्वर या ब्रह्म का साक्षातकार है, अतः प्रज्ञानात्मक है।
निर्विवाद है कि रहस्यानुभूति साधारण तर्क और सामान्य भाषा के परे है और सर्वजनीन सत्य नहीं है, क्योंकि रहस्यानुभूति में किसी को राम, किसी कृष्ण किसी को मां काली का साक्षात्कार होता है। इसी विशिष्टता के कारण रामचरित मानस में कहा गया है कि- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।कहहि सुनहि बहुविधि सब सन्ता।।8
गीता में कहा गया है कि साधारण वस्तुओं से भिन्न रहस्यमय परमतत्व को तत्वदर्शी ही जान सकता है।9 गीता में धार्मिक अनुभव के अन्तर्गत परमतत्व ही ईश्वर तत्व है जो प्राण मात्र का ईश्वर होते हुए जीवों के हित के लिए अपनी प्रकृति को अधीन करके स्वतंत्रता पूर्वक युग-युग में अवतीर्ण होता है।10 प्रश्न यह उठता है कि जब तत्वदर्शी ही रहस्यमय परमतत्व भगवान के जन्म और कार्य को देख पाता है तो लोग इतनी बड़ी संख्या में भीड़ लगाए क्यों खड़े हैं कि कहीं रहस्यमय तत्व रूपी ईश्वर का अवतार होगा तो दर्शन करेंगे? क्या वे सभी तत्वदर्शी हैं? ऐसा नहीं है कि पांच तत्व है, पच्चीस तत्व है इनकी गणना सीघ्र की और हो गए तत्वदर्शी। यथार्थ गीता में कहा गया है कि आत्मा ही रहस्यमय परमतत्व है, आत्मा परम से संयुक्त होकर परमात्मा हो जाता है। आत्म साक्षात्कार करने वाला ही इस रहस्यमय आविर्भाव को समझ पाता है, इस प्रकार अवतार किसी विरही अनुरागी के हृदय में होता है। आरम्भ में उसे वह नहीं समझ पाता कि हमें कौन संकेत देता है? कौन मार्गदर्शन करता है? किन्तु परमतत्व परमात्मा के दर्शन के साथ ही वह रहस्य को देख पाता है, समझ पाता है और फिर शरीर को त्याग कर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता है। यह रहस्यमय तत्व अनिर्वचनीय बतलाया गया है।
रहस्यमय परमतत्व की अनिर्वचनीयता-रहस्यमय परमतत्व की शक्तियां अनंत हैं;उनकी दिव्य शक्तियों में एश्वर्य शक्ति और माधुर्य शक्ति दोनों हैं। ऐश्वर्य शक्ति से परमात्मा ऐसे रहस्यमय कार्य करते हैं, जिनको दूसरा कोई कर नहीं सकता। इसके कारण उनमें जो महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता, दृष्टिगोचर होती है। वह परमात्मा के अतिरिक्त किसी मेें नहीं है। रामचरितमानस में भी रहस्यमय परमतत्व की अवर्णनीयता बतलाते हुए कहा गया है कि रहस्यमय परमतत्व परमात्मा- बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है बिना ही हाथ के विभिन्न प्रकार के कार्य करता है। इस प्रकार उस परमतत्व की करनी अलौकिक है, जिसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है।11 रहस्यवादी इसी आध्यात्मिक सत्ता को ईश्वर, ब्रह्म, परमतत्व आदि को विभिन्न संज्ञा से अभिहित करते हैं। धर्म दर्शन के अन्तर्गत रहस्यवाद को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है12 बहिर्मुखी एवं अंतर्मुखी रहस्यवाद।
बहिर्मुखी रहस्यवाद-
