Breaking News

जानिए…धर्म शास्त्रों के अनुसार चंद्र उपग्रह का महात्म्य एवं परिक्षेत्रफल

Advertisements

 

Advertisements

✍️टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

Advertisements

भारतीय वैदिक विज्ञान एवं धर्म शास्त्रियों के अध्ययन सर्वेक्षण और दर्शन के अनुसार जब सूर्य अस्त होता है तब चांद- चंद्रमा का उदय-उदगम होता है और चांद-चंद्रमां अस्त के होता है तब सूर्य का अस्त होता है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार चंद्रमा मन, माता, मानसिक स्थिति, मनोबल, द्रव्य वस्तुओं, यात्रा, सुख-शांति, धन-संपत्ति, रक्त, बाईं आंख, छाती आदि का कारक होता है। चंद्रमा राशियों में कर्क और नक्षत्रों में रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्र का स्वामी होता है। इसका आकार ग्रहों में सबसे छोटा है परंतु इसकी गति सबसे तेज़ होती है। चांद का कुल क्षेत्रफल दुनिया के किसी महाद्वीप के बराबर होगा. मून दुनिया के सबसे बड़े महाद्वीप अफ्रीका के बराबर है. अफ्रीका महाद्वीप का कुल क्षेत्रफल करीब 2.0 करोड़ वर्ग मील है, यानि अफ्रीका चांद से कुछ बड़ा ही है. चंद्रमा हमारी पृथ्वी से 384,400 किलोमीटर दूर है।
चंद्र उपग्रह दुनिया के सबसे बड़े महाद्वीप अफ्रीका के बराबर माना जा रहा है. अफ्रीका महाद्वीप का कुल क्षेत्रफल करीब 2.0 करोड़ वर्ग मील है, यानि अफ्रीका चांद से कुछ बड़ा ही है. चंद्रमा हमारी पृथ्वी से 384,400 किलोमीटर दूर है

सौरमंडल का 5 वां सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा पृथ्‍वी के सबसे नजदीक माना गया है। पृथ्वी से लगभग 3,84,365 किलोमीटर दूर चंद्रमा का धरातल असमतल है और इसका व्यास 3,476 किलोमीटर है तथा द्रव्यमान, पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 1/8 है। पृथ्वी के समान इसका परिक्रमण पथ भी दीर्घ वृत्ताकार है। सूर्य से परावर्तित इसके प्रकाश को धरती पर आने में 1.3 सेकंड लगता है।
भले ही हम चंद्रमा को रात के आकाश में चमकते हुए देख सकते हैं – और कभी-कभी दिन के उजाले में – यह परिप्रेक्ष्य में रखना मुश्किल है कि हमारा निकटतम पड़ोसी वास्तव में कितना बड़ा और कितना दूर है।
अन्तरिक्ष में मानव सिर्फ चन्द्रमा पर ही कदम रख सका है। सोवियत राष्ट् का लूना-1 पहला अन्तरिक्ष यान था जो चन्द्रमा के पास से गुजरता था
लेकिन लूना-2 पहला यान था जो चन्द्रमा की धरती पर उतरा था। सन् 1968 में केवल नासा अपोलो कार्यक्रम ने उस समय मानव मिशन भेजने की उपलब्धि हासिल की थी और पहली मानवयुक्त ‘ चंद्र परिक्रमा मिशन ‘ की शुरुआत अपोलो -8 के साथ की गई।
शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी खोज पुख़्ता करती है कि चंद्रमा की उत्पत्ति टक्कर के बाद हुए भारी बदलाव का नतीजा थी।
ये अध्ययन एक साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. वैसे ये कोई नया सिद्धांत नहीं है. ये पहले से माना जाता रहा है कि चांद का उदय खगोलीय टक्कर के परिणाम स्वरूप हुआ था. हालांकि एक दौर ऐसा भी आया
जब कुछ लोग कहने लगे कि ऐसी कोई टक्कर हुई ही नहीं। लेकिन वर्ष 1980 से आसपास से इस सिद्धांत को स्वीकृति मिली हुई है कि 4.5 बिलियन साल पहले पृथ्वी और थिया के बीच हुई टक्कर ने चंद्रमा कीउत्पत्ति की थी।
थिया का नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं में मौजूद सीलीन की मां के नाम पर रखा गया था. सीलीन को चांद की मां कहा जाता है।
समझा जाता है कि टक्कर होने के बाद थिया और धरती के टुकड़े एक दूसरे में समाहित हो गए और उनके मिलने से चांद की पैदाइश हुई। तो चलिए जानते है — चंद्रमा का क्षेत्रफल कितना है
क्षेत्रफल की बात करे तो, चांद का क्षेत्रफल 37940000 km² (37.94 मिलियन वर्ग किलोमीटर) बड़ा है। वही हमारे पृथ्वी का क्षेत्रफल 510000000 km² (510 मिलियन वर्ग किलोमीटर) हैं। चांद की जो, ध्रुवीय त्रिज्या है वह 1736 किमी मतलब 1078 मील है। ध्रुवीय त्रिज्या के अनुसार देखा जाए तो चांद 3472 किमी बड़ा है। अर्थात चांद 2156 मील बड़ा है। वही अगर हम भूमध्य रेखा की त्रिज्या देखे तो, भूमध्य रेखा पर चांद की त्रिज्या 1738 किमी (1079 मील) हैं।