बहिर्मुखी रहस्यवाद में रहस्यवादी भौतिक जगत के माध्यम से आध्यात्मिक सत्ता का तथा वाह्य जगत के भेदों का अनुभव करता रहता है, अतः वह असाधारण अनुभव की उच्चतम अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाता, जिसमें सामान्य चेतना के समस्त तत्वों का नितांत अभाव होता है। इसी कारण बहिर्मुखी रहस्यवाद को अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण स्वीकार किया गया है। स्टेस् के अनुसार बहिर्मुखी रहस्यवाद अन्तर्मुखी रहस्यवाद की आरम्भिक अवस्था जिसके पश्चात् रहस्यावादी रहस्यात्मक अनुभव की उच्चतम स्थिति को प्राप्त करने में समर्थ होता है।13
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वरूप की प्राप्ति शरीर की प्राप्ति से भिन्न है। मेरा जन्म इन आंखों से नहीं देखा जा सकता, मैं अजन्मा अव्यक्त शाश्वत होते हुए भी शरीर के आधार वाला हूं।14 बहिर्मुखी रहस्यवाद के अन्तर्गत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि रहस्यमय संसार एक वृक्ष है उसको काटते हुए भी योगी जन उस परमपद या अन्तर्मुखी रहस्यवाद को खोजते हैं।15 जिसने उस रहस्यमय संसार वृक्ष को जाना है उसने वेद को जाना है न कि ग्रन्थ पढ़ने वाला। इस रहस्यमय संसार वृक्ष तीनों गुणों द्वारा बढ़ी हुई विषय और भोग रूपी अंतिम जन्म वाली शाखाएं नीचे और सर्वत्र फैली हुई हैं तथा केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बंधन तैयार करती है। परन्तु इस रहस्यमय संसार वृक्ष का रूप जैसा कहा गया है वैसा यहां नहीं पाया जाता है क्योंकि न तो इसका आदि है न अंत है और न ही अच्छी प्रकार से इसकी स्थिति ही है। क्योंकि यह परिवर्तनशील है और वाह्य रहस्य का विषय बना हुआ है। यहां सहजतः प्रश्न उठता है कि इस बहिर्मुखी रहस्य का मूल कौन है? उल्लेखनीय है कि बहिर्मुखी रहस्यवाद को वास्तविक अर्थ में रहस्यवाद कहना कठिन है। कारण यह है कि इस प्रकार के रहस्यवाद में, रहस्यवाद निरन्तर वाह्य जगत के संपर्क में बना रहता है। जिसके फलस्वरूप वह रहस्यात्मक अनुभव की उस असाधारण स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है16 जो रहस्य का मूल है।
अन्तर्मुखी रहस्यवाद-
इसके अन्तर्गत रहस्यवादी वाह्य जगत के स्थान पर अपने ही भीतर आध्यात्मिक सत्ता का साक्षात अनुभव करता है, तो उस स्थिति को अन्तर्मुखी रहस्यवाद की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसमें रहस्वादी पूर्णतः अन्तर्मुखी हो जाता है। प्रश्न उठता है कि अन्तर्मुखी रहस्यवाद के अनुभव को प्राप्त करना कैसे सम्भव है प्राचीनकाल से ही अनेक योगी विभिन्न प्रकार के योग साधनाओं से इस अनुभव की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहे हैं, योग दर्शन में वर्णित यम, नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान धारणा आदि उपाय इस रहस्यात्मक अनुभव को प्राप्त करने में सहायक होते हैं। गीता में कहा गया है कि योग में स्थित होकर किया हुआ कर्म न केवल उच्चतम होता है अपितु अत्यन्त विवेकपूर्ण, लौकिक व्यवहार के लिए भी अत्यन्त बल युक्त होता है। परमतत्व परमेश्वर के ज्ञान और इच्छा से अनुप्राणित रहता है17 रहस्यमय परमतत्व समस्त ज्योतियों की भी परमज्योति है18 अभिन्न भाव से प्रत्यक्ष हो जाना ही उसकी प्राप्ति है। वैराग्य को भी रहस्यात्मक अनुभव प्राप्त करने का साधन माना जाता है19
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