यदि भूमध्य रेखा के हिसाब से देखे तो चांद 3476 किमी बड़ा है। अर्थात चांद 2158 मील बड़ा है। इन सभी अलग अलग आंकड़ों का हम औसत निकाल ले
तो, चांद की औसतन त्रिज्या 1737 किलोमीटर अर्थात 1079 मील बनती है। इसके अनुसार देखे तो, चांद का व्यास 3474 किमी (2158 मील) होता है। मतलब हम कह सकते हैं कि, लंबाई और चौड़ाई के मामले में चांद वास्तव मे औसतन 3474 किलोमीटर बड़ा है। अर्थात चांद औसतन 2157 मील बड़ा है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एक अण्डाकार कक्षा में घूमता है, जिसका अर्थ है कि हमारे ग्रह से इसकी दूरी लगातार बदल रही है।
यह दूरी एक कक्षा के दौरान 50,000 किमी तक भिन्न हो सकती है, यही वजह है कि हमारे आकाश में चंद्रमा का आकार सप्ताह-दर-सप्ताह थोड़ा भिन्न होता है। चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। यह सौर मंडल का पाँचवां,सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है। इसका आकार क्रिकेट बॉल की तरह गोल है। और यह खुद से नहीं चमकता बल्कि यह तो सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है।
पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी 384,403 किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी के व्यास का 30 गुना है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 1/6 है। यह पृथ्वी कि परिक्रमा 27.3 दिन में पूरा करता है और अपने अक्ष के चारो ओर एक पूरा चक्कर भी 23.3 दिन में लगाता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का एक ही हिस्सा या फेस हमेशा पृथ्वी की ओर होता है।
यदि चन्द्रमा पर खड़े होकर पृथ्वी को देखे तो पृथ्वी साफ़ साफ़ अपने अक्ष पर घूर्णन करती हुई नजर आएगी लेकिन आसमान में उसकी स्थिति सदा स्थिर बनी रहेगी अर्थात पृथ्वी को कई वर्षो तक निहारते रहो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। पृथ्वी- चन्द्रमा-सूर्य ज्यामिति के कारण “चन्द्र दशा” हर 29.5 दिनों में बदलती है। आकार के हिसाब से अपने स्वामी ग्रह के सापेक्ष यह सौरमंडल में सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी का एक चौथाई तथा द्रव्यमान 1/81 है। बृहस्पति के उपग्रह lo के बाद चन्द्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। सूर्य के बाद आसमान में सबसे अधिक चमकदार निकाय चन्द्रमा है।
समुद्री ज्वार और भाटा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण आते हैं। चन्द्रमा की तात्कालिक कक्षीय दूरी, पृथ्वी के व्यास का 30 गुना है इसीलिए आसमान में सूर्य और चन्द्रमा का आकार हमेशा सामान नजर आता है। वह पथ्वी से चंद्रमा का 59 % भाग दिखता है जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ सूर्य और पृथ्वी के बीच से होकर गुजरता है और सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है तो उसे सूर्यग्रहण कहते हैं।

चन्द्रमा की उत्पत्ति कैसे हुआ

चंद्रमा की उत्पत्ति आमतौर पर माने जाते हैं कि एक मंगल ग्रह के शरीर ने धरती पर मारा, एक मलबे की अंगूठी बनाकर अंततः एक प्राकृतिक उपग्रह, चंद्रमा में एकत्र किया, लेकिन इस विशाल प्रभाव परिकल्पना पर कई भिन्नताएं हैं, साथ ही साथ वैकल्पिक स्पष्टीकरण और शोध में चंद्रमा कैसे जारी हुआ। अन्य प्रस्तावित परिस्थितियों में कब्जा निकाय, विखंडन, एक साथ एकत्रित (संक्षेपण सिद्धांत), ग्रहों संबंधी टकराव (क्षुद्रग्रह जैसे शरीर से बने), और टकराव सिद्धांत शामिल हैं। मानक विशाल-प्रभाव परिकल्पना मंगल ग्रह के आकार के शरीर को बताती है, थिआ कहलाता है, पृथ्वी पर असर पड़ता है, जिससे पृथ्वी के चारों ओर एक बड़ी मलबे की अंगूठी पैदा होती है, जिसके बाद चंद्रमा के रूप में प्रवेश किया जाता है।

इस टकराव के कारण पृथ्वी के 23.5 डिग्री झुका हुआ धुरी भी उत्पन्न हुई, जिससे मौसम उत्पन्न हो गया। चंद्रमा के ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात पृथ्वी के लिए अनिवार्य रूप से समान दिखते हैं।ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात, जिसे बहुत ठीक मापा जा सकता है, प्रत्येक सौर मंडल निकाय के लिए एक अद्वितीय और विशिष्ट हस्ताक्षर उत्पन्न करता है। अगर थिया एक अलग प्रोटॉपलैनेट था, तो शायद पृथ्वी से एक अलग ऑक्सीजन आइसोटोप हस्ताक्षर होता, जैसा कि अलग-अलग मिश्रित पदार्थ होता।
इसके अलावा, चंद्रमा के टाइटेनियम आइसोटोप अनुपात (50Ti / 47Ti) पृथ्वी के करीब (4 पीपीएम के भीतर) प्रतीत होता है, यदि कम से कम किसी भी टकराने वाला शरीर का द्रव्यमान चंद्रमा का हिस्सा हो सकता है

भारतीय धर्म शास्त्रों में चन्द्रमा के विषय में जितना अधिक वर्णन मिलता है, उतना अन्यत्र किसी भी ज्ञानकोष में नहीं है। चंद्रमा के जिस दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-2 को उतरना था, हमारे शास्त्रों ने उसे पितरों की भूमि माना है। चंद्रमा के उस छोर पर जो हमें दिखाई नहीं देता, यानी दक्षिणी ध्रुव, वहां 15 दिन अंधेरा, 15 दिन उजाला होता है। हमारा ज्योतिष विज्ञान कितना उन्नत है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आधुनिक विज्ञान आज भी चंद्रमा पर पानी और बर्फ की खोज कर रहा है लेकिन हमारे ज्योतिष विज्ञान में चंद्रमा को जलतत्व का कारक ग्रह कहा गया है।
महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन के ज्योतिर्विज्ञान के असि. प्रो. उपेंद्र भार्गव के मुताबिक चन्द्रमा को ध्यान में रखकर हमारे धर्मशास्त्रीय विधान, जप, तप, व्रत, उपवास, दान, यात्रा, विवाह एवं उत्सव आदि का निर्णय किया जाता रहा है। चन्द्रमा हमारे सनातन धर्म में वर्णित प्रत्यक्ष देवताओं में प्रधान देवता है। प्राचीन वैदिक काल से ही प्रकृति एवं परमात्मा के प्रतीक के रूप में जिन देवताओं की पूजा की जाती है उनमें सूर्य, अग्नि, वरुण, वायु, पृथ्वी, इन्द्र एवं चन्द्रमा प्रमुख हैं। सौम्य एवं शीतल किरणें होने के कारण चन्द्रमा को सोम, शीतकर, शीतगु तथा रात्रि का स्वामी होने के कारण राकेश, निशाधिपति, निशाकर, आदि भी कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से चन्द्रमा की गति पूर्वाभिमुख है। वह कर्क राशि का स्वामी, गौर वर्ण का, वायव्य दिशा का अधिपति, शुभग्रह, सत्वगुणयुक्त, जलतत्व प्रधान, जलीय ग्रह है तथा मणि उसकी धातु कही गयी है।

चन्द्रमा की उत्पत्ति के विषय में वेद में कहा गया है कि ब्रह्मा अर्थात् सृष्टिकर्ता ने सर्वप्रथम भूमितत्त्व को उत्पन्न किया तदनन्तर मरुद्गण (४९ प्रकार की वायु) को उत्पन्न किया इसके उपरान्त ब्रह्मा ने आदित्य(सूर्य) को उत्पन्न किया तथा सूर्य से ही चन्द्रमा की उत्पत्ति हुयी। माध्यन्दिनी संहिता में कहा गया है- ‘‘ब्रह्मा ने कामना की, भूमि उत्पन्न हो, और भूमि उत्पन्न हो गयी। उन्होंने सूर्य के उत्पन्न होने की कामना की और सूर्य सहित दिशाएं उत्पन्न हो गईं। एक विशालकाय सोने का अण्डा (हिरण्यगर्भ) उत्पन्न हुआ जिसमें विक्षोभ हुआ और वह दो भागों में विभक्त हुआ उसके विभाजन से प्रवाहित हो रहे रेतस् से चन्द्रमा तथा नक्षत्र आदि उत्पन्न हुए। वायु पुराण में कहा गया है कि नक्षत्र, चन्द्रमा एवं ग्रह आदि सभी की उत्पत्ति सूर्य से हुयी है।“अग्नीषोमात्मकं जगत्” के अनुसार संसार अग्नि और सोम रूप है । अग्नि ही सूर्य रूप में व्याप्त होता है और सोम चन्द्रमा के रूप में । सृष्टि में दोनों की अनिवार्य आवश्यकता है।
वैदिक साहित्य में चन्द्रमा की गति का भी उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में अमावास्या में उदयकालिक सूर्य की ओर जाते हुए शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्य से आगे निकलते हुए चन्द्रमा को देखकर लिखा गया है- ‘‘चन्द्रमा वा अमावास्यायाम् आदित्यमनुप्रविशति, आदित्याद्वै चन्द्रमा जायते” अर्थात् चन्द्रमा अमावस्या में सूर्य में प्रवेश करता है और पुनः सूर्य से ही प्रकट होता है। चन्द्रमा में स्वयं का प्रकाश नहीं होता इस विषय का ज्ञान भी वैदिक काल में किया जा चुका था कि वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। इस कारण तैतिरीय संहिता में चन्द्रमा को “सूर्य-रश्मि चन्द्रमा” कहकर संबोधित किया गया है। शुक्लयजुर्वेद के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मन से चन्द्रमा की उत्पत्ति हुयी है अतः चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है। ऋग्वेद के अनुसार चन्द्रमा की किरणें अमृत बिन्दु के समान हैं तथा वह समस्त औषधियों का स्वामी है

*“त्वमिमा ओषधी: सोम विश्वास्त्वमपो अजनयंस्त्वं गा:। त्वमा ततन्योर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ॥*

हिन्दू धर्मशास्त्रों की मान्यता अनुसार हमारे पूर्वज जो मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं वे पितर बन जाते हैं तथा उनका निवास स्थान चन्द्रमा का वही पृष्ठीयभाग है जिसे हम विपरीत दिशा में होने के कारण देख नहीं सकते हैं, जो कि सूर्यग्रहण का भी कारण होता है, हमारे धर्मशास्त्रों में इसे ही पितृलोक कहा गया है। हमारे मन में यह शंका अवश्य होती है कि यदि वहां पितृलोक है तो पितर दृष्टिगोचर क्यूँ नहीं होते ? इस सम्बन्ध में शास्त्र का मत है कि जिस लोक का हम विचार कर रहे हैं उस लोक के अनुरूप ही वहां का जीवन एवं शरीर भी होता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर पांचभौतिक पार्थिव शरीर होता है वैसे ही अन्य लोकों में उनसे सम्बन्धी तत्व से युक्त शरीर होते हैं जिन्हें सामान्य दृष्टि से देखना संभव नहीं है। पुराणों के अनुसार एक बार रावण ने चंद्रलोक में जाकर चन्द्रमा पर बाणों का प्रयोग किया था तथा ब्रह्मा की आज्ञा से वह वापस लौट आया था। महिषासुर ने भी चन्द्रमा पर अपना आधिपत्य जमा लिया था जिसे देवी दुर्गा ने मृत्यु प्रदान की थी। धर्मशास्त्र के अनुसार चन्द्रमा या चन्द्रलोक को एक दिव्यधाम माना गया है जहां विविध प्रकार का सुख वैभव माना जाता है और उसे धर्ममार्ग, तप या योगपूर्वक ही प्राप्त किया जा सकता है।
वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में चन्द्रमा की कलात्मक ह्रास वृद्धि की स्थिति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “जिस तरह धूप में स्थित घड़े का सूर्य की तरफ का आधा भाग रोशनी वाला और विरुद्ध दिशा में स्थित दूसरा आधा भाग अपनी छाया से ही काला दिखाई देता है, उसी तरह सदा सूर्य के अधोभाग में स्थित चन्द्रमा का सूर्य की तरफ का आधा भाग शुक्ल और उसके विपरीत का अर्धभाग अपनी ही छाया से कृष्ण दिखाई देता है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को जलीय ग्रह कहा जाता है, अतः उसके रात्रि में प्रकाशित होने के कारण को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि “जिस प्रकार दर्पण पर गिरी हुयी सूर्य की किरणों के प्रतिबिम्ब से घर के अन्दर का अन्धकार नष्ट होता है, उसी तरह जलमय पिण्ड की तरह दिखने वाले चन्द्रमा के ऊपर गिरने वाली सूर्य की किरणों के प्रतिबिम्ब से पृथ्वी पर रात्रि संबंधी अन्धकार नष्ट होता है। चन्द्रमा पर होने वाले उल्कापातों के विषय में भी भारतीय ज्योतिषियों को ज्ञान हो चुका था।
उन्होंने ग्रहण काल में चन्द्रमा पर होने वाले उल्कापातों के फल का भी विवेचन किया। भारतीय गणितज्ञों ने चन्द्रमा की परिधि का मान सूर्यसिद्धान्त के अनुसार 480 योजन तथा कक्षामान 3,24,000 योजन तथा आर्यभट के अनुसार चन्द्रपरिधि 315 योजन तथा कक्षामान 2,16,000 योजन के बराबर बताया है जो कि लगभग आधुनिक मान के तुल्य ही है। आधुनिक मान में लगभग 12 किलोमीटर का एक योजन माना गया है तदनुसार उक्त गणना का आंकलन किया जा सकता है।
चन्द्रसापेक्ष घटित होने वाले दिन रात को भारतीय गणितज्ञों ने पैत्रमान (पितरों से सम्बन्धित दिनरात्रि व्यवस्था) कहा है –

*त्रिंशता तिथिभिर्मासश्चान्द्रः पित्र्यमहः स्मृतः।*
*निशा च मासपक्षान्तौ तयोर्मध्ये विभागतः।।*

अर्थात – चन्द्रमा की 30 तिथियों का एक चान्द्रमास होता है, तथा वही एक मास पितरों का एक अहोरात्र (दिन-रात) के बराबर होता है। अर्थात् 15 तिथियों के बराबर एक दिन और 15 तिथियों के बराबर एक रात्रि होती है। अमावस्या को पितरों की मध्यरात्रि एवं पूर्णिमा को दिनार्द्ध होता है। कृष्णपक्ष की साढ़े सप्तमी से पितरों के दिन का आरंभ तथा शुक्लपक्ष की साढ़े सप्तमी से उनकी रात्रि का आरम्भ होता है।

*सहर्ष सूचनार्थ नोट्स:-*
*उपरोक्त लेख वैदिक सनातन हिन्दू धर्म शास्त्रों तथा आध्यात्मिक विशेषज्ञ संंत-महात्माओं के प्रवचनों से संकलन किया गया है। आध्यात्मिक सामान्य ज्ञान की जानकारी के लिए प्रस्तुत। धन्यवाद*

Advertisements

About विश्व भारत

Check Also

मां वैनगंगा परिक्रमा यात्रा से लौटे शिवशक्ति उपासक भक्तगण

मां वैनगंगा परिक्रमा यात्रा से लौटे शिवशक्ति उपासक भक्तगण टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: 9822550220   सिवनी। …

चरित्रहीन पर स्त्रीगमन और पर पुरुष व्यभिचरिणी के यहां जलपान वर्जित

चरित्रहीन पर स्त्रीगमन और पर पुरुष व्यभिचरिणी के यहां जलपान वर्जित टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: संयुक्त …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